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दिल्ली में स्कूल खोलना हुआ बेहद आसान! सरकार ने खत्म किया दशकों पुराना 'इंस्पेक्टर राज' नियम

दिल्ली सरकार के शिक्षा विभाग ने एक बड़ा नीतिगत फैसला लेते हुए नया निजी स्कूल खोलने के लिए दशकों पुराने 'आवश्यकता प्रमाण पत्र' (Essentiality Certificate) की अनिवार्यता को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। शिक्षा मंत्री आशीष सूद की मंजूरी के बाद अब इसकी जगह 'स्व-प्रमाणन' (Self-Certification) प्रणाली लागू कर दी गई है। इसके साथ ही सरकार ने दिल्ली में जमीन की कमी को देखते हुए स्कूल खोलने के लिए भूमि संबंधी नियमों में भी ढील दी है, जिससे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में भी बेहतर स्कूल खुल सकेंगे।

Anshuman Mishra19 जुल. 2026, 06:33 PM IST
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दिल्ली में स्कूल खोलना हुआ बेहद आसान! सरकार ने खत्म किया दशकों पुराना 'इंस्पेक्टर राज' नियम
नई दिल्ली: दिल्ली सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी में निजी स्कूल खोलने के नियमों में ऐतिहासिक बदलाव किया है। सरकार ने स्कूल खोलने के लिए अब तक अनिवार्य रहे 'आवश्यकता प्रमाण पत्र' की व्यवस्था को समाप्त कर उसकी जगह 'स्व-प्रमाणन' (Self-Certification) प्रणाली लागू करने की मंजूरी दे दी है। शिक्षा विभाग के अनुसार, शिक्षा मंत्री आशीष सूद द्वारा स्वीकृत यह फैसला दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम एवं नियम (DSER), 1973 के तहत लंबे समय से चली आ रही प्रक्रियागत बाधाओं को खत्म करने और नियमों को सरल बनाने के लिए लिया गया है।

नई व्यवस्था के तहत अब स्कूल प्रबंधन को केवल यह स्व-प्रमाणित करना होगा कि वे शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 के तहत तय किए गए सभी मानकों जैसे—सुरक्षित और पर्याप्त बुनियादी ढांचा, योग्य शिक्षक, सुरक्षा व्यवस्था और छात्र-शिक्षक अनुपात (PTR) का पूरी तरह पालन करते हैं। आवेदकों को अब यह साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने होंगे कि उस विशेष क्षेत्र में नए स्कूल की जरूरत है या नहीं।
इसके अलावा, सरकार ने दिल्ली के शहरी घनत्व को ध्यान में रखते हुए निजी स्कूलों की स्थापना के लिए न्यूनतम भूमि क्षेत्र (Minimum Land Area) की अनिवार्यता में भी ढील दी है, ताकि रिहायशी इलाकों के पास भी अच्छे स्कूल विकसित हो सकें।

यह कदम सरकार के अनुपालन बोझ को कम करने (Compliance Reduction and Deregulation Exercise) की नीति का हिस्सा है। इसके तहत दिल्ली स्कूल शिक्षा नियम, 1973 के दो प्रमुख नियमों में संशोधन किया गया है:
  • नियम 44(3) में संशोधन: पहले नया स्कूल खोलने के इच्छुक आवेदकों को पहले सरकार को अग्रिम सूचना देनी होती थी और सरकार यह तय करती थी कि उस ज़ोन में स्कूल की आवश्यकता है या नहीं। यह अनिवार्यता अब खत्म कर दी गई है।
  • नियम 50(ii) में संशोधन: पहले मान्यता देने से पूर्व सरकारी अधिकारी उस इलाके में मौजूद पुराने स्कूलों की गिनती कर 'वास्तविक आवश्यकता' का आकलन करते थे। इस प्रतिबंध को भी हटा दिया गया है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है?
  • RTE अधिनियम, 2009 के अनुरूप: केंद्रीय शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून कहता है कि स्कूलों को मान्यता केवल इंफ्रास्ट्रक्चर, सुरक्षा और शिक्षकों की योग्यता जैसे पारदर्शी मानकों के आधार पर मिलनी चाहिए, न कि किसी व्यक्तिपरक (subjective) सरकारी आकलन के आधार पर। यह सुधार दिल्ली के नियमों को सीधे केंद्रीय कानून के समकक्ष लाता है।
  • इंस्पेक्टर राज और भ्रष्टाचार पर लगाम: पहले आवश्यकता प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए लंबी प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता था, जिससे देरी और भ्रष्टाचार की गुंजाइश बनती थी। स्व-प्रमाणन आने से यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो जाएगी।
इसके क्या लाभ होंगे?
  • आसान और त्वरित प्रक्रिया: स्कूल शुरू करने की प्रक्रिया में लगने वाला समय बेहद कम हो जाएगा क्योंकि लालफीताशाही (administrative paperwork) खत्म हो जाएगी।
  • घर के पास शिक्षा: जमीन के नियमों में ढील मिलने से घनी आबादी वाले रिहायशी इलाकों के नजदीक भी गुणवत्तापूर्ण स्कूल खुल सकेंगे। बच्चों को लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ेगी।
  • गुणवत्ता पर ध्यान: सरकार का ध्यान अब कागजी कार्रवाई के बजाय इस बात पर केंद्रित होगा कि स्कूल में बुनियादी ढांचा, सुरक्षा मानक और शिक्षकों की योग्यता कैसी है।
जहाँ एक तरफ सरकार इसे ऐतिहासिक सुधार बता रही है, वहीं शिक्षा अधिकार कार्यकर्ताओं (जैसे वकील अशोक अग्रवाल) का मानना है कि आवश्यकता प्रमाण पत्र हटने और जमीन के नियमों में ढील देने से बिना जरूरत के भी कहीं भी स्कूल खुल जाएंगे, जिससे शिक्षा के व्यवसायीकरण को बढ़ावा मिल सकता है।