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क्या पुरुषों को भी चाहिए भावनात्मक सहारा? आत्महत्या के आंकड़े दे रहे बड़ा संदेश
पिछले कुछ वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ी है। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े अभियान, जागरूकता कार्यक्रम और सोशल मीडिया चर्चाएं भी बढ़ी हैं, लेकिन आंकड़े एक अलग ही तस्वीर दिखाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, साल 2023 में भारत में आत्महत्या से होने वाली कुल मौतों में 72.8% पुरुष थे। यह आंकड़ा पुरुषों के बीच बढ़ते मानसिक स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करता है।

क्लिनिकली ट्रेंड मेंटल हेल्थ एंड वेलबीइंग एक्सपर्ट और राउंडग्लास की ग्लोबल हेड Prakriti Saxena Poddar ने बताया कि समाज में अक्सर यह मान लिया जाता है कि पुरुष अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं करते, लेकिन असल समस्या इससे कहीं ज्यादा गहरी है। उन्होंने कहा, "कई पुरुषों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि मजबूत होने का मतलब है किसी चीज की जरूरत न होना। जिम्मेदारियां निभाते रहना, सहते रहना और आगे बढ़ते रहना। ऐसे में जब जिंदगी मुश्किल दौर में पहुंचती है, तो मदद मांगना उन्हें कमजोरी या असफलता जैसा महसूस हो सकता है।"
पुरुष अपनी परेशानियां क्यों छिपाते हैं?
कई बार पुरुषों को पता होता है कि उनके जीवन में कुछ ठीक नहीं चल रहा है। नींद खराब होना, मूड में बदलाव, लगातार थकान और तनाव जैसे संकेत दिखाई देते हैं, लेकिन वे फिर भी रोजमर्रा की जिम्मेदारियां निभाते रहते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखाई देता है, लेकिन अंदर से व्यक्ति मानसिक संघर्ष से गुजर रहा होता है। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय से समाज में पुरुषों से जुड़ी एक ऐसी सोच बनी हुई है जिसमें भावनाओं को दबाना, कमजोर न दिखना और हर परिस्थिति में मजबूत बने रहना जरूरी माना जाता है।
इसका परिणाम यह होता है कि कई पुरुष परेशानियों से जूझते हुए भी मदद लेने से बचते हैं।
पुरुषों में बढ़ती खामोश अकेलेपन की समस्या
अकेलापन केवल अकेले रहने का नाम नहीं है। कई पुरुषों के पास दोस्त, सहकर्मी और सामाजिक संपर्क होते हैं, फिर भी वे अपनी वास्तविक परेशानियां किसी से साझा नहीं कर पाते।
बढ़ती उम्र के साथ दोस्ती अक्सर काम, जिम्मेदारियों और रोजमर्रा की व्यस्तताओं तक सीमित हो जाती है। भावनाओं, डर, तनाव और व्यक्तिगत संघर्षों पर बातचीत कम होती जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात कर पाना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। भावनात्मक जुड़ाव तनाव से बचाव का एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है।
मानसिक परेशानियों को नजरअंदाज करने का असर
मानसिक तनाव अचानक बड़ी समस्या में नहीं बदलता, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ता है। लंबे समय तक अनदेखा किया गया तनाव आगे चलकर चिंता (Anxiety), डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन, नींद की समस्या, नशे की आदत, सामाजिक दूरी जैसी समस्याओं का कारण बन सकता है। परिवार अक्सर इन बदलावों को सबसे पहले महसूस करता है। व्यक्ति का व्यवहार बदल सकता है, वह बातचीत कम कर सकता है या अपने आसपास के लोगों से दूरी बनाने लग सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को लेकर सोच बदलने की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को केवल गंभीर स्थिति में उठाया जाने वाला कदम नहीं समझना चाहिए।
जिस तरह शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नींद, व्यायाम और संतुलित भोजन जरूरी है, उसी तरह मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी रोजमर्रा की जरूरत है।
मदद मांगना कमजोरी नहीं है। तनाव को संभालना, भावनाओं को समझना और जरूरत पड़ने पर सहायता लेना बेहतर निर्णय लेने, मजबूत रिश्तों और बेहतर जीवन के लिए जरूरी है।
परिवार और दोस्त कैसे कर सकते हैं मदद?
पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में परिवार और दोस्तों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
कुछ छोटे कदम मददगार हो सकते हैं:
- बिना जज किए उनकी बात सुनना
- समय-समय पर हालचाल पूछना
- तनाव और परेशानियों पर खुलकर बातचीत करना
- "मजबूत बनो और सहते रहो" जैसी सोच को बढ़ावा न देना
- जरूरत पड़ने पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेने के लिए प्रोत्साहित करना
अगर भारत में आत्महत्या से होने वाली लगभग तीन-चौथाई मौतें पुरुषों से जुड़ी हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है।
मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करना और मदद मांगने को सामान्य बनाना इस संकट से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। मजबूत होने का मतलब अपनी तकलीफ को छिपाना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर मदद लेना भी है।
