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बच्चों से ज्यादा फोन को दे रहे हैं समय? जानिए इसका मानसिक सेहत पर क्या असर पड़ता है

स्मार्टफोन और डिजिटल डिवाइस आज हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। काम से लेकर मनोरंजन और सोशल मीडिया तक, हर जरूरत के लिए लोग घंटों स्क्रीन के सामने बिताते हैं। लेकिन अब विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर माता-पिता बच्चों के साथ समय बिताने के बजाय लगातार मोबाइल या अन्य स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं, तो इसका असर केवल उनके अपने स्वास्थ्य पर ही नहीं बल्कि बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास पर भी पड़ सकता है।

Vindhya Dubey24 जुल. 2026, 09:07 PM IST
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बच्चों से ज्यादा फोन को दे रहे हैं समय? जानिए इसका मानसिक सेहत पर क्या असर पड़ता है

हाल ही में प्रकाशित एक व्यापक शोध समीक्षा में सामने आया है कि माता-पिता का अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में असुरक्षा की भावना, भावनात्मक दूरी, व्यवहार संबंधी समस्याएं और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ा सकता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह समस्या केवल बच्चों के ज्यादा स्क्रीन देखने तक सीमित नहीं है, बल्कि तब भी सामने आती है जब माता-पिता बच्चे के साथ मौजूद होने के बावजूद मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। इस व्यवहार को विशेषज्ञ "टेक्नोफेरेंस" (Technoference) कहते हैं, यानी डिजिटल डिवाइस का पारिवारिक बातचीत और रिश्तों के बीच हस्तक्षेप करना।

क्या कहती है रिसर्च?

शोधकर्ताओं ने दुनिया के विभिन्न देशों में किए गए कई अध्ययनों का विश्लेषण किया। समीक्षा में पाया गया कि जिन परिवारों में माता-पिता बार-बार मोबाइल देखते हैं, सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताते हैं या बच्चे के साथ बातचीत के दौरान भी स्क्रीन का इस्तेमाल करते हैं, वहां बच्चों में भावनात्मक जुड़ाव कम होने की संभावना बढ़ जाती है। रिसर्च के अनुसार, ऐसे बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, बेचैनी, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, सामाजिक व्यवहार में बदलाव और भावनात्मक असुरक्षा जैसे लक्षण अधिक देखने को मिले। कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया कि छोटे बच्चों में भाषा विकास और सीखने की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है, क्योंकि उन्हें माता-पिता से पर्याप्त बातचीत और प्रतिक्रिया नहीं मिल पाती।

स्क्रीन टाइम कैसे बढ़ाता है असुरक्षा?

बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, शुरुआती वर्षों में बच्चे अपने माता-पिता के हावभाव, आवाज, स्पर्श और प्रतिक्रिया के आधार पर सुरक्षा और विश्वास का भाव विकसित करते हैं। जब बच्चा बार-बार माता-पिता का ध्यान चाहता है, लेकिन उन्हें मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त पाता है, तो उसे यह महसूस हो सकता है कि उसकी जरूरतें प्राथमिकता नहीं हैं। यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहने पर बच्चे में असुरक्षा, निराशा और भावनात्मक दूरी की भावना विकसित हो सकती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि बच्चों के लिए केवल माता-पिता की शारीरिक मौजूदगी पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उनका भावनात्मक रूप से उपलब्ध होना भी उतना ही जरूरी है।

केवल बच्चे का नहीं, माता-पिता का स्क्रीन टाइम भी है महत्वपूर्ण

अब तक ज्यादातर चर्चा बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करने पर होती रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता को भी अपने डिजिटल व्यवहार का आकलन करना चाहिए। अगर माता-पिता हर कुछ मिनट में फोन चेक करते हैं, खाने की मेज पर मोबाइल इस्तेमाल करते हैं या बच्चों से बातचीत के दौरान लगातार नोटिफिकेशन देखते रहते हैं, तो बच्चे भी यही व्यवहार सीख सकते हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चे केवल निर्देशों से नहीं, बल्कि माता-पिता के व्यवहार को देखकर सीखते हैं। इसलिए अगर माता-पिता स्वयं डिजिटल अनुशासन अपनाते हैं, तो बच्चे भी स्क्रीन के साथ संतुलित रिश्ता विकसित कर सकते हैं।

बच्चों में दिख सकते हैं ये बदलाव

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर परिवार में स्क्रीन का उपयोग जरूरत से ज्यादा हो रहा है, तो बच्चों में कुछ संकेत दिखाई दे सकते हैं। इनमें बार-बार ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करना, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेलापन महसूस करना, बातचीत में रुचि कम होना, व्यवहार में बदलाव और भावनात्मक रूप से असुरक्षित महसूस करना शामिल हो सकते हैं। हालांकि ये लक्षण केवल स्क्रीन टाइम के कारण ही हों, ऐसा जरूरी नहीं है। इनके पीछे अन्य पारिवारिक, सामाजिक या स्वास्थ्य संबंधी कारण भी हो सकते हैं।

क्या करें माता-पिता?

विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि परिवार में "स्क्रीन-फ्री टाइम" तय करना एक अच्छा कदम हो सकता है। जैसे भोजन के समय, सोने से पहले या बच्चों के साथ खेलने और बातचीत के दौरान मोबाइल फोन को दूर रखना चाहिए। इसके अलावा माता-पिता को बच्चों के साथ रोज कुछ समय बिना किसी डिजिटल डिवाइस के बिताना चाहिए। कहानी पढ़ना, साथ में खेलना, टहलना या खुलकर बातचीत करना बच्चों के भावनात्मक विकास को मजबूत बनाने में मदद कर सकता है। यदि काम की वजह से फोन का इस्तेमाल जरूरी हो, तो बच्चों को यह समझाना भी महत्वपूर्ण है कि स्क्रीन का उपयोग क्यों किया जा रहा है। इससे वे खुद को नजरअंदाज किया हुआ महसूस नहीं करते।

विशेषज्ञों की राय

बाल विकास और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल डिवाइस आधुनिक जीवन का हिस्सा हैं और इन्हें पूरी तरह छोड़ना व्यावहारिक नहीं है। लेकिन इनका संतुलित उपयोग बेहद जरूरी है। बच्चों के स्वस्थ मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए माता-पिता का समय, ध्यान और संवाद किसी भी स्क्रीन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि माता-पिता अपने स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करते हैं और बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने की आदत विकसित करते हैं, तो इससे न केवल बच्चों की भावनात्मक सुरक्षा मजबूत होती है, बल्कि पूरे परिवार के रिश्ते भी बेहतर बनते हैं।