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AI के दौर में भी किताबों की अहमियत बरकरार: कोल्हापुर की जर्जर लाइब्रेरी पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेकर शुरू की जनहित याचिका
AI और डिजिटल क्रांति के इस दौर में बॉम्बे हाई कोर्ट ने पुस्तकालयों (Libraries) के वजूद और महत्व पर बेहद महत्वपूर्ण संदेश दिया है। महाराष्ट्र की ऐतिहासिक 'भास्करराव जाधव लाइब्रेरी' की जर्जर हालत और दुर्लभ किताबों के बारिश में भीगने का स्वतः संज्ञान लेते हुए हाई कोर्ट ने जनहित याचिका दर्ज की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तकनीक कितनी भी आगे बढ़ जाए, पुस्तकालय कबाड़खाना नहीं हैं, बल्कि समाज और ज्ञान के बीच आज भी सबसे मजबूत पुल हैं।
Sonali22 जुल. 2026, 02:53 PM IST

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल तकनीक के तेजी से बढ़ते दौर में भी पुस्तकालयों की उपयोगिता और महत्व कम नहीं हुआ है। इसी सोच को रेखांकित करते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित ऐतिहासिक भास्करराव जाधव लाइब्रेरी की जर्जर हालत पर स्वत: संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेते हुए जनहित याचिका (PIL) दर्ज कर ली है। अदालत ने कहा कि पुस्तकालय केवल किताबों का संग्रह नहीं, बल्कि समाज और ज्ञान के बीच सबसे मजबूत पुल हैं। इन्हें ऐसी जगह नहीं बनने दिया जा सकता, जहां पुरानी और दुर्लभ किताबें उपेक्षा के कारण नष्ट हो जाएं।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला महाराष्ट्र के कोल्हापुर शहर की रुईकर कॉलोनी स्थित भास्करराव जाधव लाइब्रेरी से जुड़ा है। यह पुस्तकालय कई दशकों से विद्यार्थियों, शोधार्थियों, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं और साहित्य प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण अध्ययन केंद्र रहा है।
14 जुलाई 2026 को एक मराठी समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट में लाइब्रेरी की बदहाल स्थिति को उजागर किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, लगातार हो रही मानसूनी बारिश और वर्षों से रखरखाव के अभाव के कारण इमारत की छत से पानी टपक रहा है। इससे लाइब्रेरी में सुरक्षित रखी गई दुर्लभ पुस्तकें, ऐतिहासिक दस्तावेज, पांडुलिपियां और अन्य मूल्यवान अभिलेख खराब होने के खतरे में हैं। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद मामला बॉम्बे हाई कोर्ट के संज्ञान में पहुंचा।
कोर्ट ने कब और कैसे लिया स्वत: संज्ञान?
21 जुलाई 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव और न्यायमूर्ति नंदेश एस. देशपांडे शामिल थे, ने मराठी समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट का स्वत: संज्ञान लिया।
अदालत ने मामले को जनहित याचिका (Suo Motu PIL) के रूप में पंजीकृत करने का आदेश दिया। साथ ही बॉम्बे हाई कोर्ट लीगल एड कमेटी के माध्यम से अधिवक्ता ऋतेश थोबाडे और अधिवक्ता भार्गवी पाटिल को एमिकस क्यूरी (Amicus Curiae) नियुक्त किया, ताकि वे मामले की सुनवाई में अदालत की सहायता कर सकें।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान अदालत ने पुस्तकालयों की भूमिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि AI के युग में भी पुस्तकालयों का महत्व कम नहीं हुआ है। वे आज भी समाज और ज्ञान के बीच सबसे मजबूत सेतु हैं और डिजिटल असमानता (Digital Divide) को कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
कोर्ट ने कहा कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, ग्रामीण छात्र, शोधार्थी और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले हजारों युवा आज भी पुस्तकालयों पर निर्भर हैं। इसलिए पुस्तकालयों की अनदेखी पूरे समाज के बौद्धिक विकास को प्रभावित कर सकती है।
अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि पुस्तकालयों को ऐसा "अटारी" (Attic) नहीं माना जा सकता, जहां पुरानी किताबों को मरने के लिए छोड़ दिया जाए। सरकार और संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे इन सांस्कृतिक और बौद्धिक धरोहरों का संरक्षण करें।
कोर्ट ने क्या निर्देश दिए?
हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार, कोल्हापुर नगर प्रशासन और संबंधित अधिकारियों से लाइब्रेरी की वर्तमान स्थिति, संरक्षण के लिए उठाए गए कदम और भविष्य की कार्ययोजना पर जवाब मांगा है।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि सुनवाई के दौरान यह देखा जाएगा कि दुर्लभ पुस्तकों और ऐतिहासिक अभिलेखों को सुरक्षित रखने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं। यदि आवश्यक हुआ तो अदालत आगे और निर्देश भी जारी कर सकती है।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल कोल्हापुर की एक लाइब्रेरी तक सीमित नहीं है। देशभर में अनेक पुराने सार्वजनिक पुस्तकालय रखरखाव की कमी, बजट के अभाव और खराब बुनियादी ढांचे की समस्या से जूझ रहे हैं।
बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणी इस बात का संकेत है कि डिजिटल और AI युग में भी पुस्तकालयों की सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक भूमिका खत्म नहीं हुई है। यह आदेश भविष्य में अन्य ऐतिहासिक पुस्तकालयों के संरक्षण के लिए भी महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।
यह फैसला क्यों अहम माना जा रहा है?
यह आदेश केवल एक भवन के संरक्षण का मामला नहीं है, बल्कि भारत की ज्ञान परंपरा, सार्वजनिक पुस्तकालयों और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण से जुड़ा महत्वपूर्ण संदेश भी देता है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तकनीक चाहे जितनी आगे बढ़ जाए, पुस्तकालयों का स्थान कोई नहीं ले सकता। शिक्षा, शोध और ज्ञान तक समान पहुंच सुनिश्चित करने में उनकी भूमिका आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
