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डीप स्लीप और अल्ज़ाइमर का कनेक्शन: नींद कैसे करती है दिमाग की सफाई?
दुनिया भर में बढ़ती उम्र के साथ याददाश्त कमज़ोर होने और अल्ज़ाइमर जैसी डिमेंशिया बीमारियों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में नई रिसर्च से उम्मीद की एक किरण दिख रही है, जो इशारा करती है कि नींद का एक खास हिस्सा—‘डीप स्लीप’ या ‘स्लो‑वेव स्लीप’—हमारे दिमाग की सेहत के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि कई लोगों में उम्र बढ़ने के साथ गहरी नींद की मात्रा लगभग 1–2 घंटे तक कम हो जाती है। यह वही फेज़ है जिसमें दिमाग़ अपनी “सफाई” यानी वेस्ट क्लियरेंस सबसे ज़्यादा करता है और दिनभर की यादों को मजबूत याददाश्त में बदलने का काम तेज़ी से चलता है। कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि जिन लोगों में डीप स्लीप की कमी लंबे समय तक बनी रहती है, उनमें दिमाग़ में amyloid और tau जैसे प्रोटीन ज्यादा जमा हो सकते हैं, जो अल्ज़ाइमर रोग से जुड़े माने जाते हैं।
नई स्टडीज़ यह सुझाव दे रही हैं कि अगर किसी प्रकार से हर रात लगभग वे दो घंटे की खोई हुई गहरी नींद को बहाल किया जा सके, तो यह अल्ज़ाइमर के जोखिम को कम करने या उसकी शुरुआत में देरी करने की एक संभावित रणनीति हो सकती है। वैज्ञानिक फिलहाल ऐसी दवाओं और non‑drug तकनीकों (जैसे light और sound stimulation, behavioral therapy) पर रिसर्च कर रहे हैं जो डीप स्लीप को सुरक्षित तरीके से बढ़ा सकें।
नींद विशेषज्ञ आम लोगों के लिए कुछ सरल लेकिन असरदार सुझाव दे रहे हैं: रोज़ एक ही समय पर सोने और उठने की कोशिश करें, सोने से कम से कम एक घंटे पहले मोबाइल‑लैपटॉप जैसे स्क्रीन से दूरी बनाएं, रात में भारी खाना और देर से कॉफी या चाय पीने से बचें, और बेवजह नींद की गोलियां लंबे समय तक न लें। जिन लोगों को खर्राटे, सांस रुकने (स्लीप एपनिया) या लगातार अनिद्रा की शिकायत है, उन्हें इसे हल्का न लेकर स्लीप स्पेशलिस्ट से सलाह लेनी चाहिए, क्योंकि खराब नींद सिर्फ थकान ही नहीं, बल्कि दिमाग़, दिल और मेटाबॉलिज़्म—तीनों पर असर डालती है।
