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वजन नहीं, शरीर की बनावट बताएगी बीमारी का खतरा; नया इंडेक्स बदल सकता है हेल्थ असेसमेंट
मोटापा और उससे जुड़ी बीमारियों की पहचान के लिए अब तक बॉडी मास इंडेक्स (BMI) सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला पैमाना रहा है। BMI किसी व्यक्ति का वज़न (किलो) उसकी लंबाई (मीटर में) के वर्ग से भाग देकर निकाला जाता है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि यह शरीर में फैट और मसल्स के अनुपात का अंतर नहीं बता पाता। यानी एक मसलदार एथलीट और पेट के आसपास ज्यादा चर्बी वाले व्यक्ति का BMI समान हो सकता है, जबकि दोनों के स्वास्थ्य जोखिम अलग हैं।

इसी पृष्ठभूमि में वैज्ञानिकों ने एक नए ‘बॉडी इंडेक्स’ पर काम शुरू किया है, जो सिर्फ वज़न और लंबाई ही नहीं, बल्कि शरीर की संरचना, फैट वितरण, और संभव हो तो मांसपेशियों के अनुपात को भी ध्यान में रख सके। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, इस इंडेक्स को इस तरह डिज़ाइन किया जा रहा है कि इसे नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों पर भी लागू किया जा सके। यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि जीवन के शुरुआती वर्षों में ही फैट और मसल्स का असंतुलन भविष्य के मेटाबॉलिक जोखिम की ओर इशारा कर सकता है।
यदि यह नया इंडेक्स व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया जाता है, तो डॉक्टरों के पास ऐसा टूल होगा जो BMI और कमर‑कूल्हे के अनुपात जैसे मौजूदा पैमानों के साथ मिलकर किसी व्यक्ति के वास्तविक जोखिम की अधिक सटीक तस्वीर दे सकेगा। इससे उन लोगों की पहचान आसान होगी जो दिखने में बहुत ज्यादा मोटे नहीं हैं लेकिन अंदरूनी फैट (विसरल फैट) की वजह से हाई रिस्क कैटेगरी में आते हैं, खास तौर पर एशियाई और भारतीय आबादी में।
हालांकि यह इंडेक्स अभी शोध के चरण में है और इसे आम क्लिनिकल प्रैक्टिस में आने में समय लगेगा, लेकिन विशेषज्ञ मान रहे हैं कि भविष्य में मोटापे, प्रीडायबिटीज और हार्ट डिजीज की रोकथाम में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। फिलहाल के लिए डॉक्टरों की सलाह है कि BMI के साथ‑साथ कमर का नाप, कमर‑कूल्हे का अनुपात, ब्लड प्रेशर, शुगर और लिपिड प्रोफाइल जैसे पैरामीटर्स पर भी बराबर ध्यान देना चाहिए।
