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चार्जशीट से पहले SHO खुद परखें साक्ष्य, 'पोस्ट ऑफिस' बनकर नहीं बच सकते: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि थाना प्रभारी (SHO) केवल विवेचक की चार्जशीट पर हस्ताक्षर करने वाली औपचारिक संस्था नहीं हैं। अदालत ने कहा कि चार्जशीट अदालत में भेजने से पहले SHO को उपलब्ध साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन कर अपनी संतुष्टि दर्ज करनी चाहिए।
Sonali17 जुल. 2026, 04:18 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने पुलिस जांच और चार्जशीट दाखिल करने की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी भी थाना प्रभारी (SHO) को चार्जशीट या अंतिम रिपोर्ट अदालत में भेजने से पहले अपने स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। वह केवल जांच अधिकारी द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट को आगे भेजने वाला "पोस्ट ऑफिस" नहीं है। यह फैसला न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंध ने 15 जुलाई 2026 को सुनाया।
मामले का विवरण
यह मामला राजेंद्र प्रसाद बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (Rajendra Prasad v. State of Rajasthan & Ors.) से संबंधित है। मामला एस.बी. क्रिमिनल मिसलेनियस पिटीशन संख्या 246/2024 का है। निर्णय का आधिकारिक संदर्भ (Citation) 2026:RJ-JP:26052 है
क्या था मामला?
याचिकाकर्ता का आरोप था कि उसे लगी गंभीर चोट और फ्रैक्चर के बावजूद पुलिस ने चार्जशीट में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 338 (गंभीर लापरवाही से गंभीर चोट पहुंचाना) नहीं जोड़ी। जांच एक हेड कांस्टेबल ने की थी, जबकि संबंधित SHO ने बिना रिकॉर्ड का स्वतंत्र परीक्षण किए चार्जशीट अदालत में प्रस्तुत कर दी।
बाद में पुनरीक्षण (Revisional) अदालत ने SHO के खिलाफ संज्ञान यह कहते हुए रद्द कर दिया कि उसने स्वयं जांच नहीं की थी। इस आदेश को याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति अनूप कुमार धंध ने कहा कि SHO केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकता कि जांच किसी अधीनस्थ अधिकारी ने की थी। थाना प्रभारी का वैधानिक दायित्व है कि वह चार्जशीट दाखिल करने से पहले उपलब्ध साक्ष्यों, मेडिकल रिपोर्ट, एक्स-रे रिपोर्ट और केस डायरी का स्वतंत्र परीक्षण करे तथा यह सुनिश्चित करे कि सभी उपयुक्त धाराएं जोड़ी गई हैं।
अदालत ने कहा कि यदि SHO बिना जांच रिकॉर्ड का परीक्षण किए केवल चार्जशीट पर हस्ताक्षर कर देता है, तो वह अपनी पर्यवेक्षी (Supervisory) जिम्मेदारी निभाने में विफल माना जाएगा। इसलिए SHO महज "पोस्ट ऑफिस" नहीं है, बल्कि उसे स्वतंत्र राय बनाकर ही चार्जशीट या अंतिम रिपोर्ट अदालत में भेजनी चाहिए।
हाईकोर्ट के निर्देश
अदालत ने पुनरीक्षण अदालत द्वारा SHO को राहत देने वाला आदेश रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि SHO की भूमिका पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पुनः विचार किया जाए। साथ ही, न्यायालय ने अपने आदेश की प्रति राजस्थान सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजने का निर्देश दिया, ताकि राज्य के सभी थाना प्रभारियों को यह स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएं कि वे चार्जशीट दाखिल करने से पहले स्वतंत्र रूप से साक्ष्यों का परीक्षण करें और केवल औपचारिक रूप से रिपोर्ट अग्रेषित न करें।
