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नाबालिग बेटी से दुष्कर्म करने वाले पिता की उम्रकैद बरकरार, नागपुर हाईकोर्ट ने 16 जुलाई 2026 को सुनाया सख्त फैसला
बॉम्बे हाईकोर्ट, नागपुर पीठ ने नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के दोषी पिता की उम्रकैद की सजा को सही ठहराते हुए कहा कि यह केवल एक अपराध नहीं, बल्कि पिता और बेटी के बीच विश्वास का सबसे गंभीर विश्वासघात है, जिसने पीड़िता के शरीर, मन और भविष्य को गहरी चोट पहुंचाई।
Sonali17 जुल. 2026, 02:48 PM IST

घटना कब, कहाँ और कैसे हुई
अप्रैल 2021 में चंद्रपुर जिले के एक गांव में यह मामला सामने आया। एक आशा कार्यकर्ता ने सर्वे के दौरान पाया कि 12 वर्षीय बच्ची गर्भवती है। डॉक्टरों ने जांच में उसे 27 सप्ताह की गर्भवती पाया। बाद में बच्ची ने बच्चे को जन्म दिया और डीएनए टेस्ट ने आरोपी पिता की पितृत्व की पुष्टि की।
अदालत का फैसला
निचली अदालत ने आरोपी को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ अपील दायर की।
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने 16 जुलाई 2026 को यह अपील खारिज कर दी और उम्रकैद की सज़ा को बरकरार रखा।
न्यायाधीशों के नाम
यह फैसला न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी फाल्के और न्यायमूर्ति निवेदिता मेहता की पीठ ने सुनाया। उन्होंने कहा कि पिता द्वारा बेटी से दुष्कर्म करना सबसे “घृणित और चौंकाने वाला अपराध” है। अदालत ने माना कि पीड़िता अपनी मां को खो चुकी थी और पिता पर निर्भर थी, इसलिए तुरंत आरोपी का नाम न बता पाना स्वाभाविक था।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
बीजेपी प्रवक्ता गिरीश महाजन ने कहा कि यह फैसला बच्चों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत संदेश है और ऐसे अपराधियों को किसी भी स्थिति में बख्शा नहीं जाना चाहिए।
कांग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने कहा कि यह घटना समाज के लिए शर्मनाक है और सरकार को बच्चों की सुरक्षा के लिए और सख्त कदम उठाने चाहिए।
बाल कल्याण समिति का बयान
चाइल्ड वेलफेयर कमेटी नागपुर ने कहा कि यह मामला बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाता है। समिति ने मांग की कि ऐसे मामलों में पीड़ितों को दीर्घकालिक मानसिक स्वास्थ्य सहायता दी जाए।
पुलिस और सरकार की प्रतिक्रिया
चंद्रपुर पुलिस ने कहा कि डीएनए रिपोर्ट और मेडिकल सबूतों ने केस को मजबूत बनाया।
महाराष्ट्र सरकार के महिला और बाल विकास विभाग ने कहा कि यह फैसला बच्चों के खिलाफ अपराधों को रोकने के लिए एक मिसाल बनेगा |
निष्कर्ष
यह फैसला न केवल पीड़िता को न्याय दिलाने वाला है बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि बच्चों के साथ यौन अपराधों को किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। राजनीतिक दलों, बाल कल्याण समिति और पुलिस ने इसे बच्चों की सुरक्षा के लिए ऐतिहासिक कदम बताया है।
