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डिग्री की चाह या हुनर से दूरी? भारतीय उच्च शिक्षा में क्यों पिट रहे हैं 'स्किल ओरिएंटेड' कोर्स?
भारत के विश्वविद्यालयों में एक अजीब विरोधाभास (Paradox) देखने को मिल रहा है। एक तरफ राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत यूनिवर्सिटीज़ में 'वोकेशनल' (व्यावसायिक या स्किल-बेस्ड) कोर्स शुरू किए गए ताकि छात्रों को सीधे रोज़गार मिल सके। लेकिन हाल ही में, कई यूनिवर्सिटीज़ (जैसे दिल्ली यूनिवर्सिटी) में कम एडमिशन या कम सीटों के भरने के कारण इन रोजगार-परक वोकेशनल कोर्सेज को बंद करने की नौबत आ रही है। छात्र आज भी पुराने और पारंपरिक डिग्री कोर्सेज (जैसे B.Com, English, History) को सुरक्षित मानते हैं। यदि कम एडमिशन के कारण स्किल्स सिखाने वाले कोर्सेज बंद कर दिए गए, तो भारत का शिक्षा तंत्र बाजार की ज़रूरतों के हिसाब से कभी बदल नहीं पाएगा।
Anshuman Mishra20 जुल. 2026, 09:54 PM IST

नई दिल्ली: भारत के उच्च शिक्षा तंत्र में इस समय एक बड़ा विरोधाभास खड़ा हो गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) जहां मुख्यधारा की शिक्षा में व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) को जोड़ने और डिग्री व स्किल्स के बीच की दूरी को पाटने की वकालत करती है, वहीं ज़मीनी हकीकत इसके उलट दिख रही है।
हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) और देश की कई अन्य बड़ी यूनिवर्सिटीज़ में एक गंभीर चिंता सामने आई है। एडमिशन के लिए बनाई गई केंद्रीय प्रणालियों (जैसे CSAS) के डेटा के आधार पर, उन कोर्सेज की समीक्षा की जा रही है जिनमें छात्र कम रुचि ले रहे हैं। चिंता की बात यह है कि इस समीक्षा के कारण उन नए व्यावसायिक और तकनीकी कोर्सेज को बंद करने की बात चल रही है, जिन्हें रोज़गार बढ़ाने के लिए शुरू किया गया था।
पारंपरिक डिग्री बनाम स्किल कोर्सेज
भारत में हर साल लाखों छात्र पारंपरिक डिग्री (जैसे Commerce, Arts, Economics) को चुनते हैं, क्योंकि समाज, माता-पिता और करियर काउंसिलर्स इन्हें सुरक्षित और सामाजिक रूप से स्वीकार्य मानते हैं। इसके विपरीत, वोकेशनल कोर्सेज नए हैं और इनके बारे में जागरूकता बेहद कम है। इसी वजह से शुरुआती सालों में इनमें कम एडमिशन (Low Enrolment) होते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विश्वविद्यालय 'कम मांग' को 'कम मूल्य' (Low Value) मानकर इन कोर्सेज को बंद करने लगेंगे, तो इससे भारत का स्किलिंग इकोसिस्टम पूरी तरह कमजोर हो जाएगा। 18 साल के छात्र अक्सर भविष्य के मार्केट ट्रेंड्स को जाने बिना कोर्स चुनते हैं, ऐसे में यूनिवर्सिटीज़ की जिम्मेदारी उनकी प्राथमिकताओं को सही दिशा देने की है, न कि कोर्सेज को बंद करने की।
यह विरोधाभास (Paradox) क्या है और आंकड़े क्या कहते हैं?
भारत का 'स्किलिंग विरोधाभास' यह है कि एक तरफ तो कंपनियां कहती हैं कि उन्हें हुनरमंद (Skilled) कर्मचारी नहीं मिल रहे हैं, और दूसरी तरफ देश में लाखों पढ़े-लिखे डिग्री धारक बेरोज़गार घूम रहे हैं।
- बेरोज़गारी और डिग्री का संबंध: 'इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट' और प्रमुख रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में कुल बेरोजगारों में लगभग 83% हिस्सेदारी युवाओं की है। चौंकाने वाली बात यह है कि ग्रेजुएशन या उससे ऊपर की डिग्री रखने वाले युवाओं में बेरोज़गारी की दर लगभग 30% तक पहुंच जाती है।
- रोजगार योग्यता (Employability): 'इंडिया स्किल्स रिपोर्ट' के मुताबिक, कॉलेजों से निकलने वाले केवल *46% से 54% ग्रेजुएट्स* ही नौकरी के लिए पूरी तरह योग्य (Work-ready) होते हैं।
- वैश्विक तुलना: भारत की वर्कफोर्स में से केवल 2% से 5% लोगों के पास ही औपचारिक वोकेशनल ट्रेनिंग (Formal Vocational Training) है। जबकि इसकी तुलना में ब्रिटेन में 68%, जर्मनी में 75% और दक्षिण कोरिया में 96% वर्कफोर्स स्किल्ड है।
यह मुद्दा भारत के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि:
1. डेमोग्राफिक डिविडेंड (Demographic Dividend) का खतरा: भारत इस समय दुनिया का सबसे युवा देश है, जिसकी 50% से अधिक आबादी कार्यशील आयु (Working Age) में है। इसे 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' कहते हैं। अगर इस युवा आबादी को सही समय पर सही स्किल्स नहीं मिलीं, तो यह वरदान के बजाय देश के लिए एक बड़ी चुनौती (आर्थिक बोझ) बन जाएगा।
2. बाजार और शिक्षा में तालमेल की कमी: आज की कंपनियां AI, क्लाउड कंप्यूटिंग और ऑटोमेशन जैसी स्किल्स चाहती हैं, लेकिन हमारे विश्वविद्यालय आज भी दशकों पुराने सिलेबस पढ़ा रहे हैं।
3. अनौपचारिक क्षेत्र (Informal Sector) का जाल: भारत के लगभग 90% से अधिक श्रमिक अनौपचारिक क्षेत्र (जैसे दिहाड़ी मजदूरी या छोटे असंगठित काम) में हैं, जहां स्किल्स अपग्रेड करने का मौका नहीं मिलता। इस जाल को तोड़ने के लिए कॉलेज स्तर पर ही वोकेशनल ट्रेनिंग ज़रूरी है।
अगर विश्वविद्यालय व्यावसायिक शिक्षा को बंद करने के बजाय उसे बढ़ावा देते हैं, तो इसके निम्नलिखित लाभ होंगे:
- सीधा रोज़गार (Direct Employability): छात्रों को ग्रेजुएशन के बाद नौकरी ढूंढने के लिए अलग से कोचिंग या ट्रेनिंग नहीं लेनी पड़ेगी। डिग्री खत्म होते ही वे इंडस्ट्री के लिए तैयार होंगे।
- विदेशी निवेश और आर्थिक विकास: जब भारत के पास एक विशाल स्किल्ड वर्कफोर्स होगी, तो वैश्विक कंपनियां चीन के विकल्प के रूप में भारत में अपने मैन्युफैक्चरिंग और टेक हब खोलेंगी, जिससे देश की जीडीपी तेजी से बढ़ेगी।
- उच्च वेतन (Higher Salary Premiums): आज के समय में ट्रेडिशनल डिग्री धारकों के मुकाबले डेटा, एआई और व्यावहारिक कौशल (Applied Skills) जानने वाले युवाओं को 80% तक अधिक सैलरी पैकेज मिल रहा है।
- स्टार्टअप और उद्यमिता (Entrepreneurship): व्यावहारिक ज्ञान से युवाओं में खुद का स्टार्टअप शुरू करने का आत्मविश्वास आता है, जिससे वे नौकरी मांगने वाले नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले (Job Creators) बनते हैं।
विश्वविद्यालयों को एडमिशन की कम संख्या को देखकर वोकेशनल कोर्सेज को बंद नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें सफल बनाने के लिए ये कदम उठाने चाहिए:
- इंडस्ट्री के साथ पार्टनरशिप: कोर्सेज को सीधे कंपनियों की ज़रूरतों के हिसाब से डिजाइन किया जाए।
- इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप: थ्योरी के बजाय 'काम करते हुए सीखने' (Learning-by-doing) पर ज़ोर दिया जाए।
- जागरूकता अभियान: माता-पिता और छात्रों की काउंसलिंग की जाए ताकि वे वोकेशनल कोर्सेज को कमतर न समझें।
