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क्या कचरा जलाने से खत्म होगा भारत का वेस्ट संकट? विशेषज्ञों ने उठाए बड़े सवाल
भारत में बढ़ते कचरा संकट के बीच वेस्ट-टू-एनर्जी संयंत्रों को समाधान के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बिना कचरे के पृथक्करण के उसे जलाना दीर्घकालिक समाधान नहीं है। उनका मानना है कि भारत को पहले स्रोत स्तर पर कचरे का पृथक्करण, रिसाइक्लिंग और कम्पोस्टिंग को प्राथमिकता देनी चाहिए और केवल अवशिष्ट कचरे का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग करना चाहिए। यही मॉडल पर्यावरण संरक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और टिकाऊ कचरा प्रबंधन के लिए सबसे प्रभावी माना जा रहा है।
Anshuman Mishra22 जुल. 2026, 02:40 PM IST

देश: देश में बढ़ते कचरे के पहाड़ और भरते लैंडफिल के बीच सरकार वेस्ट-टू-एनर्जी (Waste-to-Energy) संयंत्रों को समाधान के रूप में बढ़ावा दे रही है। लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि बिना स्रोत स्तर पर कचरे के पृथक्करण (Segregation) के कचरा जलाना न तो स्थायी समाधान है और न ही पर्यावरण के लिए सुरक्षित। हालिया विश्लेषण ने इस मॉडल की प्रभावशीलता और इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े ठोस अपशिष्ट (Municipal Solid Waste) उत्पादक देशों में शामिल है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, बढ़ती आबादी और उपभोग आधारित जीवनशैली के कारण हर साल करोड़ों टन ठोस कचरा पैदा हो रहा है। कई शहरों में लैंडफिल अपनी क्षमता से अधिक भर चुके हैं, जिससे मीथेन गैस, जहरीला लीचेट, आग लगने की घटनाएं और वायु प्रदूषण जैसी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। दिल्ली के गाजीपुर, भलस्वा और ओखला जैसे कचरे के पहाड़ इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं।
क्या है वेस्ट-टू-एनर्जी (Waste-to-Energy) तकनीक?
वेस्ट-टू-एनर्जी (WTE) ऐसी तकनीक है जिसमें कचरे को उच्च तापमान पर जलाकर बिजली या ऊष्मा ऊर्जा उत्पन्न की जाती है। इसका मूल उद्देश्य केवल उस अवशिष्ट (Residual) कचरे का निपटान करना है जिसे रिसाइकिल या कम्पोस्ट नहीं किया जा सकता। सरकार का मानना है कि इससे लैंडफिल पर दबाव कम होगा, ऊर्जा उत्पादन होगा और कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन को बढ़ावा मिलेगा।
डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत में WTE मॉडल धीरे-धीरे "मिश्रित कचरा जलाने" की व्यवस्था बनता जा रहा है। जबकि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार पहले कचरे का पृथक्करण, रिसाइक्लिंग और कम्पोस्टिंग होनी चाहिए और उसके बाद ही बचा हुआ कचरा जलाया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बिना अलग किए हुए मिश्रित कचरे को जलाया जाएगा तो प्लास्टिक, जैविक कचरा और अन्य पदार्थ जहरीले उत्सर्जन तथा भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन का कारण बनेंगे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अत्याधुनिक भट्टियां (Advanced Furnaces) दहन प्रक्रिया को अधिक कुशल बना सकती हैं, लेकिन वे उस मूल समस्या का समाधान नहीं कर सकतीं जिसके कारण मिश्रित कचरा पैदा होता है। यदि घरों, बाजारों और संस्थानों में स्रोत स्तर पर कचरे को अलग नहीं किया जाएगा तो कोई भी आधुनिक तकनीक प्रदूषण और संसाधनों की बर्बादी को पूरी तरह नहीं रोक सकती।
क्यों जरूरी है कचरे का पृथक्करण?
भारत के नगर ठोस कचरे का बड़ा हिस्सा जैविक (Organic) होता है, जिसे कम्पोस्ट या बायोगैस में बदला जा सकता है। वहीं प्लास्टिक, कागज, धातु और कांच जैसी सामग्री रिसाइकिल की जा सकती है। यदि यह सब मिश्रित होकर सीधे भट्टियों में चला जाए तो पुनर्चक्रण योग्य संसाधन हमेशा के लिए नष्ट हो जाते हैं और सर्कुलर इकोनॉमी को नुकसान पहुंचता है। विश्व बैंक भी मानता है कि बेहतर पृथक्करण और पुनर्चक्रण से रोजगार, संसाधन संरक्षण और पर्यावरणीय लाभ एक साथ हासिल किए जा सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार मिश्रित कचरा और विशेषकर प्लास्टिक जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, सूक्ष्म कण (PM2.5), डाइऑक्सिन, फ्यूरान और अन्य हानिकारक गैसें निकल सकती हैं, जो श्वसन रोग, कैंसर और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याओं से जुड़ी हैं। एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहे तो 2035 तक खुले में कचरा जलाना भारत में वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत बन सकता है।
सरकार का दृष्टिकोण
केंद्र और कई राज्य सरकारें वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजनाओं को स्वच्छ भारत मिशन, वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन और ऊर्जा उत्पादन के साथ जोड़कर देख रही हैं। नगर निकायों का तर्क है कि लगातार बढ़ते कचरे और सीमित भूमि के कारण केवल लैंडफिल पर निर्भर रहना संभव नहीं है। इसलिए ऊर्जा उत्पादन के साथ वैज्ञानिक निपटान को विकल्प के रूप में अपनाया जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि WTE अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं।
विशेषज्ञ क्या समाधान सुझाते हैं?
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को "बर्निंग इकॉनमी" नहीं बल्कि "सर्कुलर इकॉनमी" की ओर बढ़ना चाहिए। इसके लिए घर-घर कचरा पृथक्करण, विकेंद्रीकृत कम्पोस्टिंग, रिसाइक्लिंग उद्योग को बढ़ावा, सिंगल-यूज प्लास्टिक में कमी, अनौपचारिक कचरा बीनने वालों को औपचारिक प्रणाली से जोड़ना और केवल अंतिम विकल्प के रूप में अवशिष्ट कचरे का वैज्ञानिक दहन अपनाना होगा।
यह बहस केवल कचरा प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की जलवायु नीति, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरी विकास और संसाधन संरक्षण से भी जुड़ी हुई है। यदि बिना पृथक्करण के बड़े पैमाने पर कचरा जलाने की नीति अपनाई जाती है तो रिसाइक्लिंग उद्योग, अनौपचारिक कचरा श्रमिकों की आजीविका और पर्यावरण तीनों प्रभावित हो सकते हैं। वहीं सही तरीके से पृथक्करण, कम्पोस्टिंग और रिसाइक्लिंग लागू होने पर लैंडफिल का दबाव कम होगा, प्रदूषण घटेगा और हरित रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
