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शाहदरा में फर्जी मार्कशीट गिरोह का भंडाफोड़, 10वीं-12वीं के जाली प्रमाणपत्र बनाने वाले 3 आरोपी गिरफ्तार

शाहदरा जिला पुलिस ने 10वीं और 12वीं कक्षा की कथित फर्जी मार्कशीट और शैक्षणिक प्रमाणपत्र तैयार कर बेचने वाले गिरोह का पर्दाफाश करते हुए तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, आरोपी कथित तौर पर 100 से 150 फर्जी मार्कशीट और प्रमाणपत्र बेच चुके थे और प्रत्येक दस्तावेज के लिए 5,000 से 10,000 रुपये तक वसूले जाते थे। पुलिस ने कार्रवाई के दौरान लैपटॉप, प्रिंटर और अन्य सामग्री बरामद की है। डिकॉय ऑपरेशन के जरिए मुख्य आरोपी तक पहुंचने के बाद पुलिस ने पूछताछ के आधार पर दो अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया। अब जांच एजेंसियां कथित नेटवर्क के अन्य सदस्यों, फर्जी दस्तावेज खरीदने वाले लोगों और इन प्रमाणपत्रों के इस्तेमाल की जांच कर रही हैं।

Anshuman Mishra22 जुल. 2026, 07:30 PM IST
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शाहदरा में फर्जी मार्कशीट गिरोह का भंडाफोड़, 10वीं-12वीं के जाली प्रमाणपत्र बनाने वाले 3 आरोपी गिरफ्तार


नई दिल्ली: दिल्ली के शाहदरा जिले में पुलिस ने फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र और मार्कशीट तैयार कर बेचने वाले एक कथित गिरोह का पर्दाफाश किया है। शाहदरा जिला पुलिस की स्पेशल स्टाफ टीम ने कार्रवाई करते हुए 10वीं और 12वीं कक्षा की फर्जी मार्कशीट और शैक्षणिक प्रमाणपत्र तैयार करने के आरोप में तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस की शुरुआती जांच में कथित तौर पर सामने आया है कि आरोपी लंबे समय से इस अवैध कारोबार में सक्रिय थे और अब तक करीब 100 से 150 फर्जी मार्कशीट व प्रमाणपत्र बेच चुके थे। पुलिस के अनुसार, जाली दस्तावेज तैयार करने के बदले ग्राहकों से कथित तौर पर 5,000 रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक वसूले जाते थे। पुलिस ने आरोपियों के पास से लैपटॉप, प्रिंटर और फर्जी दस्तावेज तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्री बरामद की है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस नेटवर्क का दायरा कितना बड़ा है और आरोपियों ने अब तक कितने लोगों को फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज उपलब्ध कराए हैं।


कैसे हुआ फर्जी मार्कशीट नेटवर्क का खुलासा ?

मामले का खुलासा उस समय हुआ जब शाहदरा जिला पुलिस की स्पेशल स्टाफ टीम को फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्र तैयार करने और उनकी बिक्री से जुड़े एक नेटवर्क के बारे में जानकारी मिली। सूचना के आधार पर पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और कथित तौर पर गिरोह तक पहुंचने के लिए एक डिकॉय ऑपरेशन की योजना बनाई। पुलिस ने ग्राहक बनकर आरोपियों से संपर्क किया। कथित तौर पर 10वीं की मार्कशीट की कॉपी, फोटो और आधार कार्ड जैसी जानकारी व्हाट्सऐप के माध्यम से साझा की गई। इसके बाद 12वीं कक्षा की मार्कशीट तैयार कराने के लिए सौदा तय किया गया। पुलिस ने इसी प्रक्रिया के दौरान आरोपी को पकड़ने के लिए जाल बिछाया और कथित तौर पर मुख्य आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।


मुख्य आरोपी के पास से मिलीं फर्जी मार्कशीट

पुलिस की कार्रवाई के दौरान शाहदरा निवासी 53 वर्षीय नवनीत त्यागी को गिरफ्तार किया गया। पुलिस के मुताबिक, उसके पास से 10वीं और 12वीं कक्षा की दो कथित फर्जी मार्कशीट बरामद हुईं। इसके बाद आरोपी से पूछताछ की गई और कथित नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों के बारे में जानकारी जुटाई गई। पुलिस ने पूछताछ के आधार पर आगे कार्रवाई करते हुए दो अन्य संदिग्ध आरोपियों को भी गिरफ्तार किया। इनमें गाजियाबाद निवासी 41 वर्षीय सबाब आलम और दिल्ली के मौजपुर निवासी 49 वर्षीय फरीद अहमद सैफी शामिल हैं।


लैपटॉप और प्रिंटर समेत कई सामान बरामद

पुलिस की जांच में कथित तौर पर सामने आया कि फर्जी मार्कशीट और प्रमाणपत्र तैयार करने के लिए डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता था। कार्रवाई के दौरान पुलिस ने एक लैपटॉप, प्रिंटर और अन्य सामग्री बरामद करने की बात कही है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि इन उपकरणों के जरिए कितने फर्जी दस्तावेज तैयार किए गए। साथ ही पुलिस यह भी जांच कर रही है कि क्या आरोपी खुद सभी दस्तावेज तैयार करते थे या किसी बड़े नेटवर्क के तहत अलग-अलग लोगों को अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गई थीं।


100 से 150 फर्जी दस्तावेज बेचने का दावा

पुलिस की शुरुआती पूछताछ के आधार पर आरोपियों पर कथित तौर पर 100 से 150 फर्जी मार्कशीट और प्रमाणपत्र बेचने का आरोप है। इन दस्तावेजों को तैयार करने के लिए ग्राहकों से कथित तौर पर 5,000 से 10,000 रुपये तक की रकम ली जाती थी। अगर जांच में यह संख्या सही साबित होती है, तो मामला केवल कुछ फर्जी प्रमाणपत्रों की बिक्री तक सीमित नहीं माना जाएगा, बल्कि यह एक संगठित फर्जी दस्तावेज नेटवर्क की ओर इशारा कर सकता है। पुलिस अब कथित तौर पर उन लोगों की पहचान करने की कोशिश कर रही है जिन्होंने आरोपियों से फर्जी दस्तावेज खरीदे थे।


पुराने या समाप्त पंजीकरण के दुरुपयोग की जांच

जांच का एक अहम पहलू कथित तौर पर एक पुराने या समाप्त हो चुके शैक्षणिक संस्थान के पंजीकरण के दुरुपयोग से जुड़ा है। पुलिस को आशंका है कि आरोपी किसी पुराने पंजीकरण या संस्थागत पहचान का इस्तेमाल करके ऐसे प्रमाणपत्र तैयार करते थे, जिन्हें देखने में वास्तविक समझा जा सके। जांच एजेंसियां इस बात की भी पड़ताल कर रही हैं कि दस्तावेजों पर इस्तेमाल की जाने वाली जानकारी आरोपियों को कहां से मिलती थी और क्या इस काम में किसी अन्य व्यक्ति या संस्था की मिलीभगत थी। यदि जांच में किसी संस्थान या आधिकारिक रिकॉर्ड के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो मामले की गंभीरता और बढ़ सकती है।


फर्जी मार्कशीट का इस्तेमाल कहां हो सकता है ?

फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल कई तरह की धोखाधड़ी में किया जा सकता है। ऐसे दस्तावेजों के जरिए कोई व्यक्ति नौकरी के लिए अपनी शैक्षणिक योग्यता बढ़ा-चढ़ाकर दिखा सकता है, कॉलेज या संस्थान में प्रवेश लेने की कोशिश कर सकता है या किसी अन्य आधिकारिक प्रक्रिया में गलत जानकारी दे सकता है। ऐसे मामलों में सबसे बड़ा खतरा उन उम्मीदवारों के लिए होता है जिन्होंने वास्तविक मेहनत और योग्यता के आधार पर अपनी पढ़ाई पूरी की है। यदि कोई व्यक्ति जाली प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी या दाखिला हासिल करता है, तो इससे योग्य उम्मीदवारों के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।


पुलिस अब खरीदारों और पूरे नेटवर्क की तलाश में

तीन आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद अब पुलिस की जांच का अगला फोकस कथित फर्जी मार्कशीट नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों और ग्राहकों की पहचान पर है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आरोपियों तक ग्राहक कैसे पहुंचते थे, दस्तावेजों के ऑर्डर कैसे लिए जाते थे और तैयार मार्कशीट किस माध्यम से ग्राहकों तक पहुंचाई जाती थी। जांच में यह भी पता लगाया जा सकता है कि कथित तौर पर बेची गई 100 से 150 फर्जी मार्कशीट का इस्तेमाल कहां किया गया। यदि इनमें से किसी दस्तावेज का इस्तेमाल नौकरी, शैक्षणिक दाखिले या किसी सरकारी प्रक्रिया में किया गया है, तो संबंधित मामलों में अलग से कार्रवाई हो सकती है।


दस्तावेज सत्यापन की बढ़ती जरूरत

शाहदरा का यह मामला एक बार फिर यह सवाल उठाता है कि फर्जी शैक्षणिक दस्तावेजों की पहचान और सत्यापन की व्यवस्था को कितना मजबूत बनाया जाना चाहिए। डिजिटल युग में दस्तावेजों की डिजाइन और प्रिंटिंग की नकल करना पहले की तुलना में आसान हो गया है। ऐसे में स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, भर्ती एजेंसियों और सरकारी विभागों के लिए आधिकारिक रिकॉर्ड के जरिए प्रमाणपत्रों का सत्यापन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी भी मार्कशीट या प्रमाणपत्र को केवल उसकी मुहर, हस्ताक्षर या प्रिंट देखकर वास्तविक मान लेना जोखिम भरा हो सकता है। संबंधित बोर्ड, विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्थान के आधिकारिक रिकॉर्ड से सत्यापन करना ही दस्तावेज की वास्तविकता सुनिश्चित करने का सबसे विश्वसनीय तरीका है।


क्या है पूरा मामला ?

शाहदरा पुलिस ने 10वीं और 12वीं कक्षा की कथित फर्जी मार्कशीट और प्रमाणपत्र तैयार कर बेचने वाले एक गिरोह के खिलाफ कार्रवाई करते हुए तीन लोगों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के अनुसार, गिरोह के सदस्य कथित तौर पर ग्राहकों से संपर्क कर उनकी जानकारी लेते थे और इसके आधार पर फर्जी शैक्षणिक दस्तावेज तैयार करते थे। पुलिस ने कथित नेटवर्क के मुख्य आरोपी समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया है और लैपटॉप, प्रिंटर तथा अन्य सामान बरामद किया है। पुलिस की शुरुआती जांच में आरोपियों द्वारा करीब 100 से 150 फर्जी मार्कशीट और प्रमाणपत्र बेचने तथा प्रत्येक दस्तावेज के लिए 5,000 से 10,000 रुपये तक लेने की बात सामने आई है। हालांकि, दस्तावेजों की वास्तविक संख्या, उनके इस्तेमाल और इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका का पता विस्तृत जांच के बाद ही चल सकेगा।


कानूनी स्थिति

इस मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों पर लगाए गए आरोप जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं। किसी भी आरोपी को अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने तक कानून की नजर में निर्दोष माना जाता है। पुलिस की जांच पूरी होने और अदालत में साक्ष्य पेश किए जाने के बाद ही आरोपों की अंतिम कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी।