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इंसान और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष से निपटने की बड़ी पहल: केंद्र सरकार ने शुरू किया राष्ट्रीय पोर्टल, स्थापित होगा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस।
देश में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने कोयंबटूर में मानव-वन्यजीव संघर्ष पर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का उद्घाटन किया और राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष पोर्टल लॉन्च किया। यह पोर्टल देशभर में होने वाली संघर्ष की घटनाओं का डेटा एकत्र करेगा, उनका विश्लेषण करेगा और राज्यों को वैज्ञानिक व तकनीकी समाधान उपलब्ध कराने में मदद करेगा। इस पहल का उद्देश्य इंसानों और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व को बढ़ावा देना, किसानों के नुकसान को कम करना, वन्यजीव संरक्षण को मजबूत करना और नीति निर्माण को अधिक प्रभावी बनाना है।
Anshuman Mishra20 जुल. 2026, 09:59 PM IST

देश में लगातार बढ़ रहे मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII-SACON) में मानव-वन्यजीव संघर्ष पर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (Centre of Excellence) का उद्घाटन किया। इसके साथ ही राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष पोर्टल (National Human-Wildlife Conflict Portal) भी लॉन्च किया गया। इस अवसर पर देशभर के वन अधिकारी, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, नीति-निर्माता और तकनीकी विशेषज्ञ एक राष्ट्रीय कार्यशाला में शामिल हुए, जहां इस चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिक और तकनीकी समाधान पर चर्चा की गई।
आखिर क्या है मानव-वन्यजीव संघर्ष?
मानव-वन्यजीव संघर्ष वह स्थिति है जब जंगली जानवर और इंसान एक ही क्षेत्र में आमने-सामने आ जाते हैं। इसके पीछे जंगलों का सिकुड़ना, तेजी से शहरीकरण, सड़क और रेलवे जैसी आधारभूत परियोजनाओं का विस्तार, कृषि क्षेत्रों का जंगलों तक फैलना और प्राकृतिक आवासों का खंडित होना प्रमुख कारण हैं। भारत में हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू, जंगली सूअर, बंदर और नीलगाय जैसे वन्यजीव अक्सर आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं। इससे फसलों को नुकसान, पशुधन की मौत, मानव जीवन पर खतरा और कई बार वन्यजीवों की भी मृत्यु हो जाती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की सातवीं बैठक में की गई घोषणा के अनुरूप स्थापित यह सेंटर ऑफ एक्सीलेंस देश में मानव-वन्यजीव संघर्ष के वैज्ञानिक समाधान का प्रमुख केंद्र बनेगा।
यह केंद्र कई महत्वपूर्ण कार्य करेगा—
- मानव-वन्यजीव संघर्ष पर वैज्ञानिक शोध।
- आधुनिक तकनीक आधारित समाधान विकसित करना।
- राज्यों को नीति निर्माण में सहायता देना।
- वन अधिकारियों और कर्मचारियों का प्रशिक्षण।
- सफल मॉडलों और सर्वोत्तम प्रथाओं का पूरे देश में प्रसार।
- डेटा आधारित निर्णय प्रणाली विकसित करना।
- विभिन्न राज्यों के अनुभवों को साझा करने के लिए राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराना।
राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष पोर्टल की क्या होगी भूमिका?
सरकार द्वारा शुरू किया गया राष्ट्रीय पोर्टल मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़ी घटनाओं का एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म होगा। इसके माध्यम से विभिन्न राज्यों से प्राप्त घटनाओं का रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा, उनका विश्लेषण होगा और प्रभावित क्षेत्रों की पहचान आसान होगी।
पोर्टल से मिलने वाले डेटा के आधार पर सरकार यह समझ सकेगी कि किन इलाकों में किस प्रकार के संघर्ष अधिक हो रहे हैं, किन प्रजातियों से सबसे ज्यादा खतरा है और भविष्य में किन क्षेत्रों में रोकथाम के उपाय पहले किए जाने चाहिए। यह प्रणाली राज्यों के बीच समन्वय बढ़ाने, त्वरित सूचना साझा करने और बेहतर नीति निर्माण में भी मदद करेगी।
सरकार ने क्यों उठाया यह कदम?
पिछले कुछ वर्षों में देश के कई राज्यों—महाराष्ट्र, उत्तराखंड, केरल, कर्नाटक, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम और मध्य प्रदेश—में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है। हाथियों द्वारा फसल नुकसान, तेंदुओं का आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश और बाघों से जुड़े संघर्ष लगातार चिंता का विषय बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आवासों का नुकसान और विकास परियोजनाओं के कारण वन्यजीवों के पारंपरिक मार्ग प्रभावित हुए हैं। ऐसे में केवल वन विभाग की कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक शोध, आधुनिक तकनीक और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी है। यही उद्देश्य इस नई पहल के पीछे है।
भूपेंद्र यादव ने क्या कहा?
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि मानव-वन्यजीव संघर्ष भारत के सामने सबसे बड़ी संरक्षण और विकास संबंधी चुनौतियों में से एक बन चुका है। उन्होंने कहा कि समस्या को केवल संकट के रूप में देखने के बजाय आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और व्यावहारिक समाधानों के माध्यम से इसका समाधान खोजने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि पर्यावरणीय स्थिरता के लिए संघर्ष नहीं बल्कि सह-अस्तित्व और सामंजस्य ही मूल मंत्र होना चाहिए।
भारत के लिए यह पहल क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत विश्व के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले देशों में शामिल है। यहां एशियाई हाथी, बंगाल टाइगर, एशियाई शेर, एक सींग वाला गैंडा और अनेक दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। साथ ही देश की बड़ी आबादी जंगलों के आसपास रहती है। ऐसे में विकास और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। यदि मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार बढ़ता है तो इससे न केवल लोगों की सुरक्षा प्रभावित होगी बल्कि वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रमों पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर वैज्ञानिक शोध, डिजिटल निगरानी और समन्वित नीति व्यवस्था भविष्य की संरक्षण रणनीति को मजबूत बनाएगी।
मानव-वन्यजीव संघर्ष केवल वन विभाग की समस्या नहीं बल्कि पर्यावरण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि, जैव विविधता और मानव सुरक्षा से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। ऐसे समय में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और राष्ट्रीय मानव-वन्यजीव संघर्ष पोर्टल की शुरुआत भारत को विज्ञान आधारित, तकनीक समर्थित और समुदाय-केंद्रित संरक्षण मॉडल की दिशा में आगे ले जाने वाला महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी और आधुनिक तकनीक का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जाता है, तो आने वाले वर्षों में मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष कम करने तथा सह-अस्तित्व की दिशा में उल्लेखनीय सफलता हासिल की जा सकती है।
