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राजनांदगांव जिला अस्पताल में नवजात की मौत पर बवाल: 18 घंटे तक नहीं मिली जांच रिपोर्ट, दो लैब टेक्नीशियन हटे, स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिला अस्पताल में नवजात बच्ची की मौत के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि महज एक एचबी (हीमोग्लोबिन) जांच रिपोर्ट मिलने में करीब 18 घंटे की देरी हुई, जिसके चलते समय पर सिजेरियन ऑपरेशन नहीं हो सका और गर्भ में ही बच्ची की मौत हो गई। मामले के तूल पकड़ने के बाद प्रशासन ने दो लैब टेक्नीशियनों को हटा दिया है, डॉक्टरों की भूमिका की जांच के लिए समिति गठित की गई है और घटना को लेकर कांग्रेस ने स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के इस्तीफे की मांग करते हुए प्रदर्शन शुरू कर दिया है।

Sonali22 जुल. 2026, 02:51 PM IST
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राजनांदगांव जिला अस्पताल में नवजात की मौत पर बवाल: 18 घंटे तक नहीं मिली जांच रिपोर्ट, दो लैब टेक्नीशियन हटे, स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिला अस्पताल में नवजात बच्ची की मौत के बाद सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। आरोप है कि प्रसव के लिए भर्ती गर्भवती महिला की हीमोग्लोबिन (HB) जांच रिपोर्ट आने में करीब 18 घंटे की देरी हुई, जिसके कारण समय पर सिजेरियन ऑपरेशन नहीं हो सका और गर्भ में ही नवजात बच्ची की मौत हो गई। मामले के सामने आने के बाद जिला प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए दो लैब टेक्नीशियनों को हटा दिया है, एक कर्मचारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की गई है और ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टरों की भूमिका की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की गई है।


क्या है पूरा मामला?

यह घटना छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के बसंतपुर स्थित जिला अस्पताल की है। टोलागांव निवासी कविता मंडावी को रविवार रात प्रसव पीड़ा होने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चिकित्सकों ने महिला की स्थिति का आकलन करने के लिए हीमोग्लोबिन (HB) सहित आवश्यक पैथोलॉजी जांच कराने के निर्देश दिए।


परिजनों का आरोप है कि सामान्य एचबी जांच रिपोर्ट मिलने में करीब 18 घंटे का समय लग गया। इस दौरान महिला लगातार प्रसव पीड़ा से जूझती रही, लेकिन रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होने के कारण सिजेरियन ऑपरेशन नहीं किया गया। सोमवार दोपहर ऑपरेशन किया गया, तब तक गर्भ में पल रही बच्ची की मौत हो चुकी थी। घटना के बाद परिजनों और स्थानीय लोगों ने अस्पताल प्रशासन पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया।

प्रारंभिक जांच में क्या सामने आया?


जिला अस्पताल प्रशासन की प्रारंभिक जांच में सामने आया कि बच्ची की मौत गर्भ में ही हो चुकी थी। चिकित्सकीय परीक्षण में यह भी बताया गया कि गर्भस्थ शिशु ने दूषित एमनियोटिक द्रव (गंदा पानी) निगल लिया था। हालांकि यह जांच का विषय है कि यदि समय पर ऑपरेशन किया जाता तो क्या नवजात की जान बचाई जा सकती थी।


प्रशासन ने क्या कार्रवाई की?

घटना के बाद राजनांदगांव कलेक्टर के निर्देश पर अस्पताल में संचालित एचएलएल लाइफकेयर लिमिटेड (HLL Lifecare Limited) की लैब सेवाओं और उपचार प्रक्रिया की जांच शुरू की गई।

प्रारंभिक जांच में रिपोर्ट देने में कथित लापरवाही सामने आने पर लैब टेक्नीशियन खोमेंद्र कुमार और विक्रम लाड़ेश्वर को तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया। इसके अलावा कर्मचारी खोमेंद्र कुमार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए बसंतपुर थाना को पत्र भेजा गया है।

मामले में रात की ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर एकता डेनियल और सुबह की ड्यूटी संभालने वाली डॉक्टर भाविका की भूमिका की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति भी गठित की गई है। समिति की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।


सिविल सर्जन ने क्या कहा?

जिला सिविल सर्जन डॉ. महेंद्र प्रसाद ने कहा कि शिशु की मृत्यु गर्भ में ही हो चुकी थी। उन्होंने बताया कि जांच रिपोर्ट में देरी की शिकायत मिलने के बाद संबंधित लैब कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। डॉक्टरों की कार्यप्रणाली की भी स्वतंत्र जांच कराई जा रही है और यदि किसी स्तर पर लापरवाही पाई जाती है तो नियमानुसार कार्रवाई होगी।


कांग्रेस का प्रदर्शन, स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग

घटना के विरोध में मंगलवार को युवा कांग्रेस ने जिला अस्पताल के मुख्य द्वार के सामने प्रदर्शन किया। कार्यकर्ताओं ने स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल का पुतला दहन किया और मुख्यमंत्री तथा स्वास्थ्य मंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की।

प्रदेश मीडिया पैनलिस्ट अभिमन्यु उदय मिश्रा ने आरोप लगाया कि ब्लड रिपोर्ट मिलने में हुई देरी के कारण ऑपरेशन समय पर नहीं हो सका और नवजात की जान चली गई। युवा कांग्रेस नेता संदीप सोनी ने कहा कि जिला अस्पताल में लगातार लापरवाही के मामले सामने आ रहे हैं। पूर्व पार्षद ऋषि शास्त्री ने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की, जबकि अन्य नेताओं ने स्वास्थ्य मंत्री से नैतिक आधार पर इस्तीफा देने की मांग की।


मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

यह घटना सरकारी अस्पतालों में आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं, लैब प्रबंधन, प्रसूति देखभाल और मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि जांच में लापरवाही साबित होती है तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय तथा कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यह मामला स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही और समयबद्ध जांच व्यवस्था की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।