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अवैध रेत खनन पर NGT सख्त, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निगरानी तंत्र मजबूत करने का निर्देश।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने अवैध रेत खनन पर सख्त रुख अपनाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रभावी निगरानी और नियामक व्यवस्था तैयार करने का निर्देश दिया है। अधिकरण ने खास तौर पर बाढ़ के बाद निजी कृषि भूमि पर जमा रेत हटाने की अनुमति की आड़ में होने वाले कथित अवैध और व्यावसायिक खनन को रोकने पर जोर दिया। NGT ने अवैध खनन की पहचान और निगरानी के लिए सैटेलाइट इमेजरी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की बात कही है। राज्यों को वैध रूप से कृषि भूमि से रेत हटाने और अवैध व्यावसायिक खनन के बीच स्पष्ट अंतर सुनिश्चित करने के साथ-साथ प्रभावी निगरानी और कार्रवाई की व्यवस्था विकसित करनी होगी।

नई दिल्ली: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने अवैध रेत खनन को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को व्यापक नियामक व्यवस्था तैयार करने का निर्देश दिया है। अधिकरण ने विशेष रूप से निजी कृषि भूमि पर बाढ़ के बाद जमा हुई रेत हटाने की अनुमति की आड़ में होने वाले कथित व्यावसायिक और अवैध खनन पर रोक लगाने के लिए प्रभावी निगरानी व्यवस्था विकसित करने को कहा है। NGT ने यह भी जोर दिया है कि अवैध गतिविधियों की पहचान और निगरानी के लिए सैटेलाइट इमेजरी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और अन्य आधुनिक तकनीकी साधनों का इस्तेमाल किया जाए। यह आदेश ऐसे समय में आया है जब देश के कई हिस्सों में नदी घाटों और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रेत खनन को लेकर पर्यावरणीय नुकसान और नियमों के उल्लंघन की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।
NGT के आदेश का मुख्य मुद्दा क्या है
NGT के निर्देशों का मुख्य केंद्र निजी कृषि भूमि पर बाढ़ के बाद जमा होने वाली रेत को हटाने और वास्तविक अवैध खनन के बीच स्पष्ट अंतर तय करना है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, अधिकरण के समक्ष ऐसे मामलों से जुड़े आवेदन आए थे, जिनमें आरोप लगाया गया कि कुछ स्थानों पर निजी कृषि भूमि से रेत हटाने की अनुमति का इस्तेमाल कथित तौर पर बड़े पैमाने पर व्यावसायिक रेत खनन के लिए किया जा रहा था। इससे यह चिंता पैदा हुई कि वैध रूप से जमा हुई रेत हटाने के प्रावधान का दुरुपयोग करके नदी क्षेत्र या अन्य संवेदनशील स्थानों से अवैध तरीके से रेत निकाली जा सकती है। अधिकरण ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि वे पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) और विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (EAC) द्वारा तैयार किए गए ढांचे के अनुरूप अपने स्तर पर प्रभावी नियामक तंत्र तैयार करें। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाढ़ के बाद खेतों में जमा रेत को हटाने की वास्तविक जरूरत और रेत के व्यावसायिक दोहन के बीच स्पष्ट सीमा बनी रहे। इससे स्थानीय प्रशासन को अनुमति देने, मात्रा निर्धारित करने और निगरानी करने में एक समान व्यवस्था विकसित करने में मदद मिल सकती है।
सैटेलाइट और AI से होगी अवैध खनन की निगरानी
NGT ने अवैध रेत खनन पर नियंत्रण के लिए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर भी जोर दिया है। सैटेलाइट तस्वीरों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी से उन क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है जहां जमीन के स्वरूप में अचानक बदलाव हुआ है या बड़े पैमाने पर खुदाई की गतिविधियां चल रही हैं। ऐसी तकनीक प्रशासन को दूरदराज के इलाकों में होने वाले संभावित अवैध खनन की पहचान करने और मौके पर जांच के लिए टीम भेजने में मदद कर सकती है। हालांकि, तकनीकी निगरानी के साथ स्थानीय स्तर पर भौतिक निरीक्षण और कानूनी कार्रवाई भी जरूरी होगी, क्योंकि केवल सैटेलाइट डेटा के आधार पर हर मामले की अंतिम पुष्टि संभव नहीं है।
कृषि भूमि से रेत हटाने की अनुमति और उसका गलत इस्तेमाल
सरकार की 2016 की Sustainable Sand Mining Management Guidelines में भी बाढ़ के बाद कृषि भूमि पर जमा रेत को हटाने से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। PIB के अनुसार, यदि बाढ़ के बाद कृषि भूमि पर रेत जमा हो जाती है और उसे केवल कृषि भूमि को पुनः उपयोग योग्य बनाने की सीमा तक हटाया जाता है, तो ऐसी गतिविधि को सामान्य रेत खनन के रूप में नहीं माना जा सकता और कुछ परिस्थितियों में पर्यावरणीय मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि, इस प्रावधान का उद्देश्य कृषि भूमि की बहाली है, न कि निजी जमीन के नाम पर बड़े पैमाने पर रेत का व्यावसायिक दोहन। यही अंतर NGT के मौजूदा निर्देशों को महत्वपूर्ण बनाता है।
अवैध खनन से पर्यावरण को क्या नुकसान?
रेत नदी की प्राकृतिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अत्यधिक और अनियंत्रित खनन से नदी की तलहटी और किनारों की संरचना प्रभावित हो सकती है। इससे नदी के प्रवाह, भूजल पुनर्भरण, कटाव और बाढ़ के जोखिम पर असर पड़ सकता है। नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर निर्भर जलीय जीवों और आसपास के पर्यावरण को भी नुकसान पहुंच सकता है। यही कारण है कि भारत में रेत खनन को नियंत्रित करने के लिए पर्यावरणीय मंजूरी, खनन योजना और निगरानी से जुड़े नियम बनाए गए हैं। केंद्र सरकार के अनुसार, रेत एक लघु खनिज है और इसके खनन को नियंत्रित करने तथा अवैध खनन, परिवहन और भंडारण रोकने में राज्य सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
नदी, पुल और रेलवे ढांचे पर भी पड़ सकता है असर
अवैध और अत्यधिक रेत खनन का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता। यदि नदी के आसपास या नदी तल में निर्धारित सीमा से अधिक खुदाई की जाती है, तो इससे नदी के किनारों और आसपास मौजूद बुनियादी ढांचे की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। NGT की कार्यवाही से जुड़े एक अन्य मामले में जम्मू-कश्मीर के सांबा क्षेत्र में खनन के बाद पुलों के पिलर और रेलवे पुल के उजागर होने से संबंधित रिपोर्ट पर कार्रवाई सामने आई थी। ऐसे मामले बताते हैं कि खनन की निगरानी में पर्यावरणीय प्रभाव के साथ-साथ पुल, सड़क और रेलवे जैसी सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
राज्यों की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण है?
केंद्र सरकार के अनुसार, MMDR Act, 1957 के तहत लघु खनिजों के लिए खनिज रियायतों को नियंत्रित करने के नियम बनाने की शक्ति मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती है। इसी तरह अवैध खनन, खनिजों के अवैध परिवहन और भंडारण को रोकने के लिए भी राज्य सरकारें नियम और प्रवर्तन व्यवस्था लागू करती हैं। ऐसे में NGT का निर्देश केवल एक न्यायिक आदेश के रूप में नहीं, बल्कि राज्यों के लिए निगरानी और प्रवर्तन व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत के तौर पर भी देखा जा सकता है।
कागजों पर अनुमति से आगे वास्तविक निगरानी की चुनौती
अवैध खनन रोकने में सबसे बड़ी चुनौती अक्सर अनुमति और वास्तविक गतिविधि के बीच अंतर की निगरानी होती है। किसी क्षेत्र में सीमित मात्रा में रेत हटाने की अनुमति मिलने के बाद यदि उससे कहीं अधिक मात्रा में रेत निकाली जाती है, तो प्रशासन के लिए इसकी पहचान करना जरूरी है। इसी तरह वैध खनन क्षेत्र से बाहर खुदाई, रात में खनन, अवैध परिवहन और बिना अनुमति के भंडारण जैसी गतिविधियों पर भी निगरानी की आवश्यकता होती है। सैटेलाइट, ड्रोन, AI और डिजिटल ट्रैकिंग जैसी तकनीकें इस पूरी प्रक्रिया को मजबूत कर सकती हैं, लेकिन इसके साथ स्थानीय प्रशासन और प्रवर्तन एजेंसियों की जवाबदेही भी महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
अवैध रेत खनन पर पहले भी अदालतें सख्त
अवैध रेत खनन को लेकर न्यायपालिका पहले भी कई बार सख्त रुख अपना चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2024 के एक आदेश में भी संबंधित अधिकारियों को अवैध रेत खनन रोकने के लिए हर संभव कदम उठाने और अवैध खनन में शामिल लोगों के खिलाफ आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। इससे स्पष्ट है कि रेत खनन से जुड़े नियमों का पालन केवल पर्यावरणीय अनुपालन का विषय नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
आदेश का आम लोगों और किसानों पर क्या असर होगा?
NGT के निर्देशों का उद्देश्य वैध रूप से बाढ़ के बाद कृषि भूमि पर जमा हुई रेत को हटाने की वास्तविक जरूरत को खत्म करना नहीं है। मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ऐसी अनुमति की आड़ में अवैध और व्यावसायिक रेत खनन न हो। किसानों के लिए यह व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि बाढ़ के बाद खेतों में जमा रेत हटाना कई क्षेत्रों में कृषि भूमि को दोबारा उपयोग योग्य बनाने के लिए जरूरी होता है। वहीं, नियामक तंत्र का उद्देश्य यह तय करना होगा कि रेत हटाने की प्रक्रिया वास्तव में कृषि भूमि की बहाली के लिए हो रही है या उसका उद्देश्य रेत का व्यावसायिक दोहन है।
अब राज्यों के सामने क्या चुनौती?
अब राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सामने सबसे बड़ी चुनौती NGT के निर्देशों को प्रभावी तरीके से लागू करना होगी। इसके लिए उन्हें स्पष्ट नियम, अनुमति प्रक्रिया, रेत की मात्रा का रिकॉर्ड, परिवहन की निगरानी और नियमित निरीक्षण की व्यवस्था मजबूत करनी पड़ सकती है। साथ ही, संभावित अवैध खनन क्षेत्रों की पहचान के लिए सैटेलाइट डेटा और AI आधारित तकनीक को प्रशासनिक कार्रवाई से जोड़ना भी महत्वपूर्ण होगा। केवल नियम बनाने से अवैध खनन नहीं रुकेगा; इसके लिए नियमित निगरानी, तेज कार्रवाई और उल्लंघन करने वालों पर प्रभावी दंड जरूरी होगा।
क्या है पूरा मामला?
राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने निजी कृषि भूमि पर बाढ़ के बाद जमा रेत हटाने की आड़ में कथित अवैध और व्यावसायिक रेत खनन को रोकने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नियामक तंत्र तैयार करने का निर्देश दिया है। NGT ने कहा है कि राज्यों को MoEF&CC और विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति के ढांचे के अनुरूप व्यवस्था बनानी चाहिए। अधिकरण ने अवैध खनन की पहचान और निगरानी के लिए सैटेलाइट इमेजरी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया है। अब इस आदेश के बाद राज्यों की जिम्मेदारी बढ़ गई है कि वे कृषि भूमि से वास्तविक जरूरत के तहत रेत हटाने और अवैध व्यावसायिक खनन के बीच स्पष्ट अंतर सुनिश्चित करें तथा पर्यावरण और सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर प्रभावी कार्रवाई करें।
क्यों महत्वपूर्ण है NGT का यह निर्देश?
NGT का यह निर्देश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में रेत निर्माण क्षेत्र के लिए एक आवश्यक प्राकृतिक संसाधन है, लेकिन इसका अनियंत्रित दोहन नदियों और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। दूसरी ओर, बाढ़ प्रभावित कृषि भूमि से अतिरिक्त रेत हटाना किसानों के लिए वास्तविक आवश्यकता हो सकती है। ऐसे में चुनौती दोनों जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की है। NGT का जोर इसी बात पर है कि वैध गतिविधियों के लिए स्पष्ट नियम हों और उन नियमों की आड़ में अवैध खनन को जगह न मिले। यदि राज्यों द्वारा तकनीकी निगरानी, पारदर्शी अनुमति प्रणाली और सख्त प्रवर्तन को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो इससे अवैध रेत खनन पर नियंत्रण पाने और नदी एवं पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मदद मिल सकती है।
नोट: उपलब्ध ताजा रिपोर्टों के अनुसार NGT के निर्देश 21 जुलाई 2026 को सार्वजनिक रूप से रिपोर्ट किए गए। आपके दिए गए अखबारी क्लिप में आदेश की तारीख 17 जुलाई बताई गई है। इसलिए खबर में 17 जुलाई को आदेश की तारीख और 21 जुलाई को उसके सार्वजनिक होने/रिपोर्ट किए जाने की तारीख के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है। मामले की अंतिम कानूनी व्याख्या और आदेश के विस्तृत मूल पाठ के लिए NGT के आधिकारिक रिकॉर्ड को प्राथमिक स्रोत माना जाना चाहिए।
