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"महिला के बेडरूम में रात में घुसी पुलिस, बॉम्बे हाई कोर्ट ने लगाई फटकार: कहा- जांच के नाम पर निजता कुचलने का अधिकार नहीं"।

नागपुर पीठ का बड़ा फैसला; बिना महिला पुलिसकर्मी रात में बेडरूम में घुसना और कानूनी प्रक्रिया के बिना मोबाइल जब्त करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार का उल्लंघन। महाराष्ट्र सरकार को पीड़िता को ₹10,000 मुआवजा देने का आदेश।

Kalpana Gautam15 जुल. 2026, 04:54 PM IST
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"महिला के बेडरूम में रात में घुसी पुलिस, बॉम्बे हाई कोर्ट ने लगाई फटकार: कहा- जांच के नाम पर निजता कुचलने का अधिकार नहीं"।
मुंबई/नागपुर: महिलाओं की निजता और पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहा है कि जांच के नाम पर पुलिस किसी महिला के मौलिक अधिकारों को कुचल नहीं सकती। अदालत ने साफ कहा कि रात में बिना महिला पुलिसकर्मी किसी महिला के बेडरूम में प्रवेश करना और विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना उसका मोबाइल फोन जब्त करना, उसके निजता के अधिकार (Right to Privacy) और गरिमा का गंभीर उल्लंघन है।

अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि पुलिस अधिकारियों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां भी संविधान और कानून के दायरे में रहकर ही कार्रवाई कर सकती हैं। किसी भी जांच का उद्देश्य नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं हो सकता।

महाराष्ट्र सरकार पर मुआवजे का आदेश:
हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि पीड़ित महिला को ₹10,000 का मुआवजा दिया जाए। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि संबंधित पुलिस अधिकारी की जिम्मेदारी तय होती है, तो सरकार यह राशि संबंधित अधिकारी से भी वसूल सकती है।

अदालत ने क्या संदेश दिया?
अदालत की टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे पुलिस तंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि:
  • जांच के दौरान भी नागरिकों के मौलिक अधिकार सर्वोपरि हैं।
  • महिलाओं की गरिमा और निजता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
  • पुलिस को हर कार्रवाई कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही करनी होगी।
  • संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह निर्णय ऐसे समय आया है जब देशभर में पुलिस कार्रवाई के दौरान मानवाधिकार, निजता और कानूनी प्रक्रिया के पालन को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में पुलिस जांच के दौरान महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और प्रक्रियात्मक न्याय (Due Process) को और मजबूत करेगा।