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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बलात्कार के प्रयास को सिर्फ 'शालीनता भंग' नहीं माना जा सकता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 में कहा था कि चिकित्सीय साक्ष्य और स्वतंत्र गवाहों के अभाव में बलात्कार का प्रयास सिद्ध नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि अभियुक्त का कृत्य स्पष्ट रूप से बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में आता है।

Sonali16 जुल. 2026, 02:00 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बलात्कार के प्रयास को सिर्फ 'शालीनता भंग' नहीं माना जा सकता।

   घटना कब और कहाँ हुई:  
    मामला वर्ष 2008 का है, जब एक महिला अपने पिता के साथ अमरपुर स्थित एक फोटो स्टूडियो गई थी।  
    स्टूडियो मालिक ने पिता को बाहर भेजकर दरवाज़ा बंद कर दिया और महिला की सलवार उतारने का प्रयास किया व छाती दबाई।  

    क्यों हुआ मामला दर्ज:  
     महिला ने शोर मचाया, पिता ने दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश की, तब आरोपी भाग गया।  
     एफआईआर दर्ज हुई और ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को बलात्कार के प्रयास और गलत तरीके से कैद करने का दोषी ठहराया।  

   हाईकोर्ट का आदेश (17 मार्च 2025):
   इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बिना चिकित्सीय साक्ष्य और स्वतंत्र गवाहों के, बलात्कार का प्रयास सिद्ध नहीं होता।  
   कोर्ट ने इसे केवल “शालीनता भंग” माना।  

   सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई (15 जुलाई 2026):
   पीठ:
     मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति मोहना।  
     सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियुक्त का कृत्य केवल “तैयारी” नहीं बल्कि “प्रयास” है।  
     तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप से अपराध रुक गया, अन्यथा यह बलात्कार में परिवर्तित हो सकता था।  
     कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और मूल आरोप (धारा 376/511 आईपीसी व पॉक्सो एक्ट) बहाल किए।  

     महिला संरक्षण समिति और प्रतिक्रिया: 
 
     वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखकर इस मामले को संज्ञान में लाने की मांग की।  
     महिला अधिकार संगठनों ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश महिलाओं की सुरक्षा को कमजोर करता है। 
     सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया कि सभी पुलिस थाने एफआईआर दर्ज करते समय और चार्जशीट दाखिल करते समय हैंडबुक का पालन करें।  

    न्यायिक सुधार पहल:  

     सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल अकादमी की रिपोर्ट को मंजूरी दी।  
     कोर्ट ने कहा कि सभी न्यायालयों की वेबसाइट पर यह रिपोर्ट अपलोड की जाए और सभी न्यायाधीश, पुलिस व अभियोजक इसे अपनाएँ।  


 निष्कर्ष :
यह मामला दर्शाता है कि प्रक्रियात्मक त्रुटियाँ और चिकित्सीय साक्ष्य का अभाव न्यायिक निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब अभियुक्त का इरादा और कृत्य बलात्कार की ओर बढ़ते हैं, तो इसे केवल “शालीनता भंग” नहीं माना जा सकता।