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E20 लक्ष्य हासिल करने के बाद अब क्या? इथेनॉल के लिए स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स मजबूत करने की जरूरत
भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण यानी E20 का लक्ष्य हासिल कर लिया है, लेकिन अब इथेनॉल मिशन के सामने सबसे बड़ी चुनौती उत्पादन बढ़ाने के बजाय मजबूत सप्लाई चेन और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की है। डिस्टिलरी से तेल कंपनियों के डिपो और पेट्रोल पंप तक इथेनॉल पहुंचाने के लिए पर्याप्त स्टोरेज, परिवहन, ब्लेंडिंग सुविधाओं और गुणवत्ता नियंत्रण की जरूरत होगी। साथ ही गन्ने के साथ मक्का जैसे वैकल्पिक फीडस्टॉक को बढ़ावा देने, किसानों के लिए स्थिर बाजार सुनिश्चित करने और जल सुरक्षा व खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की भी आवश्यकता है। मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और स्थिर नीति के साथ इथेनॉल भारत की ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल के आयात में कमी, विदेशी मुद्रा बचत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

भारत का इथेनॉल मिशन तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन देश के सामने अब एक नई और बड़ी चुनौती खड़ी हो रही है। इथेनॉल का उत्पादन बढ़ाने के बाद अब जरूरत उस पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की है, जो इसे डिस्टिलरी से तेल कंपनियों के डिपो और फिर पेट्रोल पंप तक पहुंचाता है। उत्पादन क्षमता में तेज विस्तार के बावजूद अगर स्टोरेज, परिवहन, ब्लेंडिंग और गुणवत्ता नियंत्रण की व्यवस्था पर्याप्त मजबूत नहीं हुई, तो भारत की इथेनॉल ब्लेंडिंग नीति की पूरी क्षमता का लाभ हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण यानी E20 का लक्ष्य 2025-26 में हासिल कर लिया है। केंद्र सरकार के अनुसार, 2013-14 में पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग 1.5 प्रतिशत से भी कम थी, जो अब बढ़कर 20 प्रतिशत तक पहुंच गई है। इसी अवधि में देश की इथेनॉल उत्पादन क्षमता भी लगभग 421 करोड़ लीटर से बढ़कर 2026 में करीब 2,000 करोड़ लीटर हो गई है। सरकार का कहना है कि इस कार्यक्रम से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने और किसानों तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचाने में मदद मिली है।
लेकिन भारत के इथेनॉल कार्यक्रम की अगली चुनौती उत्पादन नहीं, बल्कि सप्लाई चेन है। देश में इथेनॉल का उत्पादन अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में होता है, जबकि इसका इस्तेमाल तेल कंपनियों के डिपो में पेट्रोल के साथ ब्लेंडिंग के बाद किया जाता है। इसका मतलब है कि उत्पादन केंद्र से लेकर अंतिम पेट्रोल पंप तक इथेनॉल को सुरक्षित और कम लागत में पहुंचाने के लिए पर्याप्त स्टोरेज टैंक, परिवहन व्यवस्था, डिपो और ब्लेंडिंग सुविधाओं की जरूरत होगी।
यही वह कड़ी है जिसे अब मजबूत करना जरूरी है।
इथेनॉल ब्लेंडिंग केवल डिस्टिलरी लगाने से सफल नहीं होगी
इथेनॉल उत्पादन की पूरी प्रक्रिया को समझना जरूरी है। गन्ने, शीरे, मक्का और कुछ अन्य कृषि उत्पादों से इथेनॉल तैयार किया जाता है। इसके बाद इसे डिस्टिलरी से तेल कंपनियों तक पहुंचाया जाता है। वहां इसे निर्धारित अनुपात में पेट्रोल के साथ मिलाया जाता है और फिर तैयार ईंधन को देशभर के पेट्रोल पंपों तक पहुंचाया जाता है।
इस पूरी श्रृंखला में किसी एक स्तर पर भी कमी होने पर पूरी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। यदि डिस्टिलरी में उत्पादन क्षमता मौजूद है, लेकिन पर्याप्त स्टोरेज टैंक नहीं हैं, तो इथेनॉल को सुरक्षित रखना मुश्किल हो सकता है। यदि परिवहन व्यवस्था कमजोर है, तो उत्पादन केंद्रों से दूर स्थित राज्यों तक आपूर्ति महंगी हो सकती है। इसी तरह यदि तेल कंपनियों के डिपो में पर्याप्त ब्लेंडिंग क्षमता नहीं है, तो उत्पादित इथेनॉल का इस्तेमाल समय पर नहीं हो पाएगा।
इसलिए भारत को अब इथेनॉल उत्पादन के साथ-साथ उसके लिए एक मजबूत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तैयार करने की जरूरत है।
ब्राजील का अनुभव भारत के लिए बड़ा सबक
इथेनॉल के क्षेत्र में ब्राजील का अनुभव भारत के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। वहां इथेनॉल उद्योग कई दशकों में विकसित हुआ है और उत्पादन के साथ-साथ भंडारण, परिवहन, वितरण और गुणवत्ता नियंत्रण की व्यवस्थाएं भी विकसित की गई हैं।
ब्राजील का अनुभव बताता है कि इथेनॉल अर्थव्यवस्था केवल उत्पादन या ब्लेंडिंग प्रतिशत बढ़ाने का नाम नहीं है। इसके लिए किसानों, डिस्टिलरी, चीनी मिलों, अनाज उत्पादकों, तेल कंपनियों, परिवहन क्षेत्र और पेट्रोल पंप नेटवर्क के बीच मजबूत तालमेल जरूरी है। भारत के लिए इसका सबसे बड़ा सबक यह है कि जैसे-जैसे ब्लेंडिंग का लक्ष्य बढ़ता है, वैसे-वैसे उसके अनुरूप इंफ्रास्ट्रक्चर भी तैयार होना चाहिए। यदि उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन के बीच संतुलन नहीं रहा, तो भविष्य में इथेनॉल की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
E20 के बाद बढ़ी इंफ्रास्ट्रक्चर की चुनौती
सरकार के आंकड़ों के अनुसार, भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग 2013-14 के 1.5 प्रतिशत से भी कम स्तर से बढ़कर 2025-26 में 20 प्रतिशत हो गई है। इस दौरान इथेनॉल की खरीद और उत्पादन क्षमता में भी कई गुना वृद्धि हुई है। इससे साफ है कि देश ने अपेक्षाकृत कम समय में इथेनॉल क्षेत्र का बड़े स्तर पर विस्तार किया है।
अब इसी तेजी के अनुरूप इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना जरूरी है।
मान लीजिए किसी राज्य की डिस्टिलरी में बड़ी मात्रा में इथेनॉल तैयार है, लेकिन उसे उठाने के लिए पर्याप्त टैंकर उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में उत्पादन क्षमता होने के बावजूद सप्लाई बाधित हो सकती है। इसी तरह यदि किसी क्षेत्र में पेट्रोल की मांग और ब्लेंडिंग की जरूरत अधिक है, लेकिन वहां पर्याप्त स्टोरेज या ब्लेंडिंग टर्मिनल नहीं हैं, तो परिवहन लागत बढ़ सकती है। इसलिए भविष्य की इथेनॉल नीति में डिस्टिलरी की संख्या और उत्पादन क्षमता के साथ-साथ स्टोरेज क्षमता, परिवहन लागत और क्षेत्रीय मांग को भी ध्यान में रखना होगा।
गन्ने के साथ मक्का भी बन रहा है अहम कच्चा माल
भारत के इथेनॉल कार्यक्रम में कच्चे माल का विविधीकरण भी महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक देश का इथेनॉल उद्योग मुख्य रूप से गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों पर निर्भर रहा, लेकिन अब मक्का और अन्य अनाज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। मक्का आधारित इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से गन्ने पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। इससे उन क्षेत्रों में भी इथेनॉल उत्पादन का आधार मजबूत हो सकता है जहां गन्ने की उपलब्धता सीमित है।
हालांकि, मक्का की सप्लाई चेन अलग तरह की चुनौती पेश करती है। मक्का की मांग केवल इथेनॉल उद्योग से नहीं आती, बल्कि स्टार्च और पशु चारा उद्योग भी इसका इस्तेमाल करते हैं। इसलिए मांग बढ़ने पर कीमतों में उतार-चढ़ाव हो सकता है। इसके अलावा, मक्का को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए आधुनिक भंडारण व्यवस्था की जरूरत होती है। नमी और खराब स्टोरेज के कारण अनाज की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। इसलिए अनाज आधारित इथेनॉल के विस्तार के साथ साइलो, वेयरहाउस, ड्राइंग सुविधाओं और फसल कटाई के बाद प्रबंधन में निवेश करना भी जरूरी होगा।
इथेनॉल नीति का असर किसानों तक कैसे पहुंचेगा
इथेनॉल कार्यक्रम का एक बड़ा उद्देश्य किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराना भी है। गन्ना, मक्का और अन्य फीडस्टॉक की मांग बढ़ने से किसानों के लिए आय के नए अवसर बन सकते हैं। चीनी मिलों और डिस्टिलरी को भी अतिरिक्त राजस्व स्रोत मिल सकता है। सरकार के अनुसार, इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम ने किसानों को भुगतान में मदद करने, चीनी उद्योग की आर्थिक स्थिति मजबूत करने और मक्का जैसे फीडस्टॉक की मांग बढ़ाने में योगदान दिया है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी फायदा पहुंच सकता है।
लेकिन इसका लाभ तभी स्थायी होगा जब किसानों के लिए खरीद व्यवस्था और कीमतों को लेकर पर्याप्त स्थिरता हो। यदि इथेनॉल नीति में बार-बार बदलाव होते हैं या कच्चे माल की मांग में अचानक उतार-चढ़ाव आता है, तो किसान और डिस्टिलरी दोनों के लिए जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए दीर्घकालिक नीति, पारदर्शी मूल्य व्यवस्था और फीडस्टॉक की स्थिर आपूर्ति इथेनॉल उद्योग के लिए बेहद जरूरी होगी।
इथेनॉल से भारत को क्या आर्थिक लाभ मिल सकता है
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में पेट्रोल में घरेलू स्तर पर तैयार इथेनॉल का मिश्रण करने से पेट्रोल की कुछ मात्रा को आयातित जीवाश्म ईंधन से बदलने में मदद मिल सकती है।
इससे भारत के तेल आयात बिल को कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने की संभावना बनती है। साथ ही घरेलू इथेनॉल उद्योग को बढ़ावा मिलने से डिस्टिलरी, चीनी मिलों, किसानों, परिवहन क्षेत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आर्थिक गतिविधियों का लाभ मिल सकता है।
सरकार ने इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण बताया है और इसके माध्यम से आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने की दिशा में प्रगति का दावा किया है। हालांकि, इन आर्थिक लाभों को अधिकतम करने के लिए इथेनॉल की पूरी सप्लाई चेन को लागत प्रभावी बनाना होगा। अगर इथेनॉल को उत्पादन केंद्र से खपत वाले क्षेत्र तक पहुंचाने में बहुत अधिक खर्च होता है, तो लॉजिस्टिक्स की लागत पूरे कार्यक्रम की आर्थिक दक्षता को प्रभावित कर सकती है।
पर्यावरणीय लाभ के साथ पानी और खाद्य सुरक्षा की चुनौती
इथेनॉल को पेट्रोल की तुलना में कम कार्बन उत्सर्जन वाला ईंधन माना जाता है, लेकिन इसका पर्यावरणीय प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि इसे किस कच्चे माल से और किस प्रक्रिया के जरिए तैयार किया गया है।
सरकार द्वारा उद्धृत जीवन-चक्र उत्सर्जन आकलन के अनुसार, गन्ने और मक्का से उत्पादित इथेनॉल का ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पेट्रोल की तुलना में कम हो सकता है। लेकिन गन्ने की खेती पानी की अधिक मांग वाली फसल है। ऐसे में महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे अर्ध-शुष्क इलाकों में गन्ने आधारित इथेनॉल विस्तार को जल सुरक्षा के नजरिए से भी देखना होगा। यही वजह है कि भारत की इथेनॉल नीति को केवल ऊर्जा सुरक्षा और कार्बन उत्सर्जन तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसमें जल उपलब्धता, खाद्य सुरक्षा, भूमि उपयोग और किसानों की आय के बीच संतुलन भी जरूरी है।
E20 के बाद क्या?
भारत ने E20 का लक्ष्य हासिल कर लिया है, लेकिन सरकार ने फिलहाल 20 प्रतिशत से आगे ब्लेंडिंग बढ़ाने का कोई निर्णय नहीं लिया है। सरकार के अनुसार, भविष्य में इस दिशा में कोई फैसला वैज्ञानिक और तकनीकी अध्ययन तथा संबंधित हितधारकों से परामर्श के बाद लिया जाएगा। इसका मतलब है कि आने वाला समय केवल ब्लेंडिंग प्रतिशत बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाय मौजूदा E20 व्यवस्था को मजबूत करने का भी हो सकता है।
भारत को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि देश के पास पर्याप्त इथेनॉल स्टोरेज क्षमता हो, उत्पादन केंद्रों और तेल कंपनियों के डिपो के बीच सुरक्षित परिवहन नेटवर्क हो, डिपो स्तर पर ब्लेंडिंग की पर्याप्त सुविधा हो और पेट्रोल पंपों तक लगातार आपूर्ति बनी रहे। इसके अलावा, इथेनॉल की गुणवत्ता जांच के लिए आधुनिक प्रयोगशालाओं और डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम की आवश्यकता होगी। उत्पादन से लेकर अंतिम वितरण तक प्रत्येक चरण पर गुणवत्ता की निगरानी जरूरी होगी ताकि उपभोक्ताओं को निर्धारित मानकों वाला ईंधन मिल सके।
भारत के लिए आगे की राह
भारत के इथेनॉल मिशन की सफलता अब तीन प्रमुख बातों पर निर्भर करेगी—उत्पादन, इंफ्रास्ट्रक्चर और नीति स्थिरता।
पहला, देश को पर्याप्त और विविध फीडस्टॉक उपलब्ध कराना होगा। दूसरा, उत्पादन केंद्रों को खपत वाले क्षेत्रों से जोड़ने के लिए स्टोरेज और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित करना होगा। तीसरा, किसानों, डिस्टिलरी और तेल कंपनियों के लिए ऐसी दीर्घकालिक नीति तैयार करनी होगी जिससे निवेश और उत्पादन को स्थिरता मिले।
इसके साथ ही पानी की कमी वाले क्षेत्रों में गन्ने के विस्तार को स्थानीय जल उपलब्धता के अनुरूप नियंत्रित करना होगा। जहां गन्ने की खेती जल संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डालती है, वहां मक्का या अन्य कम पानी वाली फसलों के विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है। कुल मिलाकर, भारत ने इथेनॉल ब्लेंडिंग के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, लेकिन E20 तक पहुंचना इस यात्रा का अंत नहीं है। अब देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसा मजबूत इथेनॉल इकोसिस्टम तैयार करने की है, जिसमें डिस्टिलरी से लेकर स्टोरेज, परिवहन, ब्लेंडिंग, गुणवत्ता जांच और पेट्रोल पंप तक हर कड़ी एक-दूसरे से प्रभावी ढंग से जुड़ी हो।
इथेनॉल भारत को कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने, किसानों के लिए बाजार बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद कर सकता है। लेकिन इन लाभों को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, कुशल लॉजिस्टिक्स, स्थिर नीति, बेहतर गुणवत्ता नियंत्रण और जल तथा खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना उतना ही जरूरी होगा। भारत के इथेनॉल मिशन का अगला चरण इसलिए केवल यह सवाल नहीं होना चाहिए कि देश कितना इथेनॉल बना सकता है, बल्कि यह होना चाहिए कि वह उसे कितनी कुशलता, कम लागत और टिकाऊ तरीके से उपभोक्ताओं तक पहुंचा सकता है। यही वह कड़ी है जो भारत के इथेनॉल लक्ष्य को एक वास्तविक और दीर्घकालिक ऊर्जा परिवर्तन में बदल सकती है।
