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पुलिस कस्टडी में बर्बरता पर बॉम्बे हाईकोर्ट का सख्त रुख: आरोपियों को नहीं मिलेगा सरकारी संरक्षण का कवच

कोल्हापुर: पुलिस कस्टडी में पूछताछ के नाम पर मारपीट और यातना देने के आरोपों का सामना कर रहे पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों को बॉम्बे हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर सर्किट बेंच ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पुलिस द्वारा किसी संदिग्ध को अपराध कबूल करवाने के लिए दी गई बर्बर यातना को 'सरकारी कर्तव्य' नहीं माना जा सकता और इसके लिए कानूनी अभियोजन (Prosecution) चलाने हेतु किसी पूर्व सरकारी मंजूरी (Sanction) की आवश्यकता नहीं है।

Anshuman Mishra15 जुल. 2026, 01:43 PM IST
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पुलिस कस्टडी में बर्बरता पर बॉम्बे हाईकोर्ट का सख्त रुख: आरोपियों को नहीं मिलेगा सरकारी संरक्षण का कवच
यह मामला नवंबर 2008 का है, जब कोल्हापुर जिले के हटकांणंगले तालुका के रेंडाल गांव निवासी एक व्यक्ति (शिकायतकर्ता) को शिवाजी नगर पुलिस स्टेशन, इचलकरंजी बुलाया गया था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि वहां पुलिस अधिकारियों (तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर और कॉन्स्टेबल्स) ने उसे हिरासत में रखकर बर्बरता से पीटा और उसे एक हत्या के मामले में जबरन जुर्म कबूल करने के लिए मजबूर किया।  
पीड़ित का आरोप है कि पुलिस की इस यातना के कारण वह गंभीर रूप से घायल हो गया था, जिसके चलते उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था। इस घटना के बाद पीड़ित ने इचलकरंजी कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई, जिस पर संज्ञान लेते हुए मजिस्ट्रेट ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज करने और समन जारी करने का आदेश दिया था।  
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आरोपियों की दलील और कोर्ट का फैसला
पुलिस अधिकारियों ने निचली अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका तर्क था कि वे सरकारी ड्यूटी पर थे, इसलिए CrPC की धारा 197 के तहत उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सरकार से पूर्व मंजूरी जरूरी है। आरोपियों ने दावा किया कि वे केवल अपने आधिकारिक कर्तव्यों का पालन कर रहे थे।  

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदेश डी. पाटिल ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा:
  • पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, न कि संदिग्धों के साथ 'थर्ड डिग्री' का इस्तेमाल करना।  
  • किसी भी व्यक्ति को अपराध स्वीकार करने के लिए पीटना या हिरासत में यातना देना आधिकारिक कर्तव्य के दायरे में नहीं आता है।  
  • ऐसी कृत्यों के लिए किसी सरकारी मंजूरी (Sanction) की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह सीधे तौर पर कानून के उल्लंघन का मामला है।  

हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें इन पुलिस कर्मियों के खिलाफ मामला आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी ट्रायल के दौरान अपनी सुरक्षा में सबूत पेश कर सकते हैं, लेकिन इस स्तर पर वे सरकारी संरक्षण की आड़ में मुकदमे से नहीं बच सकते।