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मंदिरों की संपत्ति पर सुप्रीम कोर्ट की दोटूक: सिर्फ सरकार नहीं, पुजारियों की भूमिका भी सवालों के घेरे में
मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल सरकारों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि कई पुजारी भी मंदिरों की संपत्तियों को बर्बाद कर रहे हैं। शीर्ष अदालत ने मामले में केंद्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सरकार को नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया कि मंदिर की संपत्ति किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि देवता की होती है।
Sonali20 जुल. 2026, 09:57 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को निजी मंदिरों और उनकी संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण के खिलाफ दायर एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि केवल सरकारों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि कई मामलों में पुजारी भी मंदिरों की संपत्तियों को बर्बाद कर रहे हैं। अदालत ने यह भी कहा कि मंदिर की भूमि किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि देवता (Deity) की होती है।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ 237 वंशानुगत पुजारियों एवं निजी मंदिरों के मालिकों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में दावा किया गया है कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में उनके पूर्वजों द्वारा स्थापित निजी मंदिरों की जमीन पर सरकार अवैध रूप से नियंत्रण कर रही है तथा कलेक्टरों को प्रबंधक नियुक्त कर मंदिरों की संपत्तियों की नीलामी की जा रही है। पीठ ने मामले में केंद्र सरकार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अरविंद कुमार ने पूछा कि यदि वर्ष 1974 के सरकारी परिपत्र के आधार पर राजस्व अभिलेखों में कलेक्टर का नाम दर्ज हुआ था तो याचिकाकर्ता पिछले लगभग 60 वर्षों तक क्या कर रहे थे। जब याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि अब मंदिर की जमीन की नीलामी की जा रही है, तब अदालत ने टिप्पणी की, "आप जानते हैं कि कई पुजारी मंदिरों की संपत्तियां बर्बाद कर रहे हैं। ऐसे अनेक मामले हमारे सामने आते हैं। वास्तव में भूमि देवता की होती है।"
पीठ ने यह भी मौखिक टिप्पणी की कि जब वह लगभग 22 वर्ष पहले मथुरा गए थे, तब वहां का मंदिर परिसर बदहाल स्थिति में था, जबकि हाल ही में दोबारा जाने पर वहां का रखरखाव और विकास देखकर आश्चर्य हुआ। अदालत ने संकेत दिया कि हर मामले में सरकारी हस्तक्षेप को गलत नहीं कहा जा सकता।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की गई है कि एक स्वतंत्र प्राधिकरण या ट्रिब्यूनल गठित किया जाए, जो यह तय करे कि संबंधित मंदिर निजी हैं या सार्वजनिक। साथ ही 12 अप्रैल 1974 के सरकारी परिपत्र तथा राजस्व रिकॉर्ड में कलेक्टर को प्रबंधक दर्शाने वाली प्रविष्टियों को रद्द कर याचिकाकर्ताओं के नाम वंशानुगत पुजारी एवं मालिक के रूप में बहाल किए जाएं। इसके अतिरिक्त मंदिरों की संपत्तियों की नीलामी, ध्वस्तीकरण या अन्य किसी भी प्रकार की जबरन कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगाने की भी मांग की गई है।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब सुप्रीम कोर्ट पहले से ही विभिन्न राज्यों के मंदिर नियंत्रण कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है। मई 2026 में केंद्र सरकार ने अपना रुख बदलते हुए सर्वोच्च न्यायालय से कहा था कि इन सभी मामलों की सुनवाई एक साथ सुप्रीम कोर्ट में ही हो सकती है, क्योंकि इनमें समान संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं।
मामले का विवरण:
मामला: Purandas v. Union of Indiaरिट याचिका (सिविल) संख्या: W.P.(C) No. 828/2026डायरी संख्या: 33767/2026पीठ: न्यायमूर्ति अरविंद कुमार एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधेसुनवाई की तारीख: 20 जुलाई 2026.
