66 अरब पेड़ों का चमत्कार! चीन ने रेगिस्तान की रफ्तार पर लगाया ब्रेक
चीन ने 1978 से अब तक करीब 66 अरब पेड़ लगाकर गोबी रेगिस्तान के फैलाव को रोकने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है। नए अध्ययन के अनुसार, इन रोपित जंगलों की वृद्धि प्राकृतिक जंगलों की तुलना में 66% तेज़ है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जैव विविधता और दीर्घकालिक पर्यावरणीय संतुलन के लिए प्राकृतिक वन अब भी सबसे महत्वपूर्ण हैं।
चीन ने 1978 में शुरू किए गए "थ्री-नॉर्थ शेल्टर फॉरेस्ट प्रोग्राम" (Great Green Wall) के तहत अब तक लगभग 66 अरब पेड़ लगाए हैं। इस परियोजना का उद्देश्य गोबी और तकलामाकन रेगिस्तान के फैलाव को रोकना, धूल भरी आंधियों को कम करना और पर्यावरण संरक्षण है। हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि इन मानव-रोपित जंगलों की पत्तियों (Leaf Area Index) की वृद्धि प्राकृतिक जंगलों की तुलना में औसतन 66% तेज़ रही है। हालांकि वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि ये जंगल हर दृष्टि से प्राकृतिक जंगलों से बेहतर हैं। प्राकृतिक वन जैव विविधता, दीर्घकालिक कार्बन भंडारण और पारिस्थितिकी संतुलन के लिए अब भी अधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं। Image caption
बीजिंग: लगभग पांच दशक पहले शुरू हुई चीन की महत्वाकांक्षी 'ग्रेट ग्रीन वॉल' परियोजना अब दुनिया के सबसे बड़े वृक्षारोपण अभियानों में गिनी जाती है। 1978 से अब तक चीन ने करीब 66 अरब पेड़ लगाए हैं ताकि गोबी और तकलामाकन रेगिस्तान के फैलाव को रोका जा सके।
हाल ही में सामने आए एक वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, इन कृत्रिम रूप से लगाए गए जंगलों में पत्तियों की वृद्धि प्राकृतिक जंगलों की तुलना में लगभग 66% तेज़ दर्ज की गई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इसकी वजह इन जंगलों की अपेक्षाकृत कम उम्र, तेजी से बढ़ने वाली प्रजातियों का चयन और बेहतर वन प्रबंधन है।
हालांकि वैज्ञानिकों ने चेतावनी भी दी है कि तेज़ वृद्धि का मतलब यह नहीं कि ये जंगल प्राकृतिक वनों का पूर्ण विकल्प हैं। प्राकृतिक जंगल जैव विविधता, वन्यजीवों के संरक्षण और लंबे समय तक कार्बन संग्रहण में कहीं अधिक प्रभावी रहते हैं। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि वृक्षारोपण और प्राकृतिक वनों का संरक्षण—दोनों समान रूप से आवश्यक हैं।
चीन की यह परियोजना 2050 तक जारी रहने वाली है और इसे दुनिया की सबसे बड़ी पर्यावरणीय पहलों में से एक माना जाता है। इसका उद्देश्य केवल रेगिस्तान को रोकना ही नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना भी है।