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भूजल, नदियां और तालाबो की सुरक्षा पर NGT सख्त, जारी किये कई अहम् दिशा-निर्देश ।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े तीन अहम मामलों में सख्त रुख अपनाते हुए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। दिल्ली में अनियंत्रित भूजल दोहन पर एनजीटी ने दिल्ली जल बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और बिना निगरानी भूजल निकाल रहे होटल व गेस्ट हाउसों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने का आदेश दिया। वहीं मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी में हजारों लीटर दूध अर्पित किए जाने के मामले में न्यायाधिकरण ने धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर देते हुए बड़े आयोजनों में प्रदूषण रोकने के लिए प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए। इसके अलावा अशोकनगर के तालाब में सीवेज प्रदूषण और अतिक्रमण के मामले में अतिक्रमण हटाने, सीवेज प्रबंधन और जलाशय संरक्षण के लिए समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा गया। एनजीटी के इन आदेशों से स्पष्ट संदेश है कि जल संसाधनों का संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और प्राकृतिक संपत्तियों की सुरक्षा सरकार, प्रशासन और आम नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।

Vindhya Dubey23 जुल. 2026, 07:55 PM IST
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भूजल, नदियां और तालाबो की सुरक्षा पर NGT सख्त, जारी किये कई अहम् दिशा-निर्देश ।

देश में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) लगातार सख्त रुख अपनाए हुए है। हाल ही में सुनवाई के दौरान न्यायाधिकरण ने दिल्ली में अनियंत्रित भूजल दोहन, मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी में बड़ी मात्रा में दूध प्रवाहित करने की धार्मिक परंपरा तथा अशोकनगर के एक तालाब पर अतिक्रमण और सीवेज प्रदूषण जैसे मामलों पर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। इन आदेशों से स्पष्ट संकेत मिलता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि स्थानीय प्रशासन, धार्मिक आयोजकों और नागरिकों की भी साझा जवाबदेही है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal) की स्थापना पर्यावरण संरक्षण अधिनियमों के प्रभावी क्रियान्वयन और पर्यावरणीय विवादों के त्वरित निपटारे के उद्देश्य से की गई थी। जल, वायु, वन, जैव विविधता और प्रदूषण से जुड़े मामलों में एनजीटी समय-समय पर केंद्र और राज्य सरकारों, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों तथा स्थानीय निकायों को जवाबदेह बनाता रहा है। हाल के आदेश भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।


दिल्ली में भूजल दोहन पर एनजीटी की नाराजगी

एनजीटी ने दिल्ली जल बोर्ड (DJB) की कार्यप्रणाली पर असंतोष जताते हुए कहा कि राजधानी के पहाड़गंज क्षेत्र में बड़ी संख्या में होटल और गेस्ट हाउस बिना उचित निगरानी के भूजल का दोहन कर रहे हैं। न्यायाधिकरण के अनुसार कुल 555 प्रतिष्ठानों में से केवल 162 ने ही डिजिटल वाटर मीटर या पाईजोमीटर लगाए हैं, जबकि 393 प्रतिष्ठान अभी भी बिना प्रभावी निगरानी के भूजल निकाल रहे हैं। पाईजोमीटर ऐसे उपकरण होते हैं जिनकी सहायता से भूजल स्तर और बोरवेल से निकाले जा रहे पानी की मात्रा का वैज्ञानिक आकलन किया जाता है। इनके बिना यह पता लगाना मुश्किल होता है कि कोई प्रतिष्ठान निर्धारित सीमा से अधिक पानी तो नहीं निकाल रहा। एनजीटी ने यह भी कहा कि दिल्ली जल बोर्ड ने केवल एक अंतिम नोटिस का रिकॉर्ड प्रस्तुत किया, जबकि बाकी प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई का स्पष्ट विवरण उपलब्ध नहीं कराया गया। न्यायाधिकरण ने बोर्ड को शीघ्र कार्रवाई कर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए।


पाईजोमीटर क्यों जरूरी हैं

भारत के कई बड़े शहरों में तेजी से गिरता भूजल स्तर गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार अनियंत्रित भूजल दोहन से जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, जिससे भविष्य में पेयजल संकट गहरा सकता है। पाईजोमीटर लगाने का उद्देश्य केवल पानी की मात्रा मापना नहीं बल्कि भूजल संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन करना भी है। इससे प्रशासन यह तय कर सकता है कि कौन-सा उपभोक्ता कितना पानी निकाल रहा है और उसके अनुसार जल शुल्क तथा नियामकीय कार्रवाई की जा सके।


नर्मदा नदी में हजारों लीटर दूध चढ़ाने पर क्या बोला एनजीटी

मध्य प्रदेश के एक धार्मिक आयोजन में लगभग 11,000 लीटर दूध और 210 साड़ियां नर्मदा नदी में प्रवाहित किए जाने का मामला भी एनजीटी के समक्ष पहुंचा। याचिकाकर्ता ने इसे नदी प्रदूषण से जोड़ते हुए रोक लगाने की मांग की थी।


सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा प्रस्तुत संयुक्त समिति की रिपोर्ट में कहा गया कि उपलब्ध वैज्ञानिक आकलन के अनुसार इस घटना से नर्मदा जैसी तेज प्रवाह वाली नदी की जल गुणवत्ता पर तत्काल प्रतिकूल प्रभाव का स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला। हालांकि रिपोर्ट में यह भी स्वीकार किया गया कि दूध एक जैविक पदार्थ है और इतनी बड़ी मात्रा में किसी भी जल स्रोत में डालना पर्यावरण की दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। विशेष रूप से तालाबों, झीलों और कम प्रवाह वाले जलाशयों में इसका प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है क्योंकि वहां पानी का प्राकृतिक शोधन और ऑक्सीजन का पुनर्भरण सीमित होता है। 


धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन

एनजीटी ने कहा कि वर्तमान में ऐसा कोई स्पष्ट कानून प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान दूध अर्पित करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जा सके। फिर भी न्यायाधिकरण ने यह स्पष्ट किया कि बड़ी मात्रा में दूध या अन्य जैविक पदार्थों को नदियों और जलाशयों में प्रवाहित करने से बचना चाहिए।न्यायाधिकरण ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय प्रशासन को निर्देश दिया कि बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान पर्यावरण संरक्षण के लिए विशेष सतर्कता बरती जाए। आयोजन निर्धारित घाटों पर हों, पूर्व अनुमति ली जाए तथा कचरा प्रबंधन, स्वच्छता और भीड़ नियंत्रण की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। 


अशोकनगर तालाब में सीवेज और अतिक्रमण पर सख्त निर्देश

एनजीटी ने मध्य प्रदेश के अशोकनगर स्थित एक जलाशय में सीवेज प्रवाह और अतिक्रमण के मामले की भी सुनवाई की। प्रशासन ने न्यायाधिकरण को बताया कि प्रस्तावित सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का डिजाइन निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप है और इसके चालू होने तक अंतरिम व्यवस्था के तहत बिना उपचार वाला सीवेज तालाब में जाने से रोक दिया गया है। प्रशासन ने यह भी जानकारी दी कि तालाब की सीमा का चिन्हांकन कर स्थायी सीमा स्तंभ लगाए जा चुके हैं ताकि भविष्य में अतिक्रमण रोका जा सके।


65 अतिक्रमणों की पहचान, कार्रवाई जारी

अधिकारियों के अनुसार तालाब क्षेत्र में कुल 65 अतिक्रमणों की पहचान की गई है। इनमें अधिकांश को नोटिस जारी किए जा चुके हैं और हटाने की प्रक्रिया जारी है। राज्य सरकार ने न्यायाधिकरण को बताया कि मानसून के कारण कार्रवाई पूरी होने में चार से पांच महीने का समय लग सकता है। कुछ अवैध नगर पालिका दुकानों को भी हटाने के निर्देश दिए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 24 अगस्त 2026 को होगी। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इन तीनों मामलों का संबंध अलग-अलग विषयों से जरूर है, लेकिन मूल संदेश एक ही है—जल संसाधनों का संरक्षण, प्रदूषण की रोकथाम और प्राकृतिक संपत्तियों की सुरक्षा।


दिल्ली का मामला भूजल संकट से जुड़ा है, नर्मदा का मामला धार्मिक गतिविधियों और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के संतुलन से संबंधित है, जबकि अशोकनगर का प्रकरण शहरी जलाशयों को अतिक्रमण और सीवेज प्रदूषण से बचाने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि स्थानीय निकाय, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और संबंधित विभाग न्यायालयों के निर्देशों का समयबद्ध पालन करें तो देश के अनेक जल स्रोतों को प्रदूषण और अतिक्रमण से बचाया जा सकता है। साथ ही नागरिकों और धार्मिक आयोजकों की भागीदारी भी पर्यावरण संरक्षण की सफलता के लिए उतनी ही आवश्यक है।