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POCSO मामलों में सुप्रीम कोर्ट सख्त: शिकायत मिलते ही पुलिस को दें सूचना, खुद जांच अधिकारी बनने की कोशिश न करें
9 जुलाई 2026 को बच्चों के यौन शोषण के मामलों में रिपोर्टिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी स्कूल अधिकारी को किसी बच्चे से यौन उत्पीड़न की विश्वसनीय जानकारी मिलती है, तो वह स्वयं जांच कर मामले को दबा नहीं सकता। अदालत ने कहा कि POCSO Act की धारा 19 के तहत पुलिस को तत्काल सूचना देना कानूनी दायित्व है और ऐसा नहीं करने पर धारा 21 के तहत आपराधिक कार्रवाई होगी। इसी के साथ कोर्ट ने 2017 में हुई घटना से जुड़े मामले में स्कूल की हेडमिस्ट्रेस के खिलाफ बंद हो चुका ट्रायल दोबारा शुरू करने का आदेश दिया।
Sonali15 जुल. 2026, 04:27 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने गुवाहाटी हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें स्कूल की हेडमिस्ट्रेस को आरोपमुक्त कर दिया गया था। मामला साल 2017 में आठ वर्षीय छात्रा के साथ कथित यौन उत्पीड़न का है। बच्ची ने अपनी बहन, हेड गर्ल और अंत में स्कूल की हेडमिस्ट्रेस को घटना की जानकारी दी थी।
आरोप है कि हेडमिस्ट्रेस ने पुलिस को सूचना देने के बजाय स्वयं छात्रा और आरोपी छात्र से पूछताछ की, मेडिकल संकेतों का अपने स्तर पर आकलन किया और यह निष्कर्ष निकाल लिया कि कोई अपराध नहीं हुआ। इसके बाद कथित रूप से घटना को दबा दिया गया और बच्चों से किसी को कुछ न बताने के लिए कहा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि POCSO कानून का उद्देश्य बच्चों की सुरक्षा और तत्काल कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है। यदि कोई जिम्मेदार व्यक्ति बच्चे से सीधे घटना की जानकारी प्राप्त करता है, तो वह सूचना अपने आप में रिपोर्ट करने के लिए पर्याप्त है। ऐसी स्थिति में स्वयं जांच करना कानून का विकल्प नहीं हो सकता।
अदालत ने कहा कि निचली अदालतों ने आरोप तय करने के शुरुआती चरण में ही बचाव पक्ष की दलीलों का मूल्यांकन कर "मिनी ट्रायल" कर दिया, जबकि इस स्तर पर केवल यह देखना होता है कि अभियोजन पक्ष के पास प्रथमदृष्टया पर्याप्त सामग्री है या नहीं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि POCSO Act की धारा 19(1) में प्रयुक्त "यह जानकारी होना कि अपराध हुआ है" का अर्थ केवल प्रत्यक्ष प्रमाण होना नहीं है। यदि पीड़ित बच्चा स्वयं घटना की जानकारी देता है तो उसे विश्वसनीय सूचना माना जाएगा और संबंधित अधिकारी पर तत्काल रिपोर्ट करने की कानूनी जिम्मेदारी होगी।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अन्य स्कूल अधिकारियों, शिक्षक और हॉस्टल वार्डन के खिलाफ ट्रायल बहाल नहीं किया। अदालत ने कहा कि पीड़िता ने घटना की सीधी जानकारी केवल हेडमिस्ट्रेस को दी थी, इसलिए रिपोर्ट न करने की जवाबदेही मुख्य रूप से उन्हीं की बनती है। वहीं, पीड़िता की बहन, सहेली और हेड गर्ल नाबालिग थीं, इसलिए POCSO Act की धारा 21(3) के तहत उन पर रिपोर्ट न करने का अपराध लागू नहीं होगा।
क्या कहता है कानून?
POCSO Act की धारा 19 के तहत किसी भी व्यक्ति को बच्चे के साथ यौन अपराध की जानकारी मिलने पर पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई को तत्काल सूचना देना अनिवार्य है।
धारा 21 के अनुसार सूचना छिपाने या रिपोर्ट न करने पर छह महीने तक की सजा, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
इस फैसले के बाद स्कूल, हॉस्टल, कोचिंग संस्थान, आश्रय गृह और बच्चों से जुड़े सभी संस्थानों की कानूनी जिम्मेदारी और अधिक स्पष्ट हो गई है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, "बच्चों की सुरक्षा किसी भी संस्था की प्रतिष्ठा से बड़ी है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट संदेश देता है कि POCSO मामलों में चुप्पी या आंतरिक जांच कानून का विकल्प नहीं हो सकती।"
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा, "बच्चों के खिलाफ अपराधों में जीरो टॉलरेंस की नीति जरूरी है। अदालत का फैसला सभी शैक्षणिक संस्थानों को कानून का अक्षरशः पालन करने का संदेश देता है।"
सामाजिक कार्यकर्ता की प्रतिक्रिया
बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने कहा, "हर मिनट की देरी बच्चे के लिए नुकसानदेह हो सकती है। यदि स्कूल या कोई संस्था शिकायत दबाती है तो वह केवल कानून नहीं तोड़ती, बल्कि बच्चे के विश्वास के साथ भी अन्याय करती है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करेगा।"
विशेष महत्व
यह फैसला देश के सभी स्कूलों, शिक्षकों, प्रिंसिपलों, हॉस्टल संचालकों और बच्चों से जुड़े संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा रहा है। अब किसी भी संस्था के लिए यह तर्क देना संभव नहीं होगा कि उसने पहले अपनी जांच की, इसलिए पुलिस को सूचना नहीं दी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि POCSO मामलों में पहले रिपोर्ट होगी, जांच बाद में पुलिस और संबंधित एजेंसियां करेंगी।
