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सूरत पुलिस की सरेआम बर्बरता पर हाईकोर्ट का 'हथौड़ा', आरोपियों की परेड और पिटाई पर लिया स्वतः संज्ञान।
सूरत में पुलिस कस्टडी के नाम पर बर्बरता और सरेआम यातना के वीडियो सामने आने के बाद गुजरात हाईकोर्ट का गुस्सा फूट पड़ा है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए किसी याचिका का इंतजार किए बिना खुद ही 'स्वतः संज्ञान' (Suo Motu) ले लिया है। मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल की पीठ ने सख्त रवैया अपनाते हुए राज्य के गृह विभाग के सचिव को सीधे प्रतिवादी (Respondent) के रूप में कटघरे में खड़ा किया है और जवाब तलब किया है।
Sonali23 जुल. 2026, 08:01 PM IST

जुलाई 2026 में सोशल मीडिया पर वायरल हुए उन वीडियो से शुरू हुआ, जिनमें पुलिस अधिकारी सरेआम आरोपियों को पीटते दिखे। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और अदालती ज्ञापनों के अनुसार, घटना की मुख्य तिथि, मामले की पृष्ठभूमि और अदालती कार्यवाही का चरणबद्ध विवरण इस प्रकार है:
घटनाक्रम और मामले की मुख्य पृष्ठभूमि (Incident Details)
सूरत के चौक बाजार इलाके में दो पक्षों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। घटना के तुरंत बाद स्थानीय पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए कई आरोपियों को हिरासत में लिया। हालांकि, इसके बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो प्रसारित हुए। इन वीडियो में कथित तौर पर सूरत के पुलिस उपायुक्त (DCP) राजदीपसिंह नाकुम और 15 से 20 पुलिसकर्मी शामिल दिखे। वीडियो में देखा गया कि हथकड़ी लगे आरोपियों को सार्वजनिक सड़कों पर घुमाया गया, उनके बाल खींचकर थप्पड़ मारे गए और लाठियों से उनकी पिटाई की गई।
अदालती कार्यवाही और तारीखों का क्रमबद्ध ब्यौरा (Order of Court Dates & Timeline)
14 जुलाई 2026: एडवोकेट उत्कर्ष दवे ने वायरल वीडियो और स्थानीय रिपोर्टों के आधार पर गुजरात हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल को एक औपचारिक प्रतिवेदन (Representation) सौंपा। इसमें उन्होंने घटना को संवैधानिक अधिकारों और मानवीय गरिमा का गंभीर उल्लंघन बताया। 15 से 20 जुलाई 2026: जनहित और कानून के शासन को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट प्रशासन ने इस आवेदन को स्वतः संज्ञान जनहित याचिका में बदलने की प्रक्रिया शुरू की।
22-23 जुलाई 2026: गुजरात हाईकोर्ट ने मामले का आधिकारिक स्वतः संज्ञान लिया। पीठ ने राज्य के गृह सचिव को मुख्य पक्षकार (Respondent) बनाते हुए मामले में राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन से रिपोर्ट तलब करने का आदेश दिया।
कानूनी प्रावधान और मानवाधिकारों का सवाल
अधिवक्ता द्वारा सौंपे गए ज्ञापन और अन्य कानूनी संदर्भों में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध 'डी. के. बासु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य' (D. K. Basu Case) का हवाला दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश हैं कि किसी भी अभियुक्त को हिरासत के दौरान या गिरफ्तारी के बाद अमानवीय व्यवहार, सार्वजनिक शर्मिंदगी या शारीरिक यातना नहीं दी जा सकती। गुजरात में पहले भी वर्ष 2022 के खेड़ा (Kheda) सार्वजनिक पिटाई मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ न्यायालय की अवमानना के तहत सख्त रुख अपनाया था। हालिया सूरत मामले में भी कोर्ट ने दोहराया है कि आरोपी के अपराध का निर्धारण अदालत का काम है, न कि पुलिस का।
मामले में आगे की मांगें
हाईकोर्ट में प्रस्तुत ज्ञापन में अदालत से मांग की गई है कि घटना स्थल और पुलिस वाहनों के सीसीटीवी फुटेज तथा इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए। साथ ही, घटना में शामिल अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और आपराधिक जांच के निर्देश जारी किए जाएं। हाईकोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लिए जाने के बाद राज्य सरकार की ओर से जल्द ही इस पर विस्तृत जवाब दाखिल किए जाने की संभावना है।
