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मौसम की मार से कृषि क्षेत्र बेहाल, किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा पर बढ़ा खतरा

भारत में बाढ़, अत्यधिक बारिश, सूखा, चक्रवात और गर्मी जैसी हाइड्रो-मौसम विज्ञान संबंधी आपदाओं का कृषि क्षेत्र पर असर लगातार बढ़ रहा है। संसद में सामने आए सरकारी आंकड़े बताते हैं कि अलग-अलग वर्षों में लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि ऐसी आपदाओं से प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर किसानों की आय, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है। बदलते जलवायु पैटर्न के बीच भारत को अब केवल आपदा के बाद मुआवजा देने के बजाय पहले से तैयारी पर जोर देना होगा। बेहतर मौसम पूर्वानुमान, शुरुआती चेतावनी, जलवायु-सहिष्णु फसलें, फसल विविधीकरण, जल संरक्षण, मजबूत फसल बीमा और तकनीक आधारित नुकसान आकलन किसानों को भविष्य के मौसमीय जोखिमों से बचाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

Anshuman Mishra24 जुल. 2026, 09:06 PM IST
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मौसम की मार से कृषि क्षेत्र बेहाल, किसानों की आय और खाद्य सुरक्षा पर बढ़ा खतरा

भारत: भारत में मौसम से जुड़ी आपदाओं का असर अब खेती तक सीमित नहीं रह गया है। बाढ़, अत्यधिक बारिश, सूखा, चक्रवात, गर्मी और अन्य हाइड्रो-मौसम विज्ञान संबंधी घटनाएं किसानों की आय, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और देश की खाद्य सुरक्षा के लिए लगातार बड़ा खतरा बन रही हैं। संसद में सरकार की ओर से साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, देश के कृषि क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा ऐसी आपदाओं से प्रभावित हुआ है। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि बदलते मौसम और जलवायु जोखिमों के बीच भारत की कृषि व्यवस्था को अब पहले से कहीं अधिक लचीला और तैयार बनाने की जरूरत है।


24 जुलाई 2026 को संसद में सामने आए आंकड़ों के आधार पर इस चुनौती को रेखांकित किया है। रिपोर्ट का मुख्य संदेश यह है कि हाइड्रो-मौसम विज्ञान संबंधी आपदाओं से प्रभावित कृषि क्षेत्र का दायरा बहुत बड़ा है और इसका सीधा असर किसानों की आजीविका पर पड़ता है। हालांकि, अलग-अलग सरकारी जवाबों में अलग-अलग वर्षों और अवधियों के आंकड़े दिए गए हैं, इसलिए इन आंकड़ों को एक ही समयावधि का मानना सही नहीं होगा। उपलब्ध सरकारी जानकारी के अनुसार, 2024-25 में 14.24 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित होने की जानकारी संसद में दी गई थी, जबकि 2025-26 में महाराष्ट्र में ही 75.42 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र के प्रभावित होने की सूचना सामने आई। ये आंकड़े अलग-अलग अवधि से जुड़े हैं, लेकिन दोनों मिलकर मौसमीय आपदाओं की गंभीरता को जरूर दिखाते हैं।


हाइड्रो-मौसम विज्ञान आपदाएं क्या हैं

हाइड्रो-मौसम विज्ञान संबंधी आपदाओं में ऐसी प्राकृतिक घटनाएं शामिल होती हैं जिनका संबंध मौसम और जल चक्र से होता है। इनमें बाढ़, अत्यधिक बारिश, सूखा, चक्रवात, हीटवेव और कुछ परिस्थितियों में भूस्खलन जैसी घटनाएं शामिल हैं।

कृषि पर इनका असर कई स्तरों पर पड़ता है। अत्यधिक बारिश और बाढ़ से खेतों में खड़ी फसल नष्ट हो सकती है, जलभराव से पौधों की जड़ें खराब हो सकती हैं और मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत बह सकती है। दूसरी ओर, लंबे समय तक बारिश न होने से मिट्टी की नमी कम होती है और सिंचाई पर निर्भरता बढ़ जाती है। अत्यधिक गर्मी फसल की वृद्धि और उत्पादन को प्रभावित कर सकती है, जबकि कटाई के समय हुई बेमौसम बारिश तैयार उपज को नुकसान पहुंचा सकती है। इस तरह एक किसान को एक ही साल में अलग-अलग प्रकार के मौसमीय जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है। यही कारण है कि कृषि क्षेत्र के लिए मौसम की अनिश्चितता अब एक गंभीर आर्थिक चुनौती बनती जा रही है।


किसानों की आय पर सीधा असर

जब किसी प्राकृतिक आपदा से फसल खराब होती है, तो किसान को केवल उपज का नुकसान नहीं होता। बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई और कृषि मशीनरी पर किया गया खर्च भी प्रभावित होता है। इसके बाद अगली फसल के लिए दोबारा निवेश करना पड़ता है।

छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह स्थिति और कठिन होती है। उनके पास आमतौर पर आर्थिक नुकसान को लंबे समय तक सहने की क्षमता कम होती है। लगातार फसल नुकसान होने पर उन्हें कर्ज लेना पड़ सकता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है। यही वजह है कि मौसम संबंधी आपदाओं से निपटने की रणनीति केवल मुआवजा देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। किसानों को आपदा से पहले चेतावनी, जोखिम के अनुसार फसल चयन, फसल बीमा और आपदा के बाद तत्काल सहायता उपलब्ध कराना भी जरूरी है।


महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर नुकसान का उदाहरण

महाराष्ट्र में 2025-26 के दौरान मौसम और जल संबंधी आपदाओं से कृषि क्षेत्र को हुए नुकसान ने चुनौती की गंभीरता को सामने रखा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, राज्य में 75.42 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र प्रभावित हुआ। छत्रपति संभाजीनगर जिले में भारी बारिश और बाढ़ के कारण 6.08 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र और करीब 6.89 लाख किसान प्रभावित हुए। सरकारी आकलन के मुताबिक, जिले में फसल नुकसान का अनुमानित आर्थिक मूल्य 1,695.01 करोड़ रुपये था।

यह उदाहरण दिखाता है कि जब बड़े क्षेत्र में फसल प्रभावित होती है, तो इसका असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता। ग्रामीण मजदूरी, कृषि बाजार, स्थानीय व्यापार, पशुपालन और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है।


बदलती जलवायु ने बढ़ाई चुनौती

मौसम संबंधी आपदाओं को जलवायु परिवर्तन के व्यापक संदर्भ में भी देखना जरूरी है। भारत के कई हिस्सों में बारिश का वितरण अधिक अनियमित हो रहा है। कहीं कम समय में बहुत अधिक बारिश हो रही है, तो कहीं लंबे समय तक सूखे की स्थिति बन रही है। इसके साथ ही तापमान में वृद्धि और लंबे समय तक चलने वाली गर्मी की घटनाएं भी कृषि पर दबाव डाल रही हैं।


सरकार के ICAR-NICRA कार्यक्रम के तहत 651 कृषि-प्रधान जिलों में जलवायु जोखिम और संवेदनशीलता का आकलन किया गया। इस आकलन में 310 जिलों को जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील पाया गया। इनमें 109 जिले ‘बहुत अधिक’ और 201 जिले ‘अधिक’ संवेदनशील श्रेणी में रखे गए। यह आंकड़ा बताता है कि भारत के लिए जलवायु जोखिम अब भविष्य की चुनौती नहीं, बल्कि वर्तमान कृषि नीति का हिस्सा बन चुका है।


जिला स्तर पर कृषि योजना क्यों जरूरी

भारत में हर क्षेत्र की कृषि परिस्थितियां अलग हैं। किसी जिले में सबसे बड़ा खतरा बाढ़ हो सकता है, जबकि दूसरे जिले में सूखा या गर्मी प्रमुख समस्या हो सकती है। इसलिए पूरे देश के लिए एक जैसी कृषि रणनीति प्रभावी नहीं हो सकती।

इसी कारण जिला कृषि आकस्मिक योजनाओं का महत्व बढ़ जाता है। ऐसी योजनाओं में स्थानीय मौसम, पानी की उपलब्धता, मिट्टी, प्रमुख फसलों और संभावित आपदाओं को ध्यान में रखते हुए वैकल्पिक कृषि रणनीति तैयार की जाती है। यदि किसी क्षेत्र में कम बारिश की संभावना हो, तो कम अवधि वाली या सूखा सहन करने वाली फसलों को बढ़ावा दिया जा सकता है। वहीं बाढ़ प्रभावित इलाकों में जल निकासी, जलभराव सहन करने वाली किस्मों और समय पर फसल कटाई की रणनीति अपनाई जा सकती है।


मौसम पूर्वानुमान किसानों के लिए बन सकता है सुरक्षा कवच

मौसम की सटीक और समय पर जानकारी किसानों को नुकसान कम करने में मदद कर सकती है। यदि किसान को पहले से पता हो कि अगले कुछ दिनों में भारी बारिश होने वाली है, तो वह तैयार फसल की कटाई जल्दी कर सकता है या खेत में जल निकासी की व्यवस्था कर सकता है। इसी तरह सूखे की संभावना होने पर सिंचाई की योजना बदली जा सकती है और कम पानी वाली फसलें चुनी जा सकती हैं। अत्यधिक गर्मी की चेतावनी मिलने पर फसल और पशुधन के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय किए जा सकते हैं।

इसलिए मौसम विभाग और कृषि विभाग के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। मौसम की जानकारी तभी उपयोगी होगी जब वह किसानों तक सरल भाषा में, समय पर और स्थानीय स्तर पर पहुंच सके।


फसल बीमा और डिजिटल तकनीक की बढ़ती भूमिका

आपदा के बाद किसानों को समय पर मुआवजा मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। फसल नुकसान का आकलन अगर देर से होता है, तो किसानों को राहत मिलने में भी देरी हो सकती है।


सरकार नुकसान आकलन और फसल बीमा दावों की प्रक्रिया में तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रही है। WINDS, YES-Tech और Digiclaim जैसी डिजिटल प्रणालियों का उद्देश्य मौसम और फसल नुकसान के आकलन को अधिक पारदर्शी और वैज्ञानिक बनाना है। हालांकि, इन तकनीकों का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब जमीनी स्तर पर डेटा सटीक हो, किसानों के दावों की प्रक्रिया सरल हो और स्वीकृत मुआवजा समय पर उनके खातों तक पहुंचे।


खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है असर

कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नुकसान का असर देश की खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। यदि किसी प्रमुख कृषि क्षेत्र में बार-बार बाढ़ या सूखा आता है, तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे स्थानीय बाजारों में कीमतों पर दबाव बन सकता है और कुछ कृषि उत्पादों की उपलब्धता कम हो सकती है।


हालांकि, किसी एक आपदा से पूरे देश की खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो, यह जरूरी नहीं है। भारत का बड़ा और विविध कृषि क्षेत्र कई तरह के झटकों को absorb कर सकता है। लेकिन यदि मौसमीय घटनाएं लगातार और व्यापक होती हैं, तो उत्पादन और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए खाद्य सुरक्षा को मजबूत रखने के लिए फसल विविधीकरण, रणनीतिक भंडारण और बेहतर कृषि आपूर्ति श्रृंखला के साथ-साथ जलवायु-सहिष्णु कृषि को बढ़ावा देना जरूरी है।


भारत को कृषि क्षेत्र में मौसमीय आपदाओं से निपटने के लिए राहत आधारित मॉडल से आगे बढ़कर जोखिम प्रबंधन पर ध्यान देना होगा।

  • पहला कदम होना चाहिए कि मौसम पूर्वानुमान और शुरुआती चेतावनी प्रणाली को गांव और किसान स्तर तक मजबूत किया जाए।
  • दूसरा, जलवायु-सहिष्णु बीज और फसल किस्मों को बढ़ावा दिया जाए। सूखा, गर्मी और जलभराव जैसी परिस्थितियों को सहन करने वाली किस्में किसानों के जोखिम को कम कर सकती हैं।
  • तीसरा, फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिया जाए। किसी एक फसल पर अत्यधिक निर्भरता मौसमीय झटकों के दौरान किसानों के नुकसान को बढ़ा सकती है।
  • चौथा, जल प्रबंधन को कृषि नीति का केंद्रीय हिस्सा बनाया जाए। वर्षा जल संचयन, माइक्रो-इरिगेशन, बेहतर जल निकासी और मिट्टी में नमी संरक्षण जैसे उपाय महत्वपूर्ण होंगे।
  • पांचवां, फसल बीमा और मुआवजे की व्यवस्था को तेज और पारदर्शी बनाया जाए। आपदा के बाद किसान को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं, बल्कि अगली फसल के लिए बीज, खाद और तकनीकी सलाह भी मिलनी चाहिए।
  • छठा, जिला स्तर पर तैयार कृषि आकस्मिक योजनाओं को केवल दस्तावेज तक सीमित न रखकर वास्तविक समय में लागू करने की व्यवस्था विकसित करनी होगी।


संसद में सामने आए ये आंकड़े इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे भारत की कृषि व्यवस्था पर बढ़ते मौसमीय दबाव को सामने लाते हैं। इसका महत्व केवल इस बात में नहीं है कि कितने हेक्टेयर क्षेत्र में फसल खराब हुई, बल्कि यह समझने में भी है कि कृषि नीति को भविष्य के मौसमीय जोखिमों के लिए कैसे तैयार किया जाए।

यदि सरकार आपदा से पहले तैयारी पर निवेश करती है, तो किसानों का नुकसान कम किया जा सकता है। बेहतर मौसम चेतावनी से फसल बचाने में मदद मिलेगी, जलवायु-सहिष्णु किस्मों से उत्पादन जोखिम घटेगा, फसल विविधीकरण से आय के स्रोत बढ़ेंगे और डिजिटल नुकसान आकलन से मुआवजा प्रक्रिया तेज हो सकती है।

इसका व्यापक लाभ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा को भी मिल सकता है। किसान अगर बार-बार होने वाले मौसमीय नुकसान से बच पाते हैं, तो उनकी आय अधिक स्थिर रह सकती है और ग्रामीण बाजारों में आर्थिक गतिविधियां मजबूत हो सकती हैं।


भारत के कृषि क्षेत्र के सामने मौसम संबंधी आपदाओं का खतरा तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। संसद में सामने आए आंकड़े इस चुनौती के बड़े पैमाने को रेखांकित करते हैं। हालांकि, अलग-अलग सरकारी आंकड़े अलग-अलग वर्षों और समयावधियों से जुड़े हैं, इसलिए उन्हें एक ही अवधि का आंकड़ा मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। फिर भी व्यापक तस्वीर स्पष्ट है कि बाढ़, अत्यधिक बारिश, सूखा और गर्मी जैसी घटनाएं किसानों और कृषि अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम बन रही हैं।


अब भारत के लिए कृषि नीति का लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं होना चाहिए। किसानों को बदलते मौसम के लिए तैयार करना, फसल नुकसान को कम करना और आपदा के बाद तेजी से आर्थिक मदद पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है।

मौसम पूर्वानुमान, शुरुआती चेतावनी, जलवायु-सहिष्णु बीज, फसल विविधीकरण, बेहतर सिंचाई और जल प्रबंधन, मजबूत फसल बीमा और तकनीक आधारित नुकसान आकलन को एक साथ लागू किया जाए तो भारत की कृषि व्यवस्था को अधिक लचीला बनाया जा सकता है।


आने वाले वर्षों में भारत की कृषि सफलता का पैमाना सिर्फ यह नहीं होगा कि देश ने कितना उत्पादन किया, बल्कि यह भी होगा कि किसान बाढ़, सूखे, अत्यधिक गर्मी और अनियमित बारिश जैसे झटकों के बावजूद अपनी आय और उत्पादन को कितनी मजबूती से बनाए रख पाते हैं। यही बदलाव भारत की कृषि को जलवायु परिवर्तन के दौर में अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और मजबूत बनाने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा।