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सिर्फ संयुक्त परिवार होने से नहीं बदल जाएगा संपत्ति का मालिकाना हक: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल संयुक्त हिंदू परिवार का अस्तित्व किसी सदस्य के नाम दर्ज हर संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं बना देता। अदालत ने कहा कि ऐसा दावा करने वाले पक्ष को यह साबित करना होगा कि संबंधित संपत्ति वास्तव में संयुक्त पारिवारिक निधि से खरीदी गई थी।
Sonali20 जुल. 2026, 09:57 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति चंद्र कुमार राय की एकलपीठ ने "Pardeshi v. D.D.C. and Others" मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल संयुक्त हिंदू परिवार का अस्तित्व होने से यह मान लेना उचित नहीं है कि परिवार के किसी सदस्य के नाम दर्ज प्रत्येक संपत्ति संयुक्त परिवार की संपत्ति है।
मामला उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के बारो गांव स्थित खाता संख्या 277 के तीन भूखंडों से जुड़ा था। चकबंदी की मूल कार्यवाही में यह भूमि केवल चेताई के पुत्रों के नाम 'सिरदार' के रूप में दर्ज थी। बाद में चेताई के भाइयों जगलाल और फौजदार ने उत्तर प्रदेश चकबंदी अधिनियम, 1953 की धारा 9-A(2) के तहत आपत्ति दाखिल कर स्वयं को सह-काश्तकार दर्ज करने की मांग की। उनका कहना था कि यह भूमि मूल रूप से उनके पूर्वज घिरऊ की थी और बाद में संयुक्त रूप से उत्तराधिकार में मिली थी।
वहीं, याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा कि विवादित भूमि चेताई ने अपने भाइयों से अलग होने के बाद अपनी व्यक्तिगत आय से खरीदी थी। उन्होंने यह भी कहा कि इस भूमि का किसी संयुक्त पारिवारिक संपत्ति से कोई संबंध नहीं था और न ही प्रतिवादियों ने यह दावा किया कि इसे संयुक्त परिवार की निधि से खरीदा गया था।
चकबंदी अधिकारी ने 30 मई 1978 को प्रतिवादियों के पक्ष में आदेश पारित किया था, लेकिन अपील में 29 दिसंबर 1978 को सहायक सेटलमेंट अधिकारी (चकबंदी) ने वह आदेश निरस्त करते हुए भूमि केवल याचिकाकर्ताओं के नाम दर्ज करने का निर्देश दिया। इसके बाद डिप्टी डायरेक्टर ऑफ कंसोलिडेशन ने 17 अगस्त 1979 को अपीलीय आदेश पलट दिया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 1979 में उत्तर प्रदेश चकबंदी अधिनियम की धारा 48 के तहत डिप्टी डायरेक्टर ऑफ कंसोलिडेशन की पुनरीक्षण (Revision) संबंधी शक्तियां सीमित थीं। अदालत ने यह भी पाया कि राजस्व अभिलेखों की व्याख्या में तथ्यात्मक त्रुटियां की गई थीं और अपीलीय प्राधिकारी के निष्कर्षों को पर्याप्त आधार के बिना पलट दिया गया।
अदालत ने अपने फैसले में "राम चंद्र दुबे बनाम डिप्टी डायरेक्टर ऑफ कंसोलिडेशन, देवरिया" तथा "बाला चरण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य" जैसे पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि संयुक्त हिंदू परिवार होने का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन संयुक्त पारिवारिक संपत्ति होने का नहीं। यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति बताता है, तो उसे यह सिद्ध करना होगा कि वह संपत्ति संयुक्त परिवार की निधि से अर्जित की गई थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू कानून के तहत संयुक्त परिवार का कोई सदस्य अपनी व्यक्तिगत आय से अलग संपत्ति अर्जित कर सकता है और उस पर अन्य सह-उत्तराधिकारियों का स्वतः कोई अधिकार नहीं बनता। जब तक यह प्रमाणित न हो जाए कि संपत्ति संयुक्त परिवार के फंड से खरीदी गई है, तब तक सह-स्वामित्व या सह-काश्तकारी का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।
चूंकि प्रतिवादी यह साबित नहीं कर सके कि विवादित भूमि संयुक्त परिवार के फंड से खरीदी गई थी, इसलिए उन्हें सह-काश्तकारी का अधिकार नहीं दिया जा सकता। हाईकोर्ट ने 17 अगस्त 1979 के पुनरीक्षण आदेश को रद्द करते हुए 29 दिसंबर 1978 के अपीलीय आदेश को बहाल कर दिया। मामले में किसी भी पक्ष पर लागत नहीं लगाई गई।
कोर्ट: इलाहाबाद हाईकोर्ट
पीठ: न्यायमूर्ति चंद्र कुमार राय
केस: Pardeshi v. D.D.C. and Others
मुख्य कानूनी सिद्धांत:
संयुक्त हिंदू परिवार का सदस्य अपनी व्यक्तिगत आय से अलग संपत्ति खरीद सकता है। केवल संयुक्त परिवार का सदस्य होने के आधार पर अन्य सह-उत्तराधिकारी उस संपत्ति पर अधिकार का दावा नहीं कर सकते। ऐसा दावा तभी स्वीकार होगा, जब यह सिद्ध किया जाए कि संपत्ति संयुक्त परिवार की निधि से खरीदी गई थी।
