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वायु प्रदूषण से बढ़ सकता है बच्चों में मस्तिष्क कैंसर का खतरा, क्या कहती है नई रिसर्च!
महानगरों में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर नई रिसर्च ने चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के अनुसार डीजल, पेट्रोल और कोयले के धुएं से निकलने वाले पीएम2.5, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) जैसे प्रदूषकों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से बच्चों में मस्तिष्क कैंसर सहित गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी तक यह संबंध पूरी तरह निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है, लेकिन उपलब्ध शोध सतर्क रहने की आवश्यकता बताते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्वच्छ हवा, प्रदूषण नियंत्रण और बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रभावी नीतियां भविष्य में गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
Anshuman Mishra23 जुल. 2026, 08:29 PM IST

डीजल, पेट्रोल और कोयले के धुएं से निकलने वाले सूक्ष्म प्रदूषक बच्चों के मस्तिष्क के विकास को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अभी निर्णायक प्रमाण नहीं हैं, लेकिन बढ़ते वैज्ञानिक साक्ष्य सावधानी बरतने का संकेत दे रहे हैं।
वायु प्रदूषण और मस्तिष्क कैंसर: क्या कहती हैं नई रिसर्च?
देश के बड़े शहरों में लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर वैज्ञानिकों और डॉक्टरों की चिंता बढ़ती जा रही है। हाल के वर्षों में प्रकाशित कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों और भारत के कैंसर विशेषज्ञों की राय के अनुसार, लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से बच्चों में मस्तिष्क कैंसर सहित कुछ गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि अभी तक यह पूरी तरह सिद्ध नहीं हुआ है कि केवल वायु प्रदूषण ही मस्तिष्क कैंसर का प्रत्यक्ष कारण है। इसके बावजूद उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण इस दिशा में गंभीर संकेत देते हैं। दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञों ने भी इस विषय पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि डीजल, पेट्रोल और कोयले के दहन से निकलने वाले कई रसायन मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक हैं और बच्चों पर इनका प्रभाव अधिक हो सकता है।
क्या है चिंता का कारण?
विशेषज्ञों के अनुसार वाहनों, औद्योगिक इकाइयों और जीवाश्म ईंधनों के जलने से निकलने वाले सूक्ष्म कण (PM2.5), नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) शरीर में सांस के माध्यम से प्रवेश कर जाते हैं। ये अत्यंत सूक्ष्म कण फेफड़ों से रक्त प्रवाह तक पहुंच सकते हैं और कुछ शोधों में यह संभावना जताई गई है कि ये मस्तिष्क तक भी प्रभाव डाल सकते हैं। बच्चों का मस्तिष्क विकासशील अवस्था में होता है, इसलिए उन पर इन प्रदूषकों का असर अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) वायु प्रदूषण को दुनिया के सबसे बड़े पर्यावरणीय स्वास्थ्य खतरों में से एक मानता है। WHO के अनुसार हर वर्ष लाखों लोगों की समय से पहले मृत्यु का संबंध प्रदूषित हवा से जुड़ी बीमारियों से होता है।
अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC), जो WHO की इकाई है, ने बाहरी वायु प्रदूषण और पार्टिकुलेट मैटर को "मानव में कैंसर पैदा करने वाला" (Group 1 Carcinogen) वर्गीकृत किया है। हालांकि यह वर्गीकरण मुख्य रूप से फेफड़ों के कैंसर के लिए मजबूत वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित है, लेकिन अन्य प्रकार के कैंसर पर भी लगातार शोध जारी हैं। डेनमार्क, कनाडा, अमेरिका और यूरोप में हुए कई जनसंख्या आधारित अध्ययनों में पाया गया है कि बचपन से लंबे समय तक PM2.5 और NO₂ जैसे प्रदूषकों के संपर्क में रहने वाले बच्चों में मस्तिष्क के कुछ प्रकार के ट्यूमर का जोखिम सामान्य आबादी की तुलना में थोड़ा अधिक देखा गया। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी कहा कि यह संबंध सांख्यिकीय है और इसे प्रत्यक्ष कारण नहीं माना जा सकता।
भारत में क्या स्थिति है?
भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां कई महानगरों में PM2.5 का स्तर WHO के सुरक्षित मानकों से कई गुना अधिक रहता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, कानपुर, लखनऊ और अन्य औद्योगिक शहरों में बच्चों और बुजुर्गों पर वायु प्रदूषण का प्रभाव अधिक देखा जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि प्रदूषण केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं है बल्कि यह हृदय, मस्तिष्क, गर्भस्थ शिशु और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डाल सकता है।
विशेषज्ञों की राय
ऑन्कोलॉजिस्टों का कहना है कि वर्तमान शोधों से यह संकेत मिलता है कि लंबे समय तक प्रदूषित वातावरण में रहने से मस्तिष्क कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है, लेकिन अभी यह कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा कि वायु प्रदूषण ही इसका एकमात्र कारण है। मस्तिष्क कैंसर के पीछे आनुवंशिक कारण, विकिरण, पर्यावरणीय कारक और अन्य जैविक कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। बच्चों की श्वसन दर वयस्कों से अधिक होती है। उनका प्रतिरक्षा तंत्र और मस्तिष्क अभी विकसित हो रहा होता है। वे अधिक समय बाहर खेलते हैं और उनके शरीर का आकार छोटा होने के कारण समान मात्रा का प्रदूषण उनके शरीर पर अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव डाल सकता है। यही कारण है कि WHO और यूनिसेफ बच्चों को वायु प्रदूषण से बचाने पर विशेष जोर देते हैं।
वायु प्रदूषण से होने वाले अन्य खतरे
केवल कैंसर ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से अस्थमा, एलर्जी, निमोनिया, हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी, गर्भावस्था संबंधी जटिलताएं, समय से पहले जन्म, मधुमेह और डिमेंशिया जैसी समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है। कई शोधों में वायु प्रदूषण और मानसिक स्वास्थ्य के बीच भी संबंध सामने आया है। इस तरह के अध्ययन सरकारों, स्वास्थ्य एजेंसियों और शहरी योजनाकारों को प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में मजबूत नीतियां बनाने के लिए प्रेरित करते हैं। यदि प्रदूषण को नियंत्रित किया जाता है तो केवल कैंसर ही नहीं बल्कि करोड़ों लोगों में सांस, हृदय और अन्य गंभीर बीमारियों का जोखिम भी कम किया जा सकता है। बच्चों के लिए स्वच्छ हवा बेहतर शारीरिक और मानसिक विकास सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों में बच्चों की बाहरी गतिविधियां सीमित रखें। AQI की नियमित जानकारी लें। भारी ट्रैफिक वाले क्षेत्रों में अनावश्यक समय बिताने से बचें। घर के अंदर स्वच्छ वायु बनाए रखें, सार्वजनिक परिवहन और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा दें तथा पेड़-पौधों का संरक्षण करें। सरकारों के स्तर पर स्वच्छ ईंधन, औद्योगिक उत्सर्जन नियंत्रण और हरित परिवहन को बढ़ावा देना सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है।
वायु प्रदूषण आज केवल पर्यावरण का नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी बड़ा संकट बन चुका है। बच्चों में मस्तिष्क कैंसर को लेकर सामने आ रहे शोध शुरुआती चेतावनी देते हैं कि स्वच्छ हवा केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं बल्कि आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा है। वैज्ञानिक अभी इस संबंध पर और अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन उपलब्ध साक्ष्य यह स्पष्ट करते हैं कि प्रदूषण कम करना समाज और सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी है। समय रहते उठाए गए कदम भविष्य में लाखों लोगों को गंभीर बीमारियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
