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इच्छा मृत्यु और लिविंग विल पर महाराष्ट्र सरकार का बड़ा एक्शन, अस्पतालों में 2 मेडिकल बोर्ड अनिवार्य

महाराष्ट्र के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग ने राज्य के सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में लिविंग विल (अग्रिम चिकित्सा निर्देश) और निष्क्रिय इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए दो मेडिकल बोर्डों के गठन को अनिवार्य कर दिया है। यह कदम सुप्रीम कोर्ट द्वारा हरीश राणा बनाम भारत संघ (2026) और कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018) के ऐतिहासिक फैसलों में दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुपालन में उठाया गया है।

Vindhya Dubey18 जुल. 2026, 07:09 PM IST
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इच्छा मृत्यु और लिविंग विल पर महाराष्ट्र सरकार का बड़ा एक्शन, अस्पतालों में 2 मेडिकल बोर्ड अनिवार्य

यह नया शासनादेश इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गंभीर रूप से बीमार मरीजों के गरिमा के साथ मरने के अधिकार को सुनिश्चित करता है और परिवारों के सामने आने वाले असमंजस को समाप्त करता है। सरकार द्वारा इस व्यवस्था को निजी अस्पतालों तक बढ़ाए जाने से अब पूरे राज्य में एक समान और पारदर्शी कानूनी प्रक्रिया लागू होगी, जिससे इलाज रोकने या लाइफ सपोर्ट हटाने जैसे संवेदनशील फैसलों में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं रहेगी। शासनादेश के अनुसार, यदि किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज की पहले से तैयार लिविंग विल के आधार पर लाइफ सपोर्ट या कृत्रिम भोजन और पानी जैसी जीवन रक्षक प्रणालियों को हटाने का प्रश्न उठता है, तो निर्णय केवल निर्धारित प्राथमिक और द्वितीयक मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के बाद ही लागू किया जा सकेगा। निजी अस्पतालों में प्राथमिक मेडिकल बोर्ड का गठन अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर, चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर या मेडिकल सुपरिटेंडेंट करेंगे।


इस प्राथमिक बोर्ड के अध्यक्ष अस्पताल के प्रशासक होंगे, जबकि इसके सदस्यों में मरीज का उपचार करने वाले चिकित्सा विशेषज्ञ, क्रिटिकल केयर स्पेशलिस्ट और एक वरिष्ठ फिजिशियन या सर्जन शामिल होंगे। इसके बाद मामले की दोबारा समीक्षा के लिए एक द्वितीयक मेडिकल बोर्ड का गठन किया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी संबंधित जिले के सिविल सर्जन की होगी। मुंबई और मुंबई उपनगरों में इस द्वितीयक बोर्ड में राज्य संचालित जे. जे. अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट भी सदस्य के रूप में शामिल रहेंगे। इस बोर्ड में अस्पताल के चिकित्सा निदेशक अध्यक्ष होंगे और साथ ही संबंधित विषय के दो अनुभवी विशेषज्ञ और सिविल सर्जन द्वारा नामित पैनल के डॉक्टर शामिल होंगे। सरकार ने सभी जिला प्रशासनों को निर्देश दिया है कि वे डिस्ट्रिक्ट सिविल सर्जनों के माध्यम से योग्य पंजीकृत डॉक्टरों का एक पैनल तैयार करें ताकि जरूरत पड़ने पर अनुभवी विशेषज्ञों की उपलब्धता तुरंत सुनिश्चित की जा सके। सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था सरकारी अस्पतालों में नवंबर 2024 से ही लागू थी, जिसे अब निजी चिकित्सा संस्थानों के लिए भी अनिवार्य कर दिया गया है।


इस फैसले के संबंध में जारी सरकारी प्रस्ताव (जीआर) के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेशों में यह अनिवार्य किया है कि जब भी किसी मरीज की लिविंग विल के तहत उपचार वापस लेने का प्रस्ताव हो, तब दोनों स्तरों के बोर्डों की मंजूरी आवश्यक है। सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के अनुसार, सभी संबंधित जिला अधिकारियों को निर्देशित किया गया है कि वे इस नए नियम की जानकारी अपने अधिकार क्षेत्र के सभी निजी अस्पतालों तक तुरंत पहुंचाएं ताकि मरीजों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की जा सके।