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लंदन के प्रतिष्ठित मंचों पर गूंजा भारतीय वेदांत, आचार्य प्रशांत ने वैश्विक संकटों को झकझोरा

प्रसिद्ध दार्शनिक और लेखक आचार्य प्रशांत ने मई से जुलाई 2026 के दौरान ब्रिटेन के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और संस्थानों का दौरा कर पर्यावरण संकट और चेतना से जुड़े समकालीन वैश्विक मुद्दों पर भारतीय दर्शन के दृष्टिकोण को प्रमुखता से प्रस्तुत किया है। उन्होंने कैम्ब्रिज यूनियन, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) और ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ लॉर्ड्स जैसे वैश्विक मंचों पर विभिन्न विद्वानों के साथ गहन संवाद किया।

Vindhya Dubey19 जुल. 2026, 06:32 PM IST
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लंदन के प्रतिष्ठित मंचों पर गूंजा भारतीय वेदांत, आचार्य प्रशांत ने वैश्विक संकटों को झकझोरा

यह दौरा वैश्विक स्तर पर इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वर्तमान में जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण की लड़ाइयां केवल डेटा और तकनीकों तक सीमित रह गई हैं, जबकि आचार्य प्रशांत ने यह स्पष्ट किया कि बाहरी संकटों की असली जड़ मानवीय अहंकार और आत्मज्ञान की कमी है। उनके इस दृष्टिकोण ने दुनिया के शीर्ष शिक्षाविदों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि बिना आंतरिक बदलाव के कोई भी स्थायी वैश्विक नीति सफल नहीं हो सकती।


लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में आयोजित एक विशेष सत्र में आचार्य प्रशांत और एलएसई के जेरेमी कॉलर सेंटर फॉर एनिमल सेंटिएंस के निदेशक प्रोफेसर जोनाथन बर्च के बीच पशु चेतना और पर्यावरण पर एक सार्वजनिक संवाद हुआ। इस दौरान हांगकांग थिएटर में मौजूद सैकड़ों शोधकर्ताओं और छात्रों के सामने उन्होंने आधुनिक जीवनशैली और पर्यावरण नीतियों की कमियों को उजागर किया। आचार्य प्रशांत ने इस चर्चा में एक शराबी ड्राइवर का उदाहरण देते हुए कहा कि आज की नीतियां दुर्घटना रोकने के लिए बेहतर सड़कों और उन्नत एम्बुलेंस पर ध्यान दे रही हैं, लेकिन ड्राइवर के नशे को दूर करने की कोशिश नहीं की जा रही है।


इसके अलावा उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन (UCL) में प्रोफेसर स्टीव फ्लेमिंग और क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर लारेंस चिटका के साथ भी विभिन्न विषयों पर वैचारिक चर्चा की। इस यात्रा की शुरुआत 30 मई 2026 को कैम्ब्रिज यूनियन में कैम्ब्रिज इंडिया बिजनेस डायलॉग के साथ हुई थी, जहां उन्हें भारतीय चिंतन परंपराओं और जलवायु परिवर्तन पर बोलने के लिए आमंत्रित किया गया था।


इंडो-एशियन न्यूज सर्विस (IANS) की रिपोर्ट के अनुसार, एलएसई में संवाद के बाद आचार्य प्रशांत ने कहा कि प्रदूषण बाहर दिखाई दे रहा है, लेकिन प्रदूषक हमारे भीतर मौजूद है। प्रदूषण मूर्त है, जबकि प्रदूषक अमूर्त है। उन्होंने आगे कहा कि जब तक मानवीय अहंकार बना रहेगा, तब तक बाहरी कानून और तकनीकें केवल एक बैसाखी की तरह काम करेंगी, जो समस्या को पूरी तरह से खत्म नहीं कर सकतीं। वहीं प्रोफेसर जोनाथन बर्च ने इस संवाद के दौरान पशु कल्याण कानूनों के प्रभाव पर चर्चा करते हुए माना कि कानून और नीतियां तब तक आवश्यक हैं जब तक समाज में आंतरिक समझ का विकास नहीं हो जाता। उन्होंने आचार्य प्रशांत के विचारों को समकालीन विज्ञान और दर्शन के बीच एक बेहतरीन सेतु बताया।