education
7 साल तक टीबी और अस्थमा का इलाज, जांच में गले से निकला पेन का ढक्कन; ब्रोंकोस्कोपी से बची बच्ची की जान
मुंबई में एक 10 वर्षीय बच्ची के मामले ने बच्चों में सांस संबंधी समस्याओं के सही निदान की अहमियत को सामने ला दिया है। बच्ची करीब सात वर्षों तक टीबी, अस्थमा और बार-बार होने वाले निमोनिया का इलाज कराती रही, लेकिन उसकी समस्या पूरी तरह ठीक नहीं हुई। जांच और ब्रोंकोस्कोपी के दौरान डॉक्टरों को पता चला कि उसकी श्वासनली में बचपन से पेन का प्लास्टिक ढक्कन फंसा हुआ था। डॉक्टरों ने एंडोस्कोपिक तकनीक से इसे सफलतापूर्वक बाहर निकाला। विशेषज्ञों ने कहा कि लंबे समय तक रहने वाली खांसी, बार-बार एक ही फेफड़े में संक्रमण और दवाओं से सुधार न होने की स्थिति में फॉरेन बॉडी एस्पिरेशन की संभावना की जांच जरूरी है।
Anshuman Mishra24 जुल. 2026, 12:34 AM IST

मुंबई: मुंबई में एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जहां करीब 10 वर्षीय बच्ची का सात वर्षों तक टीबी, अस्थमा और बार-बार होने वाले निमोनिया का इलाज चलता रहा, लेकिन उसकी असली बीमारी कुछ और ही निकली। विस्तृत जांच और ब्रोंकोस्कोपी के दौरान डॉक्टरों ने बच्ची की श्वासनली से बचपन में फंसा पेन का प्लास्टिक ढक्कन निकाल दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला बताता है कि यदि किसी बच्चे में लंबे समय तक लगातार खांसी, बार-बार एक ही फेफड़े में संक्रमण या दवाओं से राहत न मिलने जैसी समस्या बनी रहे, तो केवल सामान्य इलाज पर निर्भर रहने के बजाय कारण की गहराई से जांच करना बेहद जरूरी है।
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बच्ची लगभग साढ़े तीन साल की उम्र से लगातार खांसी, बार-बार बुखार, सांस लेने में तकलीफ और वजन न बढ़ने जैसी समस्याओं से जूझ रही थी। समय-समय पर उसे टीबी, अस्थमा और निमोनिया की आशंका के आधार पर उपचार दिया गया। हालांकि इलाज के बावजूद उसकी परेशानी पूरी तरह खत्म नहीं हुई और संक्रमण बार-बार लौटता रहा।
आखिरकार परिवार बच्ची को मुंबई के एक सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल लेकर पहुंचा, जहां पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजी विशेषज्ञों ने उसकी पूरी मेडिकल हिस्ट्री का पुनर्मूल्यांकन किया। जांच के दौरान डॉक्टरों को सामान्य संक्रमण से अलग किसी रुकावट की आशंका हुई, जिसके बाद ब्रोंकोस्कोपी करने का निर्णय लिया गया।
ब्रोंकोस्कोपी में सामने आया असली कारण
ब्रोंकोस्कोपी एक ऐसी एंडोस्कोपिक प्रक्रिया है, जिसमें एक पतली कैमरा युक्त लचीली ट्यूब श्वासनली और फेफड़ों के अंदर भेजकर सीधे वायुमार्ग का निरीक्षण किया जाता है। इसी जांच के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि बच्ची की श्वासनली में वर्षों से पेन का प्लास्टिक ढक्कन फंसा हुआ था। डॉक्टरों ने ब्रोंकोस्कोपिक तकनीक की मदद से ढक्कन को सुरक्षित तरीके से बाहर निकाल दिया। चिकित्सकों के अनुसार लंबे समय तक यह विदेशी वस्तु श्वासनली में फंसी रहने के कारण दाएं फेफड़े के निचले हिस्से में गंभीर क्षति हो चुकी थी और उसी हिस्से में बार-बार संक्रमण हो रहा था।
विशेषज्ञों के अनुसार छोटे बच्चे अक्सर खेलते समय सिक्के, खिलौनों के छोटे हिस्से, पेन के ढक्कन, मूंगफली, बीज, बटन या अन्य छोटी वस्तुएं मुंह में डाल लेते हैं। यदि अचानक सांस खींचने, हंसने या रोने के दौरान यह वस्तु श्वासनली में चली जाए तो उसे फॉरेन बॉडी एस्पिरेशन (Foreign Body Aspiration) कहा जाता है। कई बार वस्तु पूरी तरह सांस का रास्ता बंद कर देती है, जिससे यह जानलेवा स्थिति बन सकती है। वहीं कुछ मामलों में वस्तु श्वासनली के किसी हिस्से में फंस जाती है और वर्षों तक लगातार खांसी, घरघराहट, बार-बार निमोनिया या फेफड़ों के संक्रमण का कारण बनती रहती है।
चिकित्सकों का कहना है कि यदि घटना के समय किसी ने बच्चे को वस्तु निगलते या सांस में खींचते नहीं देखा हो, तो सही कारण का पता लगाना मुश्किल हो सकता है। शुरुआती लक्षण अस्थमा, एलर्जी या निमोनिया जैसे दिखते हैं। कई बार एक्स-रे में प्लास्टिक जैसी वस्तुएं दिखाई भी नहीं देतीं क्योंकि वे रेडियो-ओपेक नहीं होतीं। ऐसे मामलों में सीटी स्कैन, ब्रोंकोस्कोपी और विस्तृत क्लिनिकल मूल्यांकन ही सही निदान तक पहुंचने में मदद करते हैं।
बाल श्वसन रोग विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी बच्चे में लंबे समय तक लगातार खांसी बनी रहे, एक ही फेफड़े में बार-बार संक्रमण हो, बार-बार एंटीबायोटिक या अस्थमा की दवाएं देने के बाद भी सुधार न हो या सांस लेते समय लगातार घरघराहट सुनाई दे, तो फॉरेन बॉडी एस्पिरेशन की संभावना पर भी विचार किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में समय रहते विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श और जरूरत पड़ने पर ब्रोंकोस्कोपी कराना गंभीर जटिलताओं से बचा सकता है।
बच्चों में किन बातों का रखें ध्यान
पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों को छोटे आकार की वस्तुओं, पेन के ढक्कन, बटन, सिक्के, बैटरी, मूंगफली, अंगूर के बड़े टुकड़े और खिलौनों के छोटे हिस्सों से दूर रखना चाहिए। बच्चों को खेलते समय मुंह में कोई वस्तु रखने की आदत से बचाना और भोजन के दौरान निगरानी रखना भी जरूरी है। यदि किसी बच्चे को अचानक तेज खांसी शुरू हो जाए, सांस लेने में दिक्कत हो, आवाज बदल जाए या दम घुटने जैसा महसूस हो, तो तुरंत नजदीकी अस्पताल पहुंचना चाहिए। ऐसी स्थिति में देरी गंभीर परिणाम दे सकती है।
श्वसन रोग विशेषज्ञों के अनुसार यह मामला केवल एक दुर्लभ घटना नहीं बल्कि चिकित्सकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण सीख भी है। यदि किसी मरीज में लंबे समय तक इलाज के बावजूद लक्षण बने रहें, तो पुराने निदान पर ही टिके रहने के बजाय बीमारी के मूल कारण की दोबारा जांच की जानी चाहिए। समय पर सही जांच से न केवल अनावश्यक दवाओं से बचा जा सकता है, बल्कि फेफड़ों को स्थायी नुकसान होने से भी रोका जा सकता है।
