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सुप्रीम कोर्ट पहुंचा शिवसेना सांसदों के 'विलय' का विवाद! स्पीकर ओम बिरला को नोटिस, शिंदे गुट की बढ़ सकती हैं मुश्किलें

महाराष्ट्र की सियासत में बड़ा भूचाल ला चुके शिवसेना (UBT) के छह लोकसभा सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट में विलय का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्ष अदालत ने इस बहुचर्चित विवाद पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से जवाब तलब किया है। हालांकि फिलहाल स्पीकर के फैसले पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले सभी पक्षों को सुनना जरूरी है। ऐसे में अब इस मामले की अगली सुनवाई पर देशभर की राजनीतिक निगाहें टिकी हैं, क्योंकि अदालत का फैसला महाराष्ट्र की राजनीति और संसद में शिवसेना की स्थिति पर दूरगामी असर डाल सकता है।

Sonali24 जुल. 2026, 12:34 AM IST
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सुप्रीम कोर्ट पहुंचा शिवसेना सांसदों के 'विलय' का विवाद! स्पीकर ओम बिरला को नोटिस, शिंदे गुट की बढ़ सकती हैं मुश्किलें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह लोकसभा सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। हालांकि अदालत ने फिलहाल इस विलय को मान्यता देने वाले आदेश पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी।

न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ नेता एवं सांसद अरविंद गणपत सावंत द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई की। याचिका में 18 जुलाई 2026 को लोकसभा सचिवालय की ओर से जारी उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसके जरिए शिवसेना (UBT) के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट में विलय को मान्यता दी गई थी।

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने अरविंद सावंत की ओर से दलील दी कि इस मामले में किसी भी सांसद के खिलाफ दल-बदल कानून (दसवीं अनुसूची) के तहत अयोग्यता याचिका लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित नहीं थी। ऐसे में स्पीकर के पास विलय को मान्यता देने का कोई अवसर या कानूनी आधार नहीं था। उन्होंने अदालत से इस आदेश पर तत्काल रोक लगाने की मांग भी की।

याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि विलय संबंधी आदेश स्वयं लोकसभा अध्यक्ष ने हस्ताक्षरित नहीं किया, बल्कि लोकसभा सचिवालय के संयुक्त सचिव के हस्ताक्षर से जारी किया गया। याचिका में दावा किया गया है कि इस प्रकार का निर्णय केवल लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए आदेश की वैधता पर गंभीर संवैधानिक प्रश्न खड़े होते हैं।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस चरण में किसी भी प्रकार की अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पहले लोकसभा अध्यक्ष का पक्ष जानना आवश्यक है। इसके बाद ही मामले के गुण-दोष पर विचार किया जाएगा। इसी के साथ अदालत ने स्पीकर को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

यह विवाद 18 जुलाई को लोकसभा अध्यक्ष द्वारा छह शिवसेना (UBT) सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट में विलय को मान्यता देने के बाद शुरू हुआ था। इस फैसले से लोकसभा में शिंदे गुट के सांसदों की संख्या 13 हो गई, जबकि उद्धव ठाकरे गुट की संख्या घटकर तीन रह गई। इस बदलाव को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की संसदीय ताकत के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि जिन सांसदों ने 2024 का लोकसभा चुनाव शिवसेना (UBT) के चुनाव चिह्न और नेतृत्व में जीता था, उनका प्रतिद्वंद्वी शिंदे गुट था। ऐसे में चुनाव जीतने के बाद उसी प्रतिद्वंद्वी दल में शामिल होना मतदाताओं के जनादेश के विपरीत है। इस आधार पर भी स्पीकर के निर्णय को चुनौती दी गई है।

अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर रहेगी, जहां लोकसभा अध्यक्ष का जवाब आने के बाद अदालत यह तय करेगी कि सांसदों के विलय को मान्यता देने की प्रक्रिया संविधान, लोकसभा नियमों और दल-बदल विरोधी कानून के अनुरूप थी या नहीं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले में कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है और न ही विलय की वैधता पर कोई अंतिम निर्णय सुनाया है।