health

ड्रोन टेक्नोलॉजी का कमाल: टीबी जांच का समय 10 दिन घटा, मरीजों का खर्च ₹9,451 से सिर्फ ₹91

तेलंगाना में ICMR की एक स्टडी में पाया गया कि बलगम के सैंपल ले जाने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल करने से TB की जांच बहुत तेज़ी से हुई, मरीज़ों को यात्रा की परेशानी कम हुई और जेब से होने वाला खर्च भी घटा।

Kalpana Gautam16 जुल. 2026, 07:41 PM IST
खबर शेयर करें:
ड्रोन टेक्नोलॉजी का कमाल: टीबी जांच का समय 10 दिन घटा, मरीजों का खर्च ₹9,451 से सिर्फ ₹91
तेलंगाना में इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की एक स्टडी के अनुसार, ड्रोन टीबी (TB) की जांच में लगने वाले समय और खर्च को कम करने में बहुत असरदार हो सकते हैं। जिन इलाकों में मरीज़ों के सैंपल को मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स वाले सेंटर्स तक पहुँचाने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया गया, वहाँ TB का पता चलने में लगने वाला औसत समय 16.6 दिन से घटकर 6.9 दिन हो गया। स्टडी के मुताबिक, अहम बात यह है कि इस जाँच का खर्च 9,451 रुपये से घटकर सिर्फ़ 91 रुपये रह गया। 

यह ऐसे समय में हो रहा है जब सरकार 2030 तक टीबी को खत्म करने के वैश्विक लक्ष्य को पाने के लिए कई AI टूल्स समेत अलग-अलग तरह के इनोवेशन पर ध्यान दे रही है। भारत 2025 तक टीबी को खत्म करने का अपना तय लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया था। ICMR के डायरेक्टर जनरल डॉ. राजीव बहल ने कहा, "भारत में टीबी को खत्म करने की कोशिशों में सही समय पर और किफायती कीमत पर जांच की सुविधा मिलना बहुत ज़रूरी है। यह स्टडी दिखाती है कि टेक्नोलॉजी कैसे भौगोलिक बाधाओं को दूर करने और मरीज़ों, खासकर दूर-दराज़ के इलाकों में रहने वाले लोगों पर बोझ कम करने में मदद कर सकती है। i-DRONE पहल से मिले सबूत भविष्य में पब्लिक हेल्थ से जुड़े नए तरीकों को बनाने में मदद करेंगे और मौजूदा हेल्थकेयर सिस्टम को और बेहतर बनाएंगे।"

i-DRONE पहल क्या है?
तेलंगाना में सैंपल की जांच के लिए 60 सब-सेंटर, 11 प्राइमरी हेल्थ सेंटर और चार TB यूनिट — अलायर, भोंगिर, रामन्नापेट और चौटुप्पल — के बीच एक 'हब-एंड-स्पोक' ड्रोन नेटवर्क बनाया गया। इसका मकसद यह देखना था कि क्या इससे दूर-दराज़ और ग्रामीण इलाकों, खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में TB की जांच की क्षमता बेहतर हो सकती है, जहाँ खराब सड़क नेटवर्क, मौसम की अनिश्चितता और लैब तक की लंबी दूरी समय पर जांच में रुकावट डालती है। इस स्टडी के लिए लगभग 840 लोगों को शामिल किया गया, जिनकी जांच इन चार सेंटर्स पर हुई थी; इनमें से 206 लोगों की जांच 'i-ड्रोन' पहल से पहले और 634 लोगों की जांच उसके बाद हुई थी।

i-Drone पहल से पहले, मरीज़ों को टेस्ट करवाने के लिए सड़क मार्ग से 10 से 30 किलोमीटर तक का सफ़र करना पड़ता था, जबकि ट्रांसपोर्ट की सुविधाएँ भी अक्सर सीमित होती थीं। अब, वे अपने नज़दीकी सब-सेंटर या प्राइमरी हेल्थ सेंटर जा सकते हैं — जहाँ मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक टेस्ट की सुविधा तो नहीं है, लेकिन सैंपल लिए जा सकते हैं — और वहाँ अपने बलगम के सैंपल दे सकते हैं, जिन्हें ड्रोन के ज़रिए भेजा जाता है। स्टडी में कहा गया है, "मरीज़ों ने इलाज में देरी की वजह सफ़र में होने वाली दिक्कतों, रोज़ की कमाई के नुकसान और सामाजिक भेदभाव को बताया।" इसमें शामिल लगभग सभी मरीज़ गरीब थे और उनकी मासिक आय 5,000 रुपये से कम थी।

किस तरह के ड्रोन इस्तेमाल किए गए थे?
इस पहल के लिए दो तरह के ड्रोन का इस्तेमाल किया गया — एक 11.5 किलो का ड्रोन जो 2 किलो का पेलोड ले जा सकता था और दूसरा 24 किलो का ड्रोन जो 8 किलो का पेलोड ले जा सकता था। इलाके की बनावट, आबादी की सघनता और नो-फ़्लाई ज़ोन को ध्यान में रखते हुए उड़ान के रास्ते पहले से ही तय कर लिए गए थे। इन हेल्थ सेंटरों और TB यूनिट्स पर सुरक्षित टेक-ऑफ़ और लैंडिंग की जगहें भी बनाई गई थीं। 

पायलट स्टडी में क्या पता चला?
समय और अपनी जेब से होने वाले खर्च में कमी के अलावा, स्टडी में यह भी पाया गया कि एक या दो दिन के अंदर बीमारी का पता चलने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ी। ड्रोन के इस्तेमाल से उसी दिन रिज़ल्ट पाने वाले मरीज़ों का अनुपात 6.3% से बढ़कर 7.4% हो गया, लेकिन अगले दिन रिज़ल्ट पाने वाले लोगों की संख्या 1.5% से तेज़ी से बढ़कर 76.3% हो गई। स्टडी में यह भी पाया गया कि दो दिन की देरी का सामना करने वाले मरीज़ों का अनुपात ड्रोन के इस्तेमाल से पहले के दौर के 92.2% से घटकर ड्रोन वाले दौर में 16.3% हो गया।

ये नतीजे मणिपुर और नागालैंड में देखे गए नतीजों जैसे ही हैं, जहाँ इसी तरह के ड्रोन का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया गया है।