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उल्हासनगर: सरकारी एम्बुलेंस सेवा बेहाल, मरीजों की जेब पर प्राइवेट एम्बुलेंस का भारी बोझ।

महाराष्ट्र के उल्हासनगर में स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को लेकर एक बड़ा विरोधाभास सामने आया है। राज्य सरकार ने जहां शहर के मध्यवर्ती अस्पताल (सेंट्रल हॉस्पिटल) को ठाणे जिला सामान्य अस्पताल की तर्ज पर 500 बिस्तरों वाले अत्याधुनिक मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल के रूप में पुनर्विकसित करने की बड़ी घोषणा की है, वहीं दूसरी तरफ नगर निगम की एम्बुलेंस सेवा पूरी तरह ठप पड़ी है। शहर में करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाले हाईटेक अस्पताल का सपना तो दिखाया जा रहा है, लेकिन वर्तमान में मरीजों को आपातकालीन स्थिति में एक चालू एम्बुलेंस तक नसीब नहीं हो रही है।

Vindhya Dubey16 जुल. 2026, 03:42 PM IST
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उल्हासनगर: सरकारी एम्बुलेंस सेवा बेहाल, मरीजों की जेब पर प्राइवेट एम्बुलेंस का भारी बोझ।

यह विरोधाभास स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक ओर बड़ी विकास परियोजनाओं की घोषणाएं सुर्खियां बटोर रही हैं, तो दूसरी ओर जमीनी हकीकत यह है कि बुनियादी स्वास्थ्य नेटवर्क (एम्बुलेंस सेवा) के खराब होने के कारण गरीब मरीजों को इलाज के लिए निजी वाहनों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। आपातकालीन सेवाओं की यह तकनीकी विफलता सीधे तौर पर नागरिकों के जीवन से खिलवाड़ कर रही है।

 उल्हासनगर में स्वास्थ्य मंत्री और कल्याण के सांसद डॉ. श्रीकांत शिंदे की मौजूदगी में सेंट्रल हॉस्पिटल के निरीक्षण के दौरान 500 बेड के इस भव्य प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार करने के निर्देश दिए गए थे। इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत अस्पताल में मैटरनिटी विंग से लेकर सुपर-स्पेशलिटी सुविधाएं एक ही छत के नीचे लाने का वादा किया गया है। लेकिन ठीक इसी समय जमीनी स्तर पर नगर निगम की आठ सरकारी एम्बुलेंस के मोबाइल नंबर संपर्क क्षेत्र से बाहर चल रहे हैं और गूगल पर दी गई हेल्पलाइन अस्तित्व में ही नहीं है।


इस दोहरी व्यवस्था के कारण स्थानीय नागरिकों में भारी आक्रोश है। शिवसेना के स्थानीय पार्षद दुर्गाप्रसाद राय ने महापौर अश्विनी निकम और नगर आयुक्त मनिषा आव्हाळे से इस संबंध में कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उनका कहना है कि बड़े अस्पतालों की घोषणाओं का तब तक कोई महत्व नहीं है जब तक कि एक तड़पते हुए मरीज को अस्पताल तक समय पर पहुंचाने के लिए चालू हालत में एम्बुलेंस सेवा उपलब्ध न हो। शिवसेना पार्षद दुर्गाप्रसाद राय ने इस स्थिति पर असंतोष व्यक्त करते हुए कहा, एक तरफ प्रशासन 500 बेड के हाईटेक अस्पताल की योजनाएं बना रहा है, जो कि भविष्य की बात है, लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि एम्बुलेंस के नंबर बंद होने के कारण गरीब लोग निजी गाड़ियों को भारी पैसे देने को मजबूर हैं। बुनियादी डिजिटल और मोबाइल सेवाएं दुरुस्त किए बिना बड़े अस्पतालों का दावा खोखला साबित होता है।


इस मामले में जब स्वास्थ्य विभाग के संबंधित अधिकारियों और उप आयुक्त अनंत जवादवर से स्पष्टीकरण लेने की कोशिश की गई, तो उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों का भी मानना है कि किसी भी बड़े अस्पताल की सफलता उसकी एम्बुलेंस और रिस्पांस प्रणाली पर निर्भर करती है। यदि बुनियादी एम्बुलेंस हेल्पलाइन ही काम नहीं कर रही है, तो 500 बेड का हाईटेक अस्पताल बनने के बाद भी मरीज वहां तक सुरक्षित कैसे पहुंचेंगे, यह एक अनुत्तरित सवाल है।