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ज्ञानवापी-मथुरा विवाद: 'सुलह नहीं, फैसला चाहिए', सुप्रीम कोर्ट के प्रस्ताव को दोनों पक्षों ने नकारा
वाराणसी के ज्ञानवापी, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और संभल की शाही जामा मस्जिद से जुड़े विवादों में सुप्रीम कोर्ट की ओर से विशेष लोक अदालत के माध्यम से सुलह का रास्ता निकालने की पहल को बड़ा झटका लगा है। हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे समझौते के बजाय अदालत के अंतिम फैसले को ही स्वीकार करेंगे।

12 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इन विवादों को 'समाधान
समारोह-2026' के तहत विशेष लोक अदालत में भेजने का सुझाव दिया। अदालत ने कहा कि
यदि दोनों पक्ष सहमत हों तो 21, 22 और 23 अगस्त 2026 को
विशेष लोक अदालत में बातचीत के जरिए समाधान का प्रयास किया जा सकता है। इससे पहले 14
जुलाई 2026 को वाराणसी में प्री-कॉन्सिलिएशन की प्रक्रिया प्रस्तावित की गई है।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लोक अदालत में सुनवाई पूरी तरह दोनों
पक्षों की स्वैच्छिक सहमति पर निर्भर करेगी।
क्या है तीनों विवाद, किस बात को लेकर है संघर्ष?
- ज्ञानवापी परिसर, वाराणसी
ज्ञानवापी विवाद वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर से सटे ज्ञानवापी परिसर को लेकर है। हिंदू पक्ष का दावा है कि यहां मूल रूप से प्राचीन भगवान विश्वेश्वर (काशी विश्वनाथ) मंदिर था, जिसे मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में ध्वस्त कर मस्जिद बनाई गई। हिंदू पक्ष परिसर के भीतर स्थित श्रृंगार गौरी, व्यासजी तहखाना और कथित शिवलिंग की नियमित पूजा का अधिकार मांग रहा है। वहीं अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी का कहना है कि यह ऐतिहासिक मस्जिद है और हिंदू पक्ष के दावे कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं हैं। कमेटी पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 का भी हवाला देती है।
2. श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह, मथुरा
यह विवाद मथुरा के कटरा केशव देव क्षेत्र में स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह मस्जिद परिसर को लेकर है। हिंदू पक्ष का दावा है कि शाही ईदगाह का निर्माण भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान पर स्थित प्राचीन मंदिर को तोड़कर किया गया था। इसलिए ईदगाह हटाकर पूरी भूमि श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट को दी जाए। दूसरी ओर शाही ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट का कहना है कि मस्जिद वैध रूप से स्थापित है और 1968 में दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के बाद विवाद समाप्त हो चुका है। ट्रस्ट इसी समझौते और 1991 के पूजा स्थल कानून का हवाला देता है।
3. शाही जामा मस्जिद, संभल
संभल की शाही जामा मस्जिद को लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि यहां पहले भगवान हरिहर का मंदिर था, जिसे मुगल काल में तोड़कर मस्जिद बनाई गई। इस दावे के आधार पर सर्वे और धार्मिक अधिकारों की मांग की गई है। मुस्लिम पक्ष इन दावों को निराधार बताते हुए कहता है कि मस्जिद सदियों पुरानी धार्मिक धरोहर है और उसके स्वरूप में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इस मामले में सर्वे को लेकर भी अदालतों में सुनवाई चल रही है।
हिंदू पक्ष के वादकारी और उनका पक्ष
ज्ञानवापी मामले में वादी राखी सिंह, लक्ष्मी देवी, मनीषा त्रिपाठी, आशा देवी तथा अन्य महिला वादकारियों की ओर से अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कहा कि यह मामला करोड़ों हिंदुओं की आस्था और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि "ऐसे मामलों का समाधान केवल न्यायालय के अंतिम निर्णय से ही संभव है, समझौते से नहीं।" मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि मामले में हिंदू पक्ष के वादकारियों ने भी कहा कि वे न्यायालय के अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा करेंगे और समझौते की प्रक्रिया में शामिल नहीं होंगे।
मुस्लिम पक्ष के वादकारी और उनका पक्ष
ज्ञानवापी मामले में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के संयुक्त सचिव एस.एम. यासीन ने कहा कि मस्जिद कमेटी किसी समझौते के पक्ष में नहीं है। उन्होंने कहा कि "मामला अदालत में विचाराधीन है और उसका फैसला न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होना चाहिए।" कमेटी की ओर से अधिवक्ता एस.एफ.ए. नकवी ने कहा कि धार्मिक विवादों का समाधान संविधान और कानून के अनुसार अदालत ही करेगी। मथुरा मामले में शाही ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट ने भी स्पष्ट किया कि वह किसी समझौते के बजाय अदालत के अंतिम निर्णय को ही स्वीकार करेगा।
अब आगे क्या होगा?
दोनों पक्षों के इनकार के बाद विशेष लोक अदालत के माध्यम से समाधान
की संभावना फिलहाल कमजोर पड़ गई है। अब ज्ञानवापी (वाराणसी), श्रीकृष्ण
जन्मभूमि (मथुरा) और शाही जामा मस्जिद (संभल) से जुड़े मामलों की सुनवाई सुप्रीम
कोर्ट तथा संबंधित अदालतों में नियमित न्यायिक प्रक्रिया के तहत जारी रहेगी। यदि
भविष्य में दोनों पक्ष सहमत होते हैं तो लोक अदालत का विकल्प खुला रहेगा, लेकिन
फिलहाल कानूनी लड़ाई जारी रहेगी।
