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मध्य प्रदेश में जंगल बचाने की मांग तेज: कोरकू आदिवासियों ने वन अतिक्रमण हटाने के लिए सरकार से की सख्त कार्रवाई की अपील।

मध्य प्रदेश के खंडवा और बुरहानपुर जिलों में कोरकू आदिवासी समुदाय ने वन भूमि पर बढ़ते कथित अवैध अतिक्रमण के खिलाफ आंदोलन शुरू किया है। लगभग 150 गांवों के करीब 2,000 आदिवासियों ने सरकार से जंगलों को अतिक्रमण मुक्त करने, अवैध कब्जे रोकने और वन संरक्षण को मजबूत करने की मांग की है। उनका कहना है कि जंगल उनके जीवन, आजीविका और संस्कृति का आधार हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो जैव विविधता, वन्यजीवों के आवास और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ सकता है। यह मामला वन संरक्षण, आदिवासी अधिकारों और पर्यावरणीय संतुलन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Anshuman Mishra20 जुल. 2026, 09:56 PM IST
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मध्य प्रदेश में जंगल बचाने की मांग तेज: कोरकू आदिवासियों ने वन अतिक्रमण हटाने के लिए सरकार से की सख्त कार्रवाई की अपील।
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मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश के खंडवा और बुरहानपुर जिलों में रहने वाले कोरकू आदिवासियों ने वन भूमि पर हो रहे कथित अवैध अतिक्रमण को हटाने की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन शुरू किया है। लगभग 150 गांवों से करीब 2,000 आदिवासी समुदाय के लोग एकजुट होकर राज्य सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाने निकले। उनका कहना है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि उनकी आजीविका, संस्कृति, परंपरा और अस्तित्व का आधार हैं। यदि जंगल लगातार सिकुड़ते रहे तो आने वाले वर्षों में आदिवासी समाज के साथ-साथ पर्यावरण और वन्यजीवों पर भी गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा।  कोरकू समुदाय का आरोप है कि वर्ष 2020 के बाद से खंडवा और बुरहानपुर के कई वन क्षेत्रों में तेजी से अतिक्रमण बढ़ा है। उनका कहना है कि बाहरी लोगों द्वारा जंगलों की कटाई कर खेती और अन्य उपयोग के लिए वन भूमि पर कब्जा किया जा रहा है। इससे जंगलों का क्षेत्रफल घट रहा है, वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहा है और स्थानीय आदिवासियों की पारंपरिक आजीविका पर संकट गहरा गया है। 

कोरकू समुदाय की प्रमुख मांगें
आदिवासी समुदाय ने राज्य सरकार और वन विभाग के सामने कई महत्वपूर्ण मांगें रखी हैं। इनमें वन भूमि से अवैध अतिक्रमण हटाना, दोबारा अतिक्रमण रोकने के लिए स्थायी व्यवस्था बनाना, संयुक्त वन प्रबंधन समितियों (Joint Forest Management) को अधिक अधिकार और संसाधन देना तथा वन क्षेत्रों में नियमित निगरानी और कानून का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना शामिल है। समुदाय का कहना है कि केवल एक बार कार्रवाई करने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि लगातार निगरानी और संरक्षण की आवश्यकता है। कोरकू आदिवासी समुदाय सदियों से जंगलों पर निर्भर रहा है। उनकी आजीविका का बड़ा हिस्सा महुआ, तेंदूपत्ता, चिरौंजी, गोंद, औषधीय पौधों, शहद और ईंधन की लकड़ी जैसे लघु वनोपज पर आधारित है। यही संसाधन उनके भोजन, आय और पारंपरिक जीवनशैली का आधार हैं। जंगल कम होने का सीधा असर इन संसाधनों की उपलब्धता पर पड़ता है, जिससे आर्थिक और सामाजिक दोनों प्रकार की समस्याएं बढ़ती हैं। 

वन अतिक्रमण क्यों बन रहा है बड़ा खतरा?
विशेषज्ञों के अनुसार वन अतिक्रमण केवल पेड़ों की कटाई तक सीमित समस्या नहीं है। इससे जैव विविधता में गिरावट आती है, वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट होता है, मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है, जल स्रोत प्रभावित होते हैं और जलवायु परिवर्तन की चुनौती और गंभीर हो जाती है। लंबे समय तक वन क्षेत्रों में अनियंत्रित अतिक्रमण रहने से मिट्टी का क्षरण, भूजल स्तर में गिरावट और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।  भारत में वन संरक्षण के लिए भारतीय वन अधिनियम, वन (संरक्षण) अधिनियम 1980, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 तथा विभिन्न राज्य स्तरीय वन नियम लागू हैं। वन भूमि से अवैध अतिक्रमण हटाना राज्य सरकार और वन विभाग की जिम्मेदारी होती है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी कार्रवाई में वैध वनाधिकार रखने वाले पारंपरिक वनवासियों और अवैध कब्जाधारियों के बीच स्पष्ट अंतर करना आवश्यक है, ताकि वास्तविक वनाधिकार धारकों के अधिकार प्रभावित न हों। 

यदि सरकार कार्रवाई करती है तो क्या होंगे संभावित लाभ?
यदि वन अतिक्रमण प्रभावी ढंग से हटाया जाता है और दोबारा कब्जा रोकने के लिए स्थायी व्यवस्था बनाई जाती है, तो इससे जंगलों का संरक्षण मजबूत होगा। वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास सुरक्षित रहेंगे, आदिवासी समुदायों को लघु वनोपज पहले की तरह उपलब्ध हो सकेगी, जल स्रोतों का संरक्षण होगा और कार्बन अवशोषण क्षमता बढ़ने से जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मदद मिलेगी। इसके साथ ही संयुक्त वन प्रबंधन समितियों को मजबूत करने से स्थानीय समुदायों की भागीदारी बढ़ेगी और वन संरक्षण अधिक प्रभावी हो सकेगा। 

यह मामला केवल मध्य प्रदेश के दो जिलों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में वन संरक्षण, आदिवासी अधिकार और पर्यावरणीय संतुलन के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती को सामने लाता है। एक ओर सरकारें विकास और बुनियादी ढांचे को आगे बढ़ा रही हैं, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक वन समुदाय अपने प्राकृतिक संसाधनों और जीवनशैली को बचाने की मांग कर रहे हैं। ऐसे में वैज्ञानिक वन प्रबंधन, कानून का निष्पक्ष पालन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ही दीर्घकालिक समाधान का आधार बन सकती है।