crime
नोटबंदी के 10 साल बाद बड़ा फैसला: पुराने 1,000 रुपये के नोट बदलने के नाम पर हुई ठगी मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट ने ED की PMLA कार्रवाई को बताया वैध, 10 दोषियों को नहीं मिली राहत
2016 की नोटबंदी के दौरान पुराने 1,000 रुपये के नोटों को नए 2,000 रुपये के नोटों में बदलने का झांसा देकर कथित ठगी करने वाले 10 दोषियों को कर्नाटक हाई कोर्ट से बड़ी राहत नहीं मिली है। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत दर्ज मामले को रद्द करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग दो अलग-अलग अपराध हैं। इसलिए PMLA के तहत मुकदमा चलाना संविधान के अनुच्छेद 20(2) के तहत "डबल जियोपार्डी" नहीं माना जाएगा। न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग का अपराध स्वतंत्र प्रकृति का है और इसकी सुनवाई विशेष अदालत में कानून के अनुसार जारी रहेगी।
Sonali22 जुल. 2026, 07:26 PM IST

कर्नाटक हाई कोर्ट ने 2016 की नोटबंदी के दौरान पुराने 1,000 रुपये के नोटों को नए 2,000 रुपये के नोटों में बदलने का झांसा देकर लोगों से ठगी करने के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत दर्ज मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत धोखाधड़ी और PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग दो अलग-अलग अपराध हैं, इसलिए PMLA के तहत मुकदमा चलाना संविधान के अनुच्छेद 20(2) के तहत "डबल जियोपार्डी" नहीं माना जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
8 नवंबर 2016 को केंद्र सरकार ने देशभर में 500 और 1,000 रुपये के पुराने नोटों को बंद (नोटबंदी) करने की घोषणा की थी। लोगों को 31 दिसंबर 2016 तक पुराने नोट बैंक में जमा कराने या बदलने की अनुमति दी गई थी।
इसी दौरान बेंगलुरु में कुछ लोगों ने दावा किया कि वे पुराने 1,000 रुपये के नोटों को नए 2,000 रुपये के नोटों में बदलवा देंगे। इसके बदले उन्होंने लोगों से कमीशन (प्रीमियम) लिया। आरोप है कि बड़ी मात्रा में नकदी लेने के बावजूद उन्होंने न तो नए नोट दिए और न ही पैसे लौटाए। इस कथित ठगी में कई लोगों के साथ करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी हुई।
पुलिस जांच में क्या हुआ?
पीड़ितों की शिकायत पर पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत धोखाधड़ी का मामला दर्ज किया। जांच पूरी होने के बाद आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई और ट्रायल कोर्ट में मुकदमा चला। सुनवाई के बाद 10 आरोपियों को दोषी ठहराया गया।
इसी धोखाधड़ी से अर्जित कथित अवैध धन को "प्रोसीड्स ऑफ क्राइम" मानते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी PMLA के तहत अलग से मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
हाई कोर्ट क्यों पहुंचे आरोपी?
धोखाधड़ी के मामले में दोषी ठहराए गए 10 आरोपियों ने कर्नाटक हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि उन्हें पहले ही ट्रायल कोर्ट सजा दे चुका है। ऐसे में ED द्वारा PMLA के तहत दूसरा मुकदमा चलाना संविधान के अनुच्छेद 20(2) के तहत "डबल जियोपार्डी" यानी एक ही अपराध के लिए दो बार मुकदमा चलाने के समान है। उन्होंने ED की पूरी कार्रवाई रद्द करने की मांग की।
कोर्ट ने कब और किसने सुनाया फैसला?
इस मामले की सुनवाई कर्नाटक हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ ने की।
9 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने अपना आदेश पारित करते हुए आरोपियों की याचिका खारिज कर दी। बाद में 21 जुलाई 2026 को इस फैसले का विस्तृत विवरण सार्वजनिक रिपोर्टों में सामने आया।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने अपने आदेश में कहा,
"PMLA के तहत अभियोजन न तो उसी अपराध के लिए दूसरा ट्रायल है और न ही यह संविधान का उल्लंघन है। यह एक स्वतंत्र वैधानिक अपराध है, जिसकी सुनवाई विशेष PMLA अदालत करेगी।"
अदालत ने कहा कि IPC के तहत धोखाधड़ी और PMLA के तहत मनी लॉन्ड्रिंग अलग-अलग अपराध हैं। यदि अपराध से अर्जित धन का उपयोग, छिपाव या उसे वैध बनाने का प्रयास किया गया है, तो उसके लिए ED अलग से कार्रवाई कर सकती है। इसलिए PMLA का मुकदमा जारी रहेगा।
डबल जियोपार्डी क्या है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(2) कहता है कि किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार मुकदमे या सजा का सामना नहीं करना पड़ेगा। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि जब दो अलग-अलग कानूनों के तहत अलग-अलग अपराध बनते हैं, तब यह सिद्धांत लागू नहीं होता। इसलिए IPC और PMLA के तहत कार्रवाई एक साथ चल सकती है।
फैसले का महत्व
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भविष्य में उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण नज़ीर बनेगा, जहां किसी आरोपी के खिलाफ पहले से आपराधिक मुकदमा चल चुका हो और बाद में उसी अपराध से जुड़े धन की जांच ED द्वारा PMLA के तहत की जाए। इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि अपराध से अर्जित धन के मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामलों में ED स्वतंत्र रूप से कार्रवाई कर सकती है और इसे "डबल जियोपार्डी" नहीं माना जाएगा।
