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मानसून के बावजूद नहीं भर पाए देश के बांध: खरीफ सीजन के बीच जलाशयों में पानी पिछले साल से कम, खेती और पेयजल पर बढ़ा संकट।

केंद्रीय जल आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 16 जुलाई 2026 तक देश के 166 प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण कुल क्षमता का केवल 34.46 प्रतिशत है, जो पिछले वर्ष की तुलना में काफी कम है। पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, बिहार और कर्नाटक सहित कई राज्यों में जलाशयों का स्तर सामान्य से नीचे है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जल भंडारण में जल्द सुधार नहीं हुआ तो खरीफ फसलों, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन पर असर पड़ सकता है। यह रिपोर्ट देश में जल संरक्षण और वैज्ञानिक जल प्रबंधन की आवश्यकता को फिर से रेखांकित करती है।

Anshuman Mishra20 जुल. 2026, 09:58 PM IST
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मानसून के बावजूद नहीं भर पाए देश के बांध: खरीफ सीजन के बीच जलाशयों में पानी पिछले साल से कम, खेती और पेयजल पर बढ़ा संकट।

केंद्रीय जल आयोग की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, बिहार समेत कई राज्यों में जलाशयों का जलस्तर सामान्य से काफी नीचे; विशेषज्ञ बोले- कमजोर जल भंडारण खरीफ उत्पादन और जल सुरक्षा दोनों के लिए खतरा। देशभर में दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगे बढ़ने और जुलाई के पहले पखवाड़े में कई राज्यों में अच्छी बारिश होने के बावजूद भारत के प्रमुख जलाशयों की स्थिति अब भी चिंताजनक बनी हुई है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 16 जुलाई 2026 तक देश के 166 प्रमुख जलाशयों में कुल 63.249 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) पानी उपलब्ध था, जो उनकी कुल लाइव स्टोरेज क्षमता का केवल 34.46 प्रतिशत है। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में काफी कम है और सामान्य स्तर से भी नीचे बना हुआ है। ऐसे समय में जब खरीफ फसलों की बुवाई तेज़ी से चल रही है, जलाशयों का कमजोर जल भंडारण कृषि, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। 

जलाशय रिपोर्ट क्या बताती है?
केंद्रीय जल आयोग हर सप्ताह देश के प्रमुख जलाशयों के जल भंडारण की निगरानी करता है। यह रिपोर्ट बताती है कि बांधों में कितना पानी उपलब्ध है और उसकी तुलना पिछले वर्ष तथा पिछले 10 वर्षों के औसत से कैसी है। 16 जुलाई 2026 तक जलाशयों में उपलब्ध पानी पिछले वर्ष की समान अवधि के लगभग 60.84 प्रतिशत के बराबर है। हालांकि जुलाई की शुरुआत की तुलना में स्थिति में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन यह सुधार खरीफ सीजन की जरूरतों के हिसाब से पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। 

रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल की स्थिति सबसे गंभीर बनी हुई है, जहां जलाशयों का भंडारण सामान्य से 55 प्रतिशत से अधिक कम है। तेलंगाना के आठ प्रमुख जलाशयों में औसत भंडारण केवल 12.53 प्रतिशत दर्ज किया गया है। बिहार के जलाशयों में भी जलस्तर सामान्य से लगभग 31 प्रतिशत नीचे है। इसके अलावा कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, मध्य प्रदेश, झारखंड, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के कई जलाशयों में भी सामान्य से काफी कम पानी मौजूद है। 17 प्रमुख जलाशय ऐसे हैं जहां सामान्य क्षमता के मुकाबले 50 प्रतिशत से भी कम पानी है। 
आप अपने लेख में मुंबई और कल्याण क्षेत्र के लिए यह अतिरिक्त सेक्शन जोड़ सकते हैं:

मुंबई और कल्याण की जलापूर्ति पर क्या है असर?
मुंबई महानगर और कल्याण-डोंबिवली क्षेत्र की पेयजल आपूर्ति मुख्य रूप से सात प्रमुख जलाशयों—भातसा, अपर वैतरणा, मिडिल वैतरणा, तानसा, मोडक सागर, विहार और तुलसी—पर निर्भर करती है। इन जलाशयों से प्रतिदिन करोड़ों लीटर पानी मुंबई और आसपास के शहरों तक पहुंचाया जाता है। इस वर्ष मानसून की धीमी शुरुआत के कारण जून में जलाशयों का जलस्तर काफी नीचे चला गया था। हालांकि जुलाई के दूसरे सप्ताह में बारिश बढ़ने से स्थिति में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन पिछले वर्ष की तुलना में जल भंडारण अभी भी काफी कम बना हुआ है।  19 जुलाई 2026 तक मुंबई के सातों जलाशयों में कुल जल भंडारण लगभग 7.58 लाख मिलियन लीटर (52.39%) दर्ज किया गया। इसके मुकाबले पिछले वर्ष इसी अवधि में यही भंडारण लगभग 81.86% था। यानी एक वर्ष में लगभग 29 प्रतिशत अंकों की गिरावट दर्ज की गई है, जो इस मानसून की कमजोर शुरुआत और जल संकट की गंभीरता को दर्शाती है। सबसे बड़े भातसा बांध में 46.79% पानी, अपर वैतरणा में 31.8%, मिडिल वैतरणा में 46.78%, मोडक सागर में 79.12%, तानसा में 84.37%, जबकि विहार और तुलसी झील लगभग पूरी क्षमता के साथ क्रमशः 100% और 98.33% तक भर चुकी हैं। 

कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका (KDMC) को भी अपनी जलापूर्ति का बड़ा हिस्सा भातसा प्रणाली और महाराष्ट्र जीवन प्राधिकरण (MJP) के माध्यम से मिलता है। इसलिए भातसा और वैतरणा बेसिन में जलस्तर कम रहने का सीधा प्रभाव कल्याण, डोंबिवली और ठाणे क्षेत्र की जलापूर्ति पर पड़ सकता है। यदि मानसून सामान्य से कम रहता है तो भविष्य में जल कटौती, सीमित जल वितरण और औद्योगिक उपयोग पर प्रतिबंध जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।

खरीफ सीजन पर क्या होगा असर?
खरीफ की फसलें जैसे धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालें मानसून और सिंचाई दोनों पर निर्भर करती हैं। यदि जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं रहेगा तो उन क्षेत्रों में सिंचाई प्रभावित हो सकती है जहां खेती मुख्य रूप से बांधों के पानी पर निर्भर है। इससे उत्पादन घटने, किसानों की लागत बढ़ने और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ने की आशंका बढ़ सकती है। राजस्थान सहित कई इलाकों में पहले से ही अनियमित वर्षा के कारण किसान चिंतित हैं।  केंद्रीय जल आयोग के अनुसार महानदी-पेन्नार के बीच पूर्व की ओर बहने वाली नदियां, कावेरी बेसिन, तापी से तादरी तक पश्चिम की ओर बहने वाली नदियां तथा तादरी से कन्याकुमारी तक पश्चिम की ओर बहने वाली नदी प्रणालियां अभी भी 'सामान्य से नीचे' श्रेणी में हैं। इन नदी बेसिनों में जल भंडारण सामान्य से 20 से 60 प्रतिशत तक कम है, जिससे संबंधित राज्यों में जल प्रबंधन की चुनौती और बढ़ गई है। 

भारत में बड़े बांध और जलाशय केवल सिंचाई के लिए ही नहीं बल्कि करोड़ों लोगों को पेयजल उपलब्ध कराने, जलविद्युत उत्पादन, औद्योगिक उपयोग, बाढ़ नियंत्रण और सूखे के दौरान जल उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि इनमें पर्याप्त जल भंडारण नहीं होगा तो इसका असर कृषि से लेकर बिजली उत्पादन और शहरी जल आपूर्ति तक कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
जल विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मानसून पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। वर्षा जल का बेहतर संरक्षण, जलाशयों का वैज्ञानिक संचालन, भूजल पुनर्भरण, छोटे जल स्रोतों का पुनर्जीवन और जल के कुशल उपयोग की रणनीति अपनाना आवश्यक है। बदलते जलवायु पैटर्न के कारण बारिश की तीव्रता और वितरण दोनों में असमानता बढ़ रही है, इसलिए जल प्रबंधन को अधिक टिकाऊ और वैज्ञानिक बनाना समय की मांग है। 

यदि जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, जलाशयों का बेहतर प्रबंधन और सिंचाई दक्षता बढ़ाने पर तेजी से काम किया जाता है, तो किसानों को पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध कराई जा सकेगी। इससे खरीफ और रबी दोनों मौसम की फसलों को लाभ मिलेगा, पेयजल संकट कम होगा, जलविद्युत उत्पादन स्थिर रहेगा और भविष्य में सूखे जैसी परिस्थितियों से निपटना आसान होगा। साथ ही भूजल पर बढ़ती निर्भरता भी कम की जा सकेगी।
यह रिपोर्ट केवल जलाशयों के घटते जलस्तर की जानकारी नहीं देती, बल्कि भारत की जल सुरक्षा, कृषि अर्थव्यवस्था और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों की ओर भी संकेत करती है। यदि मानसून के बीच भी प्रमुख जलाशय सामान्य स्तर तक नहीं भर पा रहे हैं, तो यह भविष्य में जल प्रबंधन की रणनीतियों की समीक्षा और संसाधनों के बेहतर उपयोग की आवश्यकता को रेखांकित करता है। खरीफ सीजन के बीच यह स्थिति किसानों, नीति निर्माताओं और आम नागरिकों सभी के लिए चिंता का विषय है।