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कोर्ट से दोषमुक्त व्यक्ति का नाम इंटरनेट से हटाने का आदेश, बॉम्बे हाई कोर्ट की नई कानूनी नजीर।
बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने डिजिटल निजता के अधिकार पर एक युगांतकारी निर्णय सुनाते हुए उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री को डिजिटल रिकॉर्ड से एक व्यक्ति की पहचान हटाने का निर्देश दिया है, जिसके खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमा लगभग आठ वर्ष पहले ही निरस्त किया जा चुका था। जस्टिस उर्मिला जोशी-फलके और जस्टिस निवेदिता मेहता की खंडपीठ ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि सम्मानपूर्वक जीने के अधिकार में अब इंटरनेट की डिजिटल स्मृतियों से मुक्त होने का अधिकार भी शामिल है।

यह अदालती आदेश देश में डिजिटल अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह फैसला रेखांकित करता है कि न्यायालयों से बरी या दोषमुक्त होने के बावजूद इंटरनेट सर्च इंजनों पर पुराने मुकदमों के रिकॉर्ड सार्वजनिक रहने से निर्दोष नागरिकों को किस तरह सामाजिक कलंक और आजीविका के अवसरों के नुकसान का सामना करना पड़ता है। न्यायालय की यह व्यवस्था भविष्य में राइट टू बी फॉरगॉटन यानी भूल जाने के अधिकार को लेकर एक बड़ा कानूनी नजीर बनेगी।
केस का नाम: एबीसी बनाम महाराष्ट्र राज्य (ABC v. State of Maharashtra & Ors.)
केस नंबर: क्रिमिनल रिट पिटीशन संख्या 470 ऑफ 2026
पीठ: जस्टिस उर्मिला जोशी-फलके और जस्टिस निवेदिता मेहता
यह कानूनी मामला जयपुर के एक 37 वर्षीय पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन सलाहकार से जुड़ा है, जिनकी पहचान को अदालती कार्यवाही में एबीसी के रूप में सुरक्षित रखा गया है। याचिकाकर्ता के खिलाफ वर्ष 2017 में नागपुर के बजाज नगर पुलिस स्टेशन में एक प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी, जिसे बाद में दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से हुए समझौते के आधार पर उच्च न्यायालय ने पूरी तरह रद्द कर दिया था। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एस.बी. तिवारी ने पीठ के समक्ष दलील दी कि हालांकि उनके मुवक्किल को न्यायिक रूप से सात वर्ष से भी अधिक समय पहले दोषमुक्त कर दिया गया था, लेकिन उनके केस से संबंधित दस्तावेज और व्यक्तिगत विवरण अभी भी उच्च न्यायालय और जिला अदालत के सार्वजनिक डिजिटल पोर्टलों पर उपलब्ध थे। उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि इंटरनेट सर्च इंजनों पर इस जानकारी की उपलब्धता के कारण जब भी कोई संभावित नियोक्ता याचिकाकर्ता का बैकग्राउंड वेरिफिकेशन करता था, तो यह पुराना रिकॉर्ड सामने आ जाता था। इस वजह से न केवल उन्हें पेशेवर जीवन में बार-बार नुकसान उठाना पड़ रहा था, बल्कि उनके परिवार और नाबालिग पुत्री को भी सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ रहा था।
राज्य सरकार की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों ने इस याचिका का तकनीकी आधार पर विरोध तो किया, लेकिन उन्होंने याचिकाकर्ता के निजता के मौलिक अधिकार पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
मामले की सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाते हुए खंडपीठ ने कहा कि निजता का अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का एक अभिन्न अंग है, जिसमें भूल जाने का अधिकार भी समाहित है। जस्टिस उर्मिला जोशी-फलके और जस्टिस निवेदिता मेहता ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि यद्यपि लोकतंत्र में सूचना तक पहुंच होना एक आवश्यक पहलू है, लेकिन इसे जनता के जानने के अधिकार और किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत निजता के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता से पृथक नहीं किया जा सकता।
न्यायाधीशों ने अपने फैसले में स्पष्ट शब्दों में कहा कि जहां आपराधिक कार्यवाही को पहले ही कानूनी रूप से समाप्त कर दिया गया हो, वहां इंटरनेट पर ऐसी जानकारी को निरंतर बनाए रखने से किसी भी प्रकार के सार्वजनिक हित की पूर्ति नहीं होती है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने मूल अदालती रिकॉर्ड को नष्ट करने की मांग नहीं की थी, बल्कि उनकी मांग केवल डिजिटल खोज परिणामों से अपनी पहचान छुपाने की थी। इस दलील को न्यायसंगत मानते हुए उच्च न्यायालय ने रजिस्ट्री विभाग को निर्देश दिया कि वह डिजिटल फाइलों से याचिकाकर्ता के नाम को संशोधित कर उसके स्थान पर एबीसी दर्ज करे, ताकि भविष्य में उनकी पहचान सार्वजनिक न हो सके।
