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क्या मुनाफ़े के लिए ज़हर बेचना 'व्यापार' है? मकोका के डर से क्यों थर्राए पान दुकानदार

मुंबई: महाराष्ट्र में गुटके पर प्रतिबंध लगे होने के बावजूद, पान की दुकानों पर इसका खुलेआम मिलना यह साबित करता है कि राज्य में एक बड़ा 'काला धंधा' समानांतर रूप से चल रहा है। दूसरे राज्यों से नियोजित तरीके से गुटके की स्मगलिंग कर इसे महाराष्ट्र के कोने-कोने तक पहुँचाने वाला यह रैकेट अब सरकार के निशाने पर है। नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए, सरकार ने गुटका माफियाओं की सप्लाई चेन की कमर तोड़ने के लिए पुलिस और अन्न एवं औषधि प्रशासन (FDA) को सख्त निर्देश दिए हैं कि उन पर 'मकोका' (MCOCA) जैसे कठोर कानून के तहत कार्रवाई की जाए।

Vinod Tiwari15 जुल. 2026, 06:56 PM IST
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क्या मुनाफ़े के लिए ज़हर बेचना 'व्यापार' है? मकोका के डर से क्यों थर्राए पान दुकानदार
महाराष्ट्र में गुटके पर प्रतिबंध लगे होने के बावजूद, पान की दुकानों पर इसका खुलेआम मिलना यह साबित करता है कि राज्य में एक बड़ा 'काला धंधा' समानांतर रूप से चल रहा है। दूसरे राज्यों से नियोजित तरीके से गुटके की स्मगलिंग कर इसे महाराष्ट्र के कोने-कोने तक पहुँचाने वाला यह रैकेट अब सरकार के निशाने पर है। नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखते हुए, सरकार ने गुटका माफियाओं की सप्लाई चेन की कमर तोड़ने के लिए पुलिस और अन्न एवं औषधि प्रशासन (FDA) को सख्त निर्देश दिए हैं कि उन पर 'मकोका' (MCOCA) जैसे कठोर कानून के तहत कार्रवाई की जाए।

'गुटका स्मगलिंग' बनाम 'व्यापारी का सम्मान'
प्रशासनिक कार्रवाई शुरू होते ही राज्यभर के पान विक्रेता संघ आजाद मैदान में आंदोलन पर उतर आए हैं। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि वे "गुंडे-चोर नहीं, बल्कि मेहनत करने वाले छोटे व्यापारी हैं," और उन्हें संगठित अपराधी मानकर उन पर मकोका लगाना गलत है। लेकिन इस तर्क के बीच एक कड़वा सवाल खड़ा होता है: यदि व्यापारी अपने सम्मान की इतनी चिंता करते हैं, तो वे नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने वाले प्रतिबंधित गुटके का व्यापार 'ब्लैक' में क्यों कर रहे हैं?  

क्या मुनाफा, नागरिकों की जान से बढ़कर है ?
व्यापारियों का आंदोलन यह मांग कर रहा है कि उन पर मकोका न लगाया जाए और कार्रवाई रोकी जाए। लेकिन समाज का एक बड़ा वर्ग पूछ रहा है कि, प्रतिबंधित और कैंसरकारी पदार्थों को खुलेआम बेचकर चंद रुपयों का मुनाफा कमाना क्या किसी भी व्यावसायिक नीति का हिस्सा हो सकता है?  
जो व्यापारी अपने परिवार और सामाजिक सम्मान की रक्षा की मांग कर रहे हैं, क्या वे यह नहीं समझते कि उनके द्वारा बेचा जाने वाला गुटका किसी दूसरे परिवार की खुशियां उजाड़ सकता है?  यदि धंधा वैध और मेहनत का है, तो स्मगलिंग के जरिए प्रतिबंधित वस्तुओं को लाकर ब्लैक में बेचने की आवश्यकता क्यों पड़ती है?  

पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई क्यों अनिवार्य है?
सख्त कानून की मांग इसलिए उठ रही है क्योंकि अब तक की सामान्य कार्रवाइयां और जुर्माना इस सप्लाई चेन को तोड़ने में विफल रहे हैं। पान विक्रेताओं के आंदोलन के बावजूद, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस सिंडिकेट की कमर नहीं तोड़ी गई, तो गुटखा माफिया राज्य की युवा पीढ़ी के भविष्य को नष्ट करना जारी रखेंगे।  यह आंदोलन केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि एक नैतिक संकट भी है। एक तरफ स्वास्थ्य सुरक्षा का संवैधानिक अधिकार है, तो दूसरी तरफ 'व्यापार' के नाम पर छिपकर किया जाने वाला यह काला कारोबार। अब गेंद सरकार और कानून के पाले में है कि क्या वे नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए इस 'गुटका सप्लाई चेन' के खिलाफ मकोका जैसे कड़े हथियारों का उपयोग करेंगे या नहीं।