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रीसाइक्लिंग लक्ष्य पूरा नहीं तो भारी जुर्माना: कंपनियों पर ₹7,900 प्रति टन तक पेनल्टी।

भारत सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट और EPR (Extended Producer Responsibility) नियमों को सख्ती से लागू करना शुरू कर दिया है। रीसाइक्लिंग लक्ष्य पूरा न करने वाली कंपनियों पर ₹2,900 से ₹7,900 प्रति टन तक का भारी जुर्माना लगाया जा रहा है। फर्जी EPR सर्टिफिकेट खरीदने, रजिस्ट्रेशन न कराने और समय पर रिटर्न फाइल न करने वाली कंपनियों पर भी कार्रवाई तेज हो गई है। साथ ही, 2026 से प्लास्टिक की अलग-अलग श्रेणियों के लिए रीसाइक्लिंग लक्ष्य बढ़ाए जाएंगे। महाराष्ट्र के डोंबिवली MIDC में केमिकल, पैकेजिंग और टेक्सटाइल यूनिट्स पर विशेष कार्रवाई की जा रही है, जहां कई इकाइयों को नोटिस, सस्पेंशन और बिजली-पानी कटौती जैसे कड़े कदम उठाए गए हैं।

Anshuman Mishra20 जुल. 2026, 09:58 PM IST
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रीसाइक्लिंग लक्ष्य पूरा नहीं तो भारी जुर्माना: कंपनियों पर ₹7,900 प्रति टन तक पेनल्टी।
भारत सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने कॉर्पोरेट जगत के लिए नियमों को बेहद सख्त कर दिया है। यदि कोई कंपनी तय समय सीमा के भीतर अपने रीसाइक्लिंग लक्ष्यों को पूरा नहीं करती है, तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जा रहा है।

कंपनियों पर लगाए जा रहे हालिया जुर्माने और उनके कारण
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर पर्यावरणीय मुआवजा (Environmental Compensation) लगाना शुरू कर दिया है। यह जुर्माना केवल एक बार लगने वाली पेनल्टी नहीं है, बल्कि यह रीसाइक्लिंग लक्ष्य में रह गई कमी (Shortfall) के आधार पर प्रति टन के हिसाब से वसूला जा रहा है:
  • जुर्माने की तय दरें: सीपीसीबी के दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि कोई कंपनी अपने ईपीआर लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रहती है, तो उस पर श्रेणी के आधार पर प्रति टन ₹2,900 से लेकर ₹7,900 तक का जुर्माना लगाया जा रहा है।
  • फर्जी प्रमाण पत्र (Fake EPR Certificates): हालिया जांच में कुछ ऐसी कंपनियां भी पाई गईं जिन्होंने अपने रीसाइक्लिंग दावों को सही साबित करने के लिए रीसायकलर्स से फर्जी डिजिटल सर्टिफिकेट खरीदे थे। सीपीसीबी ने ऐसी कंपनियों पर करोड़ों रुपये का जुर्माना लगाया है और संबंधित रीसाइक्लिंग यूनिट्स को ब्लैकलिस्ट कर दिया है।
  • देर से पंजीकरण और रिटर्न न भरना: जिन 62,175 कंपनियों ने पंजीकरण किया है, उनके अलावा जो पीआईबीओ (PIBOs) अभी भी बिना रजिस्ट्रेशन के बाजार में प्लास्टिक पैकेजिंग उतार रहे हैं, उन्हें कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी किए गए हैं। इसके अलावा, सालाना ईपीआर रिटर्न दाखिल न करने पर भी दैनिक आधार पर जुर्माना लगाया जा रहा है।
यह जुर्माना लगाने का मुख्य उद्देश्य कंपनियों को डराना नहीं, बल्कि उन्हें यह समझाना है कि नियमों का उल्लंघन करना रीसाइक्लिंग सर्टिफिकेट खरीदने की तुलना में कहीं अधिक महंगा साबित होगा।
प्लास्टिक की विभिन्न श्रेणियों के लिए भविष्य के रीसाइक्लिंग लक्ष्य
सरकार ने वर्ष 2026 से लेकर आने वाले सालों के लिए रीसाइक्लिंग के लक्ष्यों को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाने का रोडमैप तैयार किया है। प्लास्टिक पैकेजिंग की श्रेणियों के अनुसार भविष्य के लक्ष्य इस प्रकार हैं:
  • श्रेणी 1 (कठोर या रिजिड प्लास्टिक): इस श्रेणी में मुख्य रूप से प्लास्टिक की बोतलें, जार और कड़क डिब्बे आते हैं। वर्तमान नियमों के अनुसार, कंपनियों के लिए अपनी नई रिजिड पैकेजिंग में न्यूनतम 30 प्रतिशत रीसायकल की गई प्लास्टिक सामग्री (Recycled Content) का उपयोग करना अनिवार्य है। आने वाले वर्षों में इस लक्ष्य को बढ़ाकर 50 से 60 प्रतिशत करने की योजना है।
  • श्रेणी 2 (लचीली या फ्लेक्सिबल प्लास्टिक): इसमें सिंगल-लेयर या मल्टी-लेयर प्लास्टिक थैलियां, रैपर्स और पाउच शामिल हैं। इनके रीसाइक्लिंग और संग्रह का लक्ष्य वर्तमान में सबसे कठिन माना जा रहा है। इसके लिए कंपनियों को शत-प्रतिशत संग्रह (100% Collection) सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।
  • श्रेणी 3 (मल्टी-लेयर्ड प्लास्टिक पैकेजिंग): इस श्रेणी में ऐसी पैकेजिंग आती है जिसमें प्लास्टिक की कम से कम एक परत के साथ कागज या एल्युमिनियम जैसी अन्य सामग्रियां जुड़ी होती हैं (जैसे चिप्स के पैकेट या टेट्रा पैक)। इस श्रेणी के कचरे को प्रोसेस करना सबसे जटिल है, इसलिए सीपीसीबी ने इसके लिए विशेष तकनीकी रीसायकलर्स के साथ जुड़ने का लक्ष्य अनिवार्य किया है।
  • श्रेणी 4 (कंपोस्टेबल प्लास्टिक): ऐसी प्लास्टिक पैकेजिंग जो पर्यावरण में अपने आप नष्ट हो सकती है। इस श्रेणी के निर्माताओं के लिए रीसाइक्लिंग के बजाय यह साबित करना अनिवार्य है कि उनका उत्पाद केंद्रीय मानकों के अनुसार पूरी तरह से कंपोस्टेबल है।
सभी कंपनियों को प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के बाद अगले वित्त वर्ष की 30 जून तक अपने ईपीआर सर्टिफिकेट जमा करने होते हैं और 31 अक्टूबर तक अपना वार्षिक रिटर्न दाखिल करना होता है। नया कॉमन ईपीआर पोर्टल इन सभी प्रक्रियाओं को पूरी तरह ट्रैक करता है, जिससे किसी भी स्तर पर विसंगति होने पर सिस्टम तुरंत अलर्ट जारी कर देता है।
यदि आप इस विषय में कुछ और विशिष्ट जानकारी चाहते हैं, तो कृपया बताएं:

महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) की गोपनीयता नीतियों और विधिक प्रक्रियाओं के अनुसार, जिन कंपनियों को जांच या नियमों के उल्लंघन के लिए डिफ़ॉल्ट नोटिस, कारण बताओ (Show Cause) नोटिस या बंद करने के निर्देश दिए जाते हैं, उनकी पूरी आधिकारिक सूची या व्यक्तिगत नाम सार्वजनिक रूप से तब तक पूरी तरह जारी नहीं किए जाते जब तक उन पर अंतिम कानूनी मुहर न लग जाए। हालांकि, एमपीसीबी और स्थानीय प्रशासनिक रिकॉर्ड के अनुसार डोंबिवली एमआईडीसी (फेज 1 और फेज 2) के तहत हालिया समय में की गई कार्रवाइयों की प्रकृति और प्रभावित औद्योगिक श्रेणियों की स्थिति इस प्रकार है:
  • केमिकल और पैकेजिंग विनिर्माण इकाइयां: डोंबिवली एमआईडीसी में सबसे बड़ी कार्रवाई उन रासायनिक और प्लास्टिक पैकेजिंग विनिर्माण कंपनियों पर हुई है जो अपने कारखानों से निकलने वाले कचरे का उचित प्रबंधन नहीं कर रही थीं और जिन्होंने केंद्रीय ईपीआर पोर्टल पर अनिवार्य पंजीकरण नहीं कराया था。 [1] 
  • टेक्सटाइल और प्रोसेसिंग यूनिट्स: फेज 2 स्थित कुछ कपड़ा और रंगाई (Dyeing) मिलों को पर्यावरण नियमों और ठोस अपशिष्ट नियमों के उल्लंघन के कारण बिजली और पानी की आपूर्ति काटने (Disconnection) के सख्त निर्देश दिए गए हैं।
  • फर्जी सर्टिफिकेट का उपयोग करने वाली इकाइयां: एमपीसीबी की आंतरिक जांच में डोंबिवली क्षेत्र की कुछ ऐसी रीसाइक्लिंग और विनिर्माण इकाइयां पकड़ी गई हैं जो कागजों पर फर्जी प्लास्टिक वेस्ट क्रेडिट जनरेट कर रही थीं। बोर्ड ने ऐसी संदिग्ध इकाइयों की मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेडिंग गतिविधियों पर अंतरिम रोक (Suspension) लगा दी है।
डोंबिवली एमआईडीसी में पर्यावरण नियमों को और अधिक सख्त करने तथा प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों को पूरी तरह शहर से बाहर शिफ्ट करने (Patalganga MIDC की ओर) की मांग को लेकर स्थानीय प्रशासन और महाराष्ट्र सरकार लगातार काम कर रही है।