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'Judicial Terrorism' टिप्पणी पर हाईकोर्ट का सख्त संदेश, न्यायपालिका की गरिमा सर्वोपरि

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने कहा- अदालत पर इस तरह की टिप्पणी न्यायपालिका पर हमला है; अधिवक्ता के आचरण की जांच कर 12 सप्ताह में रिपोर्ट मांगी गई।

Sonali17 जुल. 2026, 04:09 PM IST
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'Judicial Terrorism' टिप्पणी पर हाईकोर्ट का सख्त संदेश, न्यायपालिका की गरिमा सर्वोपरि
 बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने सुनवाई के दौरान एक अधिवक्ता द्वारा न्यायालय की कार्यवाही को "न्यायिक आतंकवाद" (Judicial Terrorism) बताए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने इस टिप्पणी को अत्यंत अनुचित बताते हुए कहा कि यह केवल न्यायाधीशों पर नहीं, बल्कि पूरी न्यायपालिका की संस्था पर हमला है। साथ ही अदालत ने मामले को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल को भेजने का निर्देश दिया है।

13 जुलाई 2026 को पारित आदेश में न्यायमूर्ति अनिल पानसरे और न्यायमूर्ति रजनीश व्यास की खंडपीठ एक महिला की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में सेवानिवृत्ति के बाद वेतन बकाया, भविष्य निधि (PF) और ग्रेच्युटी के भुगतान की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान अमरावती के अधिवक्ता वी. ए. कोठाले ने अदालत की कार्यवाही पर असंतोष जताते हुए "न्यायिक आतंकवाद" जैसी टिप्पणी कर दी।
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि अधिवक्ताओं का दायित्व है कि वे न्यायालय के प्रति सम्मानजनक और पेशेवर व्यवहार बनाए रखें। यदि किसी न्यायिक आदेश से असहमति है तो उसका समाधान कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से किया जा सकता है, लेकिन अदालत के खिलाफ अपमानजनक और आधारहीन टिप्पणियां स्वीकार नहीं की जा सकतीं। अदालत ने कहा कि इस प्रकार के बयान न्यायपालिका की गरिमा और जनता के विश्वास को प्रभावित करते हैं।

हाईकोर्ट ने अधिवक्ता को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा कि उनके खिलाफ पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) की कार्रवाई के लिए मामला महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल को क्यों न भेजा जाए। साथ ही बार काउंसिल को अधिवक्ता के आचरण की जांच कर 12 सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने तत्काल अवमानना की कार्रवाई करने के बजाय अनुशासनात्मक जांच का रास्ता चुना।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि न्यायपालिका की आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हो सकती है, लेकिन ऐसी भाषा या टिप्पणी, जिससे न्यायपालिका की गरिमा और जनता का विश्वास प्रभावित हो, उसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि अधिवक्ताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे न्यायिक संस्थाओं की मर्यादा बनाए रखें और पेशे की गरिमा के अनुरूप आचरण करें।