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'बुलडोज़र जस्टिस' पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की विभाजित राय, मामला बड़ी बेंच को भेजा जाएगा
'बुलडोज़र जस्टिस' को लेकर न्यायपालिका में महत्वपूर्ण बहस सामने आई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो न्यायाधीश आरोपी के मकान पर कार्रवाई से जुड़े कानूनी सवाल पर अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुंचे, जिसके बाद मामला बड़ी बेंच को भेजे जाने का रास्ता साफ हो गया।
Sonali21 जुल. 2026, 07:09 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन शामिल थे, ने 'बुलडोज़र जस्टिस' से जुड़े व्यापक जनहित याचिका (PIL) पर अलग-अलग निर्णय सुनाए। यह याचिका उत्तर प्रदेश में आरोपियों के मकानों पर प्रशासन द्वारा की जा रही बुलडोज़र कार्रवाई की वैधानिकता को चुनौती देते हुए दायर की गई थी।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तर्क रखा गया कि कई मामलों में किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल FIR दर्ज होने या अपराध का आरोप लगने के तुरंत बाद उसके मकान पर बुलडोज़र चलाया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह कार्रवाई कानून के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही आरोपी को दंडित करने जैसी है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज होते ही उसके मकान को गिराने की कार्रवाई की जाती है तो इससे यह संदेश जाता है कि राज्य दंडात्मक मानसिकता से काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्रवाई लोगों के संवैधानिक अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि सामान्य परिस्थितियों में FIR दर्ज होने की तारीख से दो वर्ष तक किसी आरोपी के आवासीय मकान को ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए। उनका मानना था कि इस अवधि में जांच और न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी तथा प्रशासनिक कार्रवाई को प्रतिशोधात्मक मानने की आशंका भी कम होगी।
हालांकि न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने इस प्रस्ताव से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि सभी मामलों पर एक समान नियम लागू नहीं किया जा सकता। यदि कोई निर्माण वास्तव में अवैध है और संबंधित कानूनों के तहत उसके खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता है, तो केवल FIR दर्ज होने के कारण दो वर्ष तक प्रशासन के हाथ नहीं बांधे जा सकते। उनके अनुसार प्रत्येक मामले का निर्णय उसके तथ्यों और लागू कानून के आधार पर होना चाहिए।
हालांकि दोनों न्यायाधीश एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत पर पूरी तरह सहमत रहे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार या प्रशासन किसी आरोपी को दंडित करने के उद्देश्य से उसके घर पर बुलडोज़र नहीं चला सकता। किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने और दंड देने का अधिकार केवल न्यायपालिका के पास है। कार्यपालिका (Executive) कानून हाथ में लेकर सजा नहीं दे सकती।
खंडपीठ ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2024 में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि किसी आरोपी के घर को केवल अपराध के आरोप के आधार पर नहीं गिराया जा सकता। यदि कोई निर्माण अवैध है, तब भी प्रशासन को नोटिस देना, जवाब मांगना, सुनवाई का अवसर देना और संबंधित नगर नियोजन एवं राजस्व कानूनों का पालन करना अनिवार्य है। बिना विधिसम्मत प्रक्रिया अपनाए की गई ध्वस्तीकरण कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और विधि के शासन के सिद्धांत के विपरीत होगी।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र की पंक्ति, "लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में" का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का घर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं होता, बल्कि उसके जीवनभर की मेहनत, सम्मान और परिवार का केंद्र होता है। इसलिए घर गिराने जैसी कार्रवाई अत्यंत संवेदनशील और कानून के अनुरूप ही होनी चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि प्रशासन यह दावा करता है कि कोई भवन अवैध है, तो उसे संबंधित कानूनों के तहत स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने का अधिकार है, लेकिन यह कार्रवाई अपराध के आरोप या FIR से जोड़कर दंडात्मक रूप में नहीं की जा सकती। बुलडोज़र का इस्तेमाल कानून लागू करने के बजाय सजा देने के औजार के रूप में नहीं होना चाहिए।
चूंकि न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन के बीच FIR के बाद दो वर्ष तक ध्वस्तीकरण पर रोक लगाने के प्रश्न पर मतभेद रहा, इसलिए इस कानूनी मुद्दे को अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा। मुख्य न्यायाधीश इस प्रश्न पर विचार के लिए बड़ी पीठ (Larger Bench) गठित करेंगे, जो भविष्य में इस महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न पर अंतिम निर्णय देगी।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में आरोपियों के मकानों पर बुलडोज़र कार्रवाई को लेकर लगातार कानूनी और संवैधानिक बहस होती रही है। अब बड़ी पीठ का निर्णय यह तय करेगा कि FIR दर्ज होने के बाद ध्वस्तीकरण कार्रवाई पर समयबद्ध रोक लगाने की आवश्यकता है या नहीं तथा ऐसे मामलों में प्रशासनिक शक्तियों की सीमा क्या होगी।
