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चेंबूर बस हादसा: पेड़ गिरने के मामले में बीएमसी की जाँच रिपोर्ट या 'बलि का बकरा' ढूँढने की कवायद?

मुंबई | विशेष संवाददाता चेंबूर (पश्चिम) में डायमंड गार्डन के पास स्कूल बस पर पीपल का पेड़ गिरने की घटना महज एक हादसा नहीं, बल्कि महानगरपालिका की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह थी। इस मामले में बीएमसी द्वारा गठित जाँच समिति ने अपनी रिपोर्ट तो सौंप दी है, लेकिन यह रिपोर्ट सुरक्षा मानकों से अधिक 'जवाबदेही से बचने' की दिशा में कदम बढ़ाती नजर आ रही है।

Vinod Tiwari14 जुल. 2026, 12:57 PM IST
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चेंबूर बस हादसा: पेड़ गिरने के मामले में बीएमसी की जाँच रिपोर्ट या 'बलि का बकरा' ढूँढने की कवायद?

अधिकारियों को 'क्लीन चिट', ठेकेदारों पर जुर्माना :

जाँच समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि जिम्मेदारी के नाम पर 'मेसर्स गवार कन्स्ट्रक्शन लिमिटेड' पर 5 लाख और निगरानी रखने वाली 'मेसर्स माहिमतुरा कन्स्ट्रक्शन' पर 2 लाख का जुर्माना लगाया जाए। आयुक्त अश्विनी भिडे ने इन सिफारिशों पर अमल करने के निर्देश भी दे दिए हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि नियमों की अनदेखी हुई, तो 'पर्यवेक्षण' (Supervision) के लिए नियुक्त अधिकारियों की भूमिका क्या थी? रिपोर्ट में उद्यान और सड़क विभाग के अधिकारियों को जिस तरह से 'क्लीन चिट' दी गई है, वह प्रशासनिक जवाबदेही पर कई संदेह खड़े करती है।


क्या साइट इंजीनियरों की जिम्मेदारी शून्य है?

शहर के जागरूक नागरिकों और विशेषज्ञों का कहना है कि जब कोई भी सरकारी प्रोजेक्ट चलता है, तो उसकी बारीकी से निगरानी करना संबंधित विभाग के इंजीनियरों का कर्तव्य होता है। यदि ठेकेदार ने लापरवाही बरती, तो बीएमसी के इंजीनियर उस समय क्या कर रहे थे? क्या उन्हें यह नहीं पता था कि पेड़ों की जड़ों के पास की गई खुदाई खतरनाक साबित हो सकती है? केवल निचले स्तर के ठेकेदारों पर आर्थिक दंड लगाकर यह साबित करने की कोशिश की गई है कि 'व्यवस्था ठीक है, गलती सिर्फ ठेकेदार की थी'।


सिफारिशें तो अच्छी हैं, लेकिन कार्यान्वयन का क्या?

समिति ने भविष्य के लिए कई क्रांतिकारी सिफारिशें की हैं, जैसे:

  • पेड़ों के पास जेसीबी/पोकलेन पर पूर्ण पाबंदी और मैन्युअल खुदाई।
  • पेड़ों की 'जीआईएस' (GIS) आधारित सूची और अनिवार्य वृक्षतज्ज्ञों की नियुक्ति।
  • काँक्रीटीकरण के दौरान पेड़ के चारों ओर 3x3 मीटर का 'वॉटर-परमेबल' स्पेस छोड़ना।

ये उपाय निश्चित रूप से स्वागत योग्य हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये सिफारिशें फाइलों में ही दबी रहेंगी या धरातल पर उतरेंगी ?


प्रशासन के दावों की खुली पोल :
आँकड़े बताते हैं कि 28 जून से 5 जुलाई के बीच मुंबई में 1,158 पेड़ और उनकी शाखाएं गिरने की घटनाएँ दर्ज हुई हैं। यह संख्या यह बताने के लिए काफी है कि मानसून पूर्व 'वृक्ष छंटाई' के दावों की जमीनी हकीकत क्या है।
चेंबूर हादसा इस बात का प्रतीक है कि शहर में बुनियादी ढांचे के विकास की होड़ में प्रकृति और सुरक्षा को नजरअंदाज किया जा रहा है। 
अब मुंबईकर जानना चाहते हैं कि इस मामले में सिर्फ 'अर्थदंड' ही क्यों? क्या आम जनता की जान से खिलवाड़ करने वाले किसी भी अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई होगी? या फिर अगली बार किसी और हादसे का इंतज़ार किया जाएगा?