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गन्ने की खेती ने पकड़ी रफ्तार, पर सूखा और घटता भूजल बना बड़ा खतरा
महाराष्ट्र और कर्नाटक के अर्ध-शुष्क इलाकों में पिछले दो दशकों के दौरान गन्ने की उत्पादकता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। बेहतर सिंचाई, उन्नत किस्मों और कृषि तकनीकों ने उत्पादन बढ़ाने में मदद की है, लेकिन जलवायु परिवर्तन, सूखा, बढ़ता तापमान और भूजल पर दबाव इस प्रगति की स्थिरता पर सवाल खड़े कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में गन्ने की खेती की सफलता केवल अधिक उत्पादन से नहीं, बल्कि कम पानी में बेहतर उपज, ड्रिप सिंचाई, जल संरक्षण और जलवायु-स्मार्ट कृषि तकनीकों के प्रभावी इस्तेमाल से तय होगी। महाराष्ट्र और कर्नाटक के लिए स्थानीय जल उपलब्धता के आधार पर फसल योजना और जल प्रबंधन को प्राथमिकता देना जरूरी है।

महाराष्ट्र और कर्नाटक के दक्कन पठार के कई हिस्सों में गन्ने की खेती पिछले दो दशकों में अधिक उत्पादक हुई है। प्रति हेक्टेयर पैदावार में सुधार ने किसानों और चीनी उद्योग के लिए आर्थिक अवसर बढ़ाए हैं, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी सामने आया है—क्या अर्ध-शुष्क और पानी की कमी वाले इलाकों में गन्ने की यह बढ़ती उत्पादकता लंबे समय तक टिकाऊ रह सकती है?
एक दीर्घकालिक अध्ययन ने महाराष्ट्र के अहमदनगर, सोलापुर और नासिक तथा कर्नाटक के बेल्लारी और धारवाड़ जिलों में 1999 से 2021 के बीच गन्ने की खेती के रुझानों का विश्लेषण किया। अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष यह है कि इन क्षेत्रों में गन्ने की उत्पादन क्षमता और प्रति हेक्टेयर उपज में वृद्धि हुई है, लेकिन सूखा, मिट्टी में नमी की कमी और अत्यधिक गर्मी जैसी जलवायु परिस्थितियां फसल की उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही हैं। यानी गन्ने की खेती एक तरफ तकनीक, सिंचाई और बेहतर कृषि प्रबंधन के कारण आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ जलवायु परिवर्तन और पानी की उपलब्धता से जुड़े जोखिम भी बढ़ रहे हैं।
इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गन्ने के उत्पादन में वृद्धि केवल खेती का क्षेत्र बढ़ाने से नहीं हुई। कई जगहों पर उत्पादकता में सुधार ने उत्पादन बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई। इसका अर्थ है कि बेहतर सिंचाई व्यवस्था, उन्नत किस्मों, कृषि तकनीक और खेत प्रबंधन ने किसानों को अपेक्षाकृत कम क्षेत्र से अधिक उत्पादन हासिल करने में मदद की। हालांकि, इसका दूसरा पहलू यह है कि अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में यह सफलता पानी की उपलब्धता पर काफी निर्भर रहती है। यदि भूजल स्तर गिरता है या बारिश का पैटर्न अनिश्चित होता है, तो केवल उच्च उपज वाली किस्में और बेहतर तकनीक समस्या का स्थायी समाधान नहीं दे सकतीं।
अध्ययन में शामिल क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां भी इस चुनौती को स्पष्ट करती हैं। सोलापुर जैसे अपेक्षाकृत शुष्क इलाके में सालाना वर्षा लगभग 500 मिलीमीटर के आसपास बताई गई है, जबकि बेल्लारी में यह 780 मिलीमीटर से कम रहती है। इसके विपरीत नासिक और अहमदनगर जैसे जिलों में अलग-अलग क्षेत्रों के अनुसार वर्षा में काफी अंतर है। धारवाड़ अपेक्षाकृत अधिक वर्षा वाला संक्रमण क्षेत्र है। ऐसे में पूरे महाराष्ट्र या कर्नाटक के लिए एक जैसी गन्ना नीति बनाना व्यावहारिक नहीं हो सकता। स्थानीय वर्षा, मिट्टी, भूजल स्थिति और सिंचाई क्षमता को ध्यान में रखकर जिला-स्तरीय कृषि योजना की जरूरत है।
शोधकर्ताओं ने 1999 से 2021 तक खेती के क्षेत्रफल, कुल उत्पादन और प्रति हेक्टेयर उपज जैसे तीन प्रमुख संकेतकों का अध्ययन किया। इसके साथ ही भारत मौसम विज्ञान विभाग के मौसम संबंधी आंकड़ों को कृषि उत्पादन के आंकड़ों से जोड़ा गया, ताकि यह समझा जा सके कि बदलती जलवायु परिस्थितियां गन्ने की खेती को किस तरह प्रभावित कर रही हैं। अध्ययन को तीन अलग-अलग अवधियों में भी विभाजित किया गया, जिससे लंबे समय के दौरान उत्पादन और उत्पादकता में आए बदलावों को समझने में मदद मिली।
गन्ने की खेती के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि गन्ना केवल एक कृषि फसल नहीं है। यह भारत के ग्रामीण अर्थव्यवस्था, चीनी मिलों, किसानों की आय, रोजगार और अब एथेनॉल तथा जैव ऊर्जा क्षेत्र से भी जुड़ा हुआ है। महाराष्ट्र में ही सरकार के 21 जुलाई 2026 के आंकड़ों के अनुसार 2024-25 में लगभग 1,099.70 लाख टन से बढ़कर 2025-26 में गन्ने का उत्पादन 1,316.49 लाख टन होने का अनुमान है। इससे पता चलता है कि राज्य में गन्ने का आर्थिक महत्व लगातार बना हुआ है। लेकिन उत्पादन बढ़ने के साथ पानी की मांग और संसाधनों पर दबाव का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है।
जलवायु परिवर्तन इस पूरी तस्वीर को और जटिल बनाता है। लंबे समय तक सूखा पड़ना, बारिश का असमान वितरण, अचानक भारी बारिश, लंबे शुष्क दौर और अत्यधिक तापमान जैसी परिस्थितियां फसल के विकास को प्रभावित कर सकती हैं। गन्ना एक लंबी अवधि की फसल है, इसलिए किसान को केवल बुवाई के समय की बारिश पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, बल्कि पूरे फसल चक्र में पर्याप्त पानी की जरूरत होती है। यही कारण है कि जब बारिश अनिश्चित होती है तो सिंचाई और भूजल पर निर्भरता बढ़ सकती है। अध्ययन में भी सूखे, नमी के तनाव और गर्मी के संपर्क को कम उपज से जोड़ा गया है।
यहां एक महत्वपूर्ण विरोधाभास सामने आता है। जिन इलाकों में पानी सीमित है, वहां गन्ने की खेती किसानों के लिए अपेक्षाकृत आकर्षक नकदी फसल हो सकती है और चीनी मिलों के कारण बाजार भी उपलब्ध रहता है। लेकिन यही आर्थिक आकर्षण किसानों को पानी की उपलब्धता से अधिक गन्ने की ओर प्रेरित कर सकता है। यदि सिंचाई के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन होता है, तो कुछ वर्षों में खेती की लागत बढ़ सकती है, कुएं और बोरवेल सूख सकते हैं और छोटे किसानों की जोखिम क्षमता कम हो सकती है। इसलिए केवल गन्ने की उपज बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; प्रति यूनिट पानी कितनी उपज मिल रही है, यह भी कृषि नीति का प्रमुख मानक होना चाहिए।
इस संदर्भ में महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में जल-कुशल सिंचाई तकनीकों का महत्व बढ़ जाता है। ड्रिप सिंचाई, खेत में नमी संरक्षण, मल्चिंग, मिट्टी की जांच, वर्षा जल संचयन और जल बजट जैसी तकनीकें गन्ने की खेती को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद कर सकती हैं। 2016 में ही भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान ने पानी की कमी वाले वातावरण के लिए ऐसी गन्ना किस्मों के विकास पर जोर दिया था जो जल तनाव में भी बेहतर प्रदर्शन कर सकें। इससे स्पष्ट है कि भविष्य की गन्ना नीति में उच्च उपज के साथ कम पानी में बेहतर प्रदर्शन करने वाली किस्मों को प्राथमिकता देना जरूरी होगा।
हाल के वर्षों में जल प्रबंधन और मिट्टी के स्वास्थ्य पर भी अधिक ध्यान दिया जा रहा है। कर्नाटक में 2025-26 के दौरान गन्ना उत्पादक क्षेत्रों में मृदा स्वास्थ्य और एकीकृत जल प्रबंधन से जुड़े कार्यक्रमों पर जोर दिया गया है, जिनका उद्देश्य पानी के अधिक कुशल उपयोग, बेहतर मिट्टी प्रबंधन और आधुनिक कृषि तकनीकों के माध्यम से उत्पादकता बढ़ाना है। ऐसे प्रयास यदि स्थानीय जल उपलब्धता और वैज्ञानिक फसल योजना के साथ लागू किए जाएं, तो किसानों की आय और प्राकृतिक संसाधनों के बीच संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है।
इस अध्ययन का सबसे बड़ा महत्व यही है कि यह गन्ने की खेती को केवल उत्पादन या किसान की आय के नजरिए से देखने के बजाय जलवायु और जल सुरक्षा से जोड़ता है। यदि किसी क्षेत्र में गन्ने की पैदावार बढ़ रही है, तो इसे सीधे कृषि की सफलता नहीं माना जा सकता। यह देखना भी जरूरी है कि उस अतिरिक्त उत्पादन के लिए कितने पानी का इस्तेमाल हुआ, भूजल पर कितना दबाव पड़ा और बदलती जलवायु के बीच यह मॉडल भविष्य में कितना टिकाऊ रहेगा।
आगे की नीति के लिए तीन स्तरों पर काम जरूरी दिखाई देता है। पहला, जिले और जलग्रहण क्षेत्र के आधार पर यह तय किया जाए कि कहां गन्ने की खेती टिकाऊ रूप से की जा सकती है और कहां पानी की कमी के कारण फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना चाहिए। दूसरा, प्रति हेक्टेयर उत्पादन के साथ-साथ प्रति घन मीटर पानी पर मिलने वाली उत्पादकता को भी सफलता का पैमाना बनाया जाए। तीसरा, किसानों को ड्रिप सिंचाई, जल संरक्षण, सूखा-सहिष्णु किस्मों और मौसम आधारित कृषि सलाह के लिए तकनीकी तथा वित्तीय सहायता दी जाए।
गन्ने की बढ़ती उत्पादकता किसानों के लिए अच्छी खबर है, लेकिन अर्ध-शुष्क भारत में इसका भविष्य केवल अधिक उत्पादन पर निर्भर नहीं करेगा। असली चुनौती यह होगी कि कम और अनिश्चित पानी में किसान किस तरह स्थिर उत्पादन और आय बनाए रख सकते हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक के अनुभव से यह संकेत मिलता है कि कृषि विकास और जल सुरक्षा को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। यदि गन्ने की खेती को जलवायु-स्मार्ट तकनीक, बेहतर सिंचाई, स्थानीय जल बजट और वैज्ञानिक फसल योजना के साथ जोड़ा जाता है, तो इससे किसानों की आय, चीनी और एथेनॉल उद्योग तथा ग्रामीण रोजगार को लाभ मिल सकता है। लेकिन यदि उत्पादन बढ़ाने की दौड़ में भूजल और स्थानीय जल संसाधनों की सीमाओं को नजरअंदाज किया गया, तो आज की बढ़ती उपज भविष्य में पानी के गंभीर संकट का कारण भी बन सकती है।
कुल मिलाकर, यह खबर भारत की कृषि नीति के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी और अवसर दोनों है। चेतावनी इसलिए कि जलवायु परिवर्तन और जल संकट गन्ने जैसे पानी-निर्भर फसल तंत्र को अधिक असुरक्षित बना सकते हैं। अवसर इसलिए कि बेहतर किस्मों, माइक्रो-इरिगेशन, मिट्टी और नमी प्रबंधन तथा जिला-विशिष्ट फसल योजना के जरिए उत्पादन और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है। आने वाले वर्षों में गन्ने की सफलता का सही पैमाना सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि एक हेक्टेयर से कितनी गन्ने की फसल मिली, बल्कि यह भी होना चाहिए कि उस उत्पादन के लिए कितना पानी खर्च हुआ और क्या किसान तथा क्षेत्र की जल व्यवस्था भविष्य की जलवायु परिस्थितियों का सामना कर सकती है।
