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इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: जघन्य अपराधों में आरोपी वकीलों की प्रैक्टिस पर रोक, मुकदमे होंगे दूसरे जिले में ट्रांसफर
उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने वाले फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जघन्य अपराधों के आरोपित अधिवक्ताओं के खिलाफ सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे वकीलों को मुकदमे लंबित रहने के दौरान अदालतों में प्रैक्टिस की अनुमति नहीं दी जा सकती और उनके मामलों की सुनवाई निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए दूसरे जिले में स्थानांतरित की जानी चाहिए
Sonali22 जुल. 2026, 07:24 PM IST

उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता, निष्पक्षता और जनता के विश्वास को मजबूत करने की दिशा में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने कहा है कि जघन्य आपराधिक मामलों का सामना कर रहे अधिवक्ताओं को मुकदमे के लंबित रहने के दौरान अदालतों में वकालत करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इसके साथ ही ऐसे अधिवक्ताओं के खिलाफ चल रहे मुकदमों को उनके गृह जनपद से कम से कम 100 किलोमीटर दूर स्थित दूसरे जिले की अदालत में स्थानांतरित करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि न्यायिक प्रक्रिया किसी भी स्थानीय प्रभाव, दबाव या पक्षपात से मुक्त रह सके।
यह आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने जुलाई 2026 में पारित किया। यह मामला इटावा के अधिवक्ता मोहम्मद कफील द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया था। याचिकाकर्ता ने पुलिस कार्रवाई को चुनौती दी थी, लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत के सामने उनके विरुद्ध दर्ज आपराधिक मामलों और उनके परिवार के आपराधिक इतिहास की जानकारी आई। इसके बाद न्यायालय ने महसूस किया कि यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि पूरे राज्य की न्यायिक व्यवस्था से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। इसी कारण अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस, डीजीपी और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल से राज्यभर के अधिवक्ताओं के विरुद्ध दर्ज आपराधिक मामलों का विस्तृत ब्यौरा मांगा।
जब पुलिस और बार काउंसिल की रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश हुई तो आंकड़ों ने सभी को चौंका दिया। रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में कुल 5,14,439 अधिवक्ता पंजीकृत हैं। इनमें से 2,49,809 अधिवक्ताओं के पास वैध सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस है। वहीं पूरे प्रदेश में 4,157 अधिवक्ताओं के खिलाफ कुल 5,056 आपराधिक मामले दर्ज पाए गए। कई अधिवक्ताओं पर एक से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इतना ही नहीं, सत्यापन के दौरान 105 अधिवक्ताओं की शैक्षणिक डिग्रियां भी फर्जी पाई गईं। इन आंकड़ों को देखते हुए अदालत ने इसे न्याय व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर और चिंताजनक स्थिति बताया।
अपने विस्तृत आदेश में न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि "कानून दो बार मरता है—पहली बार जब उसके अधिकारी अपराधी बन जाते हैं और दूसरी बार जब न्यायालय चुप्पी साध लेता है।" अदालत ने कहा कि कुछ गैंगस्टर और माफिया तत्वों ने कानूनी पेशे को सुरक्षित शरणस्थली बना लिया है, जिससे जिला न्यायालयों का वातावरण प्रभावित हो रहा है और युवा अधिवक्ताओं तथा न्यायिक अधिकारियों के लिए स्वतंत्र एवं निष्पक्ष रूप से कार्य करना कठिन होता जा रहा है।
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश हत्या, बलात्कार, डकैती, गैंगस्टर एक्ट, संगठित अपराध तथा सात वर्ष या उससे अधिक की सजा वाले जघन्य अपराधों में आरोपित अधिवक्ताओं पर लागू होगा। हालांकि वैवाहिक विवाद, पारिवारिक विवाद तथा सामान्य प्रकृति के मामलों को इस श्रेणी से बाहर रखा गया है। अदालत का उद्देश्य केवल गंभीर आपराधिक मामलों में न्यायिक निष्पक्षता सुनिश्चित करना है।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि ऐसे अधिवक्ताओं के मुकदमों की सुनवाई उनके गृह जिले से कम से कम 100 किलोमीटर दूर स्थित किसी अन्य जिले की अदालत में कराई जाए। न्यायालय का मानना है कि इससे स्थानीय प्रभाव, पेशेगत दबाव और गवाहों या अधिकारियों पर संभावित असर को रोका जा सकेगा तथा निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित होगी। अदालत ने इस व्यवस्था को प्रारंभिक तौर पर पायलट परियोजना के रूप में लागू करने का भी सुझाव दिया है।
फर्जी डिग्री के मामले में भी अदालत ने सख्त रुख अपनाया। हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को निर्देश दिया कि जिन 105 अधिवक्ताओं की डिग्रियां फर्जी पाई गई हैं, उनके खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कराई जाए और जालसाजी, धोखाधड़ी सहित संबंधित धाराओं में कानूनी कार्रवाई की जाए। अदालत ने कहा कि यदि वर्षों तक फर्जी डिग्री के आधार पर लोग अदालतों में पेश होते रहे हैं तो यह नियामक व्यवस्था की गंभीर विफलता है।
हाई कोर्ट ने पुलिस प्रशासन को भी कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अदालत ने कहा कि किसी भी अधिवक्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने और चार्जशीट दाखिल होने की जानकारी तत्काल संबंधित जिला न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट तथा उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को भेजी जाए। इसके अलावा प्रत्येक अधिवक्ता को हर वर्ष शपथपत्र देकर अपने खिलाफ दर्ज किसी भी आपराधिक मामले की जानकारी देना अनिवार्य किया जाए। यदि कोई अधिवक्ता गलत जानकारी देता है तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए। अदालत ने 30 दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट भी तलब की है तथा मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त 2026 निर्धारित की है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस आदेश का प्रभावी ढंग से पालन किया जाता है तो उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी, बार काउंसिल की जवाबदेही तय होगी और न्यायपालिका में आम जनता का विश्वास और अधिक मजबूत होगा।
