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चार वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को इलाज से वंचित करने पर सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर और अस्पतालों को फटकारा

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा – “गरीब होने के कारण बच्ची को अनदेखा किया गया, डॉक्टर कहलाने का कोई अधिकार नहीं।”

Sonali20 जुल. 2026, 09:55 PM IST
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चार वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को इलाज से वंचित करने पर सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर और अस्पतालों को फटकारा
गाज़ियाबाद में 16 मार्च 2026 को चार वर्षीय बच्ची को पड़ोसी ने चॉकलेट दिलाने के बहाने घर से बाहर ले जाकर दुष्कर्म किया और उसकी हत्या कर दी। बच्ची को गंभीर हालत में दो निजी अस्पतालों – खजान सिंह मानवी हेल्थकेयर और सेंट जोसेफ (मरियम) अस्पताल – ले जाया गया, लेकिन दोनों ने भर्ती करने से इनकार कर दिया। अंततः सरकारी अस्पताल में बच्ची को मृत घोषित कर दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश
तारीख: 17 जुलाई 2026
पीठ:
 मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना
टिप्पणी:
 अदालत ने कहा – “आपके नाम के आगे डॉक्टर लिखने का कोई अधिकार नहीं, यदि आप अपना कर्तव्य निभा नहीं सकते। यदि संवेदनशीलता होती तो बच्ची को दूसरे अस्पताल ले जाते।”

निर्देश: 
दोनों अस्पतालों को पीड़ित परिवार को उचित मुआवज़ा देने का आदेश दिया गया, अन्यथा कठोर कार्रवाई की चेतावनी दी गई।

पुलिस जांच की कमियां
FIR दर्ज करने में देरी हुई और शुरुआती FIR में POCSO एक्ट की धाराएं शामिल नहीं की गईं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गाज़ियाबाद पुलिस ने मामले को “हश-हश” तरीके से निपटाने की कोशिश की।
परिवार ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें बयान बदलने और चुप रहने के लिए दबाव डाला।
अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने महिला अधिकारियों की अगुवाई में SIT गठित करने का आदेश दिया, जिसमें कमिश्नर/आईजी रैंक की महिला अधिकारी, SP और DSP स्तर की महिला अधिकारी शामिल हैं। SIT को अस्पतालों की भूमिका और पुलिस की लापरवाही दोनों की जांच करने का निर्देश दिया गया।

बाल संरक्षण समितियों की प्रतिक्रिया
उत्तर प्रदेश बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee): समिति ने कहा कि यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं और पुलिस की संवेदनशीलता की कमी को उजागर करती है।
बाल सुरक्षा समिति (Baal Suraksha Samiti): समिति अध्यक्ष ने बयान दिया कि “ऐसे मामलों में तुरंत चिकित्सा सुविधा और पुलिस कार्रवाई सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। इस घटना ने व्यवस्था की खामियों को उजागर किया है।”

निष्कर्ष
यह मामला स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही, बाल यौन अपराधों के प्रति संवेदनशीलता और गरीब परिवारों के प्रति भेदभाव को उजागर करता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपातकालीन चिकित्सा सेवा से इनकार करना अस्वीकार्य है और ऐसे मामलों में डॉक्टरों व अस्पतालों को कठोर जवाबदेही का सामना करना होगा। साथ ही पुलिस की लापरवाही को देखते हुए SIT जांच का आदेश दिया गया ताकि मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो सके।