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महाराष्ट्र में 'लिविंग विल' को मिली नई कानूनी ताकत, सरकारी-निजी अस्पतालों में इच्छामृत्यु के लिए बनेगा मेडिकल बोर्ड

महाराष्ट्र सरकार ने गंभीर रूप से बीमार मरीजों के इलाज के अंतिम चरण से जुड़े फैसलों के लिए नई व्यवस्था लागू कर दी है। अब सरकारी और निजी अस्पतालों में लिविंग विल और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के मामलों में मेडिकल बोर्ड की मंजूरी के बाद ही आगे की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।

Sonali18 जुल. 2026, 07:09 PM IST
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महाराष्ट्र में 'लिविंग विल' को मिली नई कानूनी ताकत, सरकारी-निजी अस्पतालों में इच्छामृत्यु के लिए बनेगा मेडिकल बोर्ड
यराज्य के जनस्वास्थ्य विभाग ने आदेश दिया है कि सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ सभी निजी अस्पमहाराष्ट्र सरकार ने गंभीर और लाइलाज बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के "गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार" (Right to Die with Dignity) को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। तालों में भी निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) और लिविंग विल (Living Will/Advance Medical Directive) से जुड़े मामलों के निस्तारण के लिए निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जाएगी। ह आदेश सुप्रीम कोर्ट के 11 मार्च 2026 को हरीश राणा मामले में दिए गए फैसले के अनुरूप जारी किया गया है।
सरकार के निर्देश के अनुसार, प्रत्येक निजी अस्पताल में प्राथमिक मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाएगा। इस बोर्ड का गठन अस्पताल के चिकित्सा निदेशक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) या चिकित्सा अधीक्षक करेंगे। बोर्ड की अध्यक्षता अस्पताल प्रशासक करेंगे। इसके अलावा बोर्ड में मरीज का इलाज कर रहे विशेषज्ञ डॉक्टर, एक क्रिटिकल केयर (आईसीयू) विशेषज्ञ तथा एक वरिष्ठ फिजिशियन या सर्जन शामिल होंगे। आवश्यकता पड़ने पर उच्च स्तर पर द्वितीयक मेडिकल बोर्ड भी मामले की समीक्षा करेगा।

क्या है लिविंग विल?
लिविंग विल (Living Will) या एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव एक कानूनी दस्तावेज है, जिसमें कोई व्यक्ति पहले से यह लिखकर अपनी इच्छा व्यक्त कर सकता है कि यदि भविष्य में वह ऐसी असाध्य या अपरिवर्तनीय चिकित्सकीय स्थिति में पहुंच जाए, जहां ठीक होने की कोई संभावना न हो, तो उसे कृत्रिम जीवनरक्षक उपकरणों या उपचार के सहारे जीवित न रखा जाए। ऐसी स्थिति में चिकित्सकीय निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कानूनी प्रक्रिया के अनुसार लिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने हरीश राणा मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि "Clinically Assisted Nutrition and Hydration (CANH)" भी चिकित्सा उपचार का हिस्सा है और निर्धारित परिस्थितियों में इसे वापस लिया जा सकता है। साथ ही न्यायालय ने कहा कि मरीज के सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Patient) और गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

सरकार ने क्या कहा?
महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि इस नई व्यवस्था से सरकारी और निजी अस्पतालों में एक समान और पारदर्शी प्रक्रिया लागू होगी। इससे मरीज की पहले से दर्ज इच्छा का सम्मान किया जा सकेगा तथा जीवन के अंतिम चरण से जुड़े फैसले कानूनी, नैतिक और चिकित्सकीय मानकों के अनुरूप लिए जाएंगे। सरकार का मानना है कि इससे मरीजों के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होगी और गंभीर रूप से बीमार लोगों को सम्मानजनक तरीके से जीवन के अंतिम चरण का सामना करने का अधिकार मिलेगा।