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देहरादून का 'सात मोड़' बना पर्यावरण बनाम विकास की जंग का केंद्र: 4,369 पेड़ों की कटाई पर उठे सवाल, सड़क परियोजना के फायदे और जंगलों के भविष्य पर बड़ी बहस

उत्तराखंड के देहरादून में राष्ट्रीय राजमार्ग चौड़ीकरण परियोजना के लिए हजारों पेड़ों की कटाई के खिलाफ स्थानीय लोग, पर्यावरणविद और सामाजिक संगठन एकजुट हो गए हैं। एक ओर सरकार और NHAI इसे विकास, पर्यटन और सुरक्षा के लिए जरूरी बता रहे हैं, तो दूसरी ओर विशेषज्ञ जंगल, हाथी कॉरिडोर और जैव विविधता पर गंभीर खतरे की चेतावनी दे रहे हैं।

Anshuman Mishra20 जुल. 2026, 09:55 PM IST
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देहरादून का 'सात मोड़' बना पर्यावरण बनाम विकास की जंग का केंद्र: 4,369 पेड़ों की कटाई पर उठे सवाल, सड़क परियोजना के फायदे और जंगलों के भविष्य पर बड़ी बहस
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उत्तराखंड: उत्तराखंड के देहरादून में राष्ट्रीय राजमार्ग चौड़ीकरण परियोजना के लिए हजारों पेड़ों की कटाई के खिलाफ स्थानीय लोग, पर्यावरणविद और सामाजिक संगठन एकजुट हो गए हैं। एक ओर सरकार और NHAI इसे विकास, पर्यटन और सुरक्षा के लिए जरूरी बता रहे हैं, तो दूसरी ओर विशेषज्ञ जंगल, हाथी कॉरिडोर और जैव विविधता पर गंभीर खतरे की चेतावनी दे रहे हैं। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के भानियावाला–जॉली ग्रांट–ऋषिकेश राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-7) को चार और छह लेन में बदलने की परियोजना इस समय देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। लगभग 20 किलोमीटर लंबे इस हाईवे प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब 743 करोड़ रुपये है। इस परियोजना के लिए कुल 4,369 पेड़ों को प्रभावित किया जाएगा, जिनमें लगभग 3,605 पेड़ों को काटने और 754 पेड़ों को दूसरी जगह प्रतिरोपित (Transplant) करने की योजना है। इसी फैसले के विरोध में देहरादून के 'सात मोड़' क्षेत्र में लगातार प्रदर्शन हो रहे हैं। 

विरोध क्यों हो रहा है?
स्थानीय ग्रामीणों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और कई सामाजिक संगठनों का कहना है कि जिन साल (Sal) के पेड़ों को काटा जा रहा है, उन्हें विकसित होने में 100 से 200 वर्ष तक का समय लगता है, लेकिन उन्हें कुछ ही मिनटों में खत्म किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सड़क चौड़ीकरण के नाम पर शिवालिक के महत्वपूर्ण जंगलों और वन्यजीवों को स्थायी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। प्रदर्शन के दौरान लोगों ने 'काला हरेला' मनाकर अपना विरोध दर्ज कराया। उत्तराखंड का हरेला पर्व प्रकृति, हरियाली और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक माना जाता है। इस बार इसे पेड़ों की कटाई के विरोध के रूप में मनाया गया। 

परियोजना को लेकर NHAI का पक्ष
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) का कहना है कि वर्तमान दो-लेन सड़क पर प्रतिदिन लगभग 18,000 से अधिक वाहन गुजरते हैं। चारधाम यात्रा, पर्यटन और जॉली ग्रांट एयरपोर्ट की बढ़ती आवाजाही के कारण यातायात लगातार बढ़ रहा है।

एजेंसी के अनुसार नई सड़क बनने से
  • ट्रैफिक जाम कम होगा। 
  • दुर्घटनाओं में कमी आएगी। 
  • चारधाम यात्रा अधिक सुरक्षित और तेज होगी। 
  • एयरपोर्ट तक बेहतर कनेक्टिविटी मिलेगी 
  • स्थानीय व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। 
  • आधुनिक सड़क सुरक्षा सुविधाएं विकसित होंगी।
NHAI का यह भी दावा है कि परियोजना में हाथियों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षित आवाजाही के लिए अंडरपास, बॉक्स कल्वर्ट और अन्य वैज्ञानिक उपाय शामिल किए गए हैं। साथ ही राज्य सरकार ने क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) के लिए लगभग 40 हेक्टेयर गैर-वन भूमि वन विभाग को उपलब्ध कराई है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल नए पौधे लगाने से दशकों पुराने जंगलों की भरपाई संभव नहीं होती।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं के अनुसार
  • यह क्षेत्र हाथियों के महत्वपूर्ण कॉरिडोर का हिस्सा है। 
  • बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से जैव विविधता प्रभावित होगी। 
  • तापमान में वृद्धि और स्थानीय जलवायु पर असर पड़ सकता है। 
  • भूजल पुनर्भरण और वर्षा जल संरक्षण की प्राकृतिक व्यवस्था कमजोर हो सकती है। 
  • पक्षियों, सरीसृपों और छोटे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास समाप्त होने का खतरा है।
विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि एक परिपक्व पेड़ हर वर्ष बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करता है, ऑक्सीजन प्रदान करता है और मिट्टी को कटाव से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए सैकड़ों वर्ष पुराने जंगलों का नुकसान केवल पौधारोपण से पूरा नहीं किया जा सकता। 

पेड़ों के प्रतिरोपण पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं ने उत्तराखंड की पुरानी परियोजनाओं का हवाला दिया है। वर्ष 2022 में सहस्रधारा रोड चौड़ीकरण के दौरान भी सैकड़ों पेड़ों को दूसरी जगह स्थानांतरित किया गया था, लेकिन अधिकांश पेड़ जीवित नहीं रह सके। कई स्थानों को आज स्थानीय लोग "ट्री ग्रेवयार्ड" यानी पेड़ों का कब्रिस्तान कहकर पुकारते हैं। यही कारण है कि इस बार भी प्रतिरोपण के दावों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। 

परियोजना को लेकर उत्तराखंड हाईकोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय तक मामला पहुंच चुका है। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने हाथी कॉरिडोर और जंगलों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर याचिकाएं दायर की हैं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण से जुड़े कई बड़े मुद्दे पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय में लंबित हैं और अंतिम निर्णय वहीं होगा। इसी बीच पेड़ों की कटाई को लेकर कानूनी विवाद और तेज हो गया है। 

उत्तराखंड में जंगलों की स्थिति
सूचना के अधिकार (RTI) से सामने आए आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पिछले लगभग 25 वर्षों में 46,000 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि विभिन्न विकास परियोजनाओं—जैसे सड़क, खनन और अन्य बुनियादी ढांचा निर्माण—के लिए हस्तांतरित की जा चुकी है। इनमें सबसे अधिक वन भूमि देहरादून जिले में हस्तांतरित हुई है, जिससे पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता और बढ़ गई है। 

यह मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
यह विवाद केवल 4,369 पेड़ों की कटाई का नहीं है, बल्कि भारत में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक का उदाहरण बन गया है। यदि सड़क परियोजना समय पर पूरी होती है तो क्षेत्र में यातायात, पर्यटन, व्यापार और चारधाम यात्रा को बड़ा लाभ मिल सकता है। वहीं यदि पर्यावरणीय प्रभावों का पर्याप्त आकलन नहीं किया गया, तो जंगल, हाथी कॉरिडोर, जैव विविधता और स्थानीय जलवायु को दीर्घकालिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही कारण है कि देहरादून का 'सात मोड़' अब पूरे देश में विकास बनाम पर्यावरण की बहस का प्रतीक बन गया है, जहां एक ओर आधुनिक बुनियादी ढांचे की जरूरत है तो दूसरी ओर प्रकृति और भविष्य की पीढ़ियों के लिए जंगलों का संरक्षण भी उतना ही आवश्यक माना जा रहा है। 

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