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जलवायु परिवर्तन की मार, भारतीय शहरों में गरम रातों ने छीनी लोगों की नींद

जलवायु परिवर्तन का असर अब सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं रहा। नई वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ती गर्म रातों की वजह से दुनिया भर के लोगों की नींद प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट में भारत के कई बड़े शहरों को सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल किया गया है, जहां रात का बढ़ता तापमान लोगों की सालाना नींद के घंटों में कमी ला रहा है।

Vindhya Dubey16 जुल. 2026, 03:13 PM IST
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जलवायु परिवर्तन की मार, भारतीय शहरों में गरम रातों ने छीनी लोगों की नींद

Climate Central की नई रिपोर्ट "Climate Change is Costing People Sleep" के अनुसार वर्ष 2020 से 2025 के बीच दुनिया भर में गर्म रातों की वजह से प्रति व्यक्ति औसतन 56 घंटे की नींद प्रभावित हुई। रिपोर्ट का अनुमान है कि इनमें से लगभग 6 घंटे का नुकसान सीधे मानव-जनित जलवायु परिवर्तन से जुड़ा है। रिपोर्ट में 1,338 शहरों का विश्लेषण किया गया, जिसमें भारत को जलवायु परिवर्तन से होने वाले नींद के नुकसान के प्रमुख वैश्विक हॉटस्पॉट्स में शामिल बताया गया है। 


भारतीय शहरों में चेन्नई सबसे अधिक प्रभावित रहा, जहां लोगों की सालाना अनुमानित नींद का नुकसान लगभग 93 घंटे आंका गया। इसके बाद मुंबई में लगभग 84 घंटे और कोलकाता में करीब 80 घंटे की नींद का नुकसान दर्ज किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण भारत के कई शहरों में लगातार बढ़ती गर्म और उमस भरी रातें इस समस्या को और गंभीर बना रही हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया है कि 1970 के दशक की तुलना में दुनिया के अधिकांश शहरों में गर्मी से जुड़ा नींद का नुकसान कम से कम दोगुना हो चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े शहरों में 'अर्बन हीट आइलैंड' प्रभाव इस स्थिति को और खराब करता है। कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें और कम हरित क्षेत्र दिनभर गर्मी को सोख लेते हैं और रात में धीरे-धीरे छोड़ते हैं। इससे शहरों का तापमान देर रात तक ऊंचा बना रहता है, जिससे शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडा होने में कठिनाई होती है और नींद प्रभावित होती है।


विशेषज्ञों ने क्या कहा?

Climate Central ने अपनी रिपोर्ट में कहा,

"गर्म रातें लोगों के लिए पर्याप्त और आरामदायक नींद लेना लगातार मुश्किल बना रही हैं।"

University of Copenhagen के शोधकर्ता डॉ. Kelton Minor, जिनके शोध का उपयोग इस विश्लेषण में किया गया है, का कहना है कि रात का बढ़ता तापमान मानव नींद की अवधि और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करता है और जलवायु परिवर्तन इस समस्या को लगातार बढ़ा रहा है।

शहरों के अनुसार आंकड़े

  • चेन्नई के निवासी सालाना सबसे ज्यादा 93 घंटे की नींद खो रहे हैं.

  • मुंबई में यह आंकड़ा हर साल 84 घंटे दर्ज किया गया है.

  • कोलकाता के लोग सालाना औसतन 80 घंटे की नींद का नुकसान उठा रहे हैं.

  • अहमदाबाद में निवासी 78 घंटे और हैदराबाद में 75 घंटे की नींद खो रहे हैं.

  • बेंगलुरु के निवासी हर साल 67 घंटे और दिल्ली के लोग 66 घंटे की नींद से वंचित हो रहे हैं.

स्वास्थ्य पर असर

विशेषज्ञों के अनुसार लगातार नींद पूरी न होने से—

  • हृदय रोगों का खतरा बढ़ सकता है।
  • मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
  • याददाश्त और एकाग्रता कमजोर हो सकती है।
  • कामकाज की क्षमता प्रभावित होती है।
  • सड़क और कार्यस्थल पर दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ जाता है।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब केवल मौसम या पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे मानव स्वास्थ्य और जीवनशैली को प्रभावित कर रहा है। बढ़ती गर्म रातें आने वाले वर्षों में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी, शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना और बेहतर शहरी नियोजन ही इस समस्या को कम करने के प्रभावी उपाय हो सकते हैं।