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भारतीय शेयर बाजार में लगातार पांचवें दिन गिरावट, सेंसेक्स 332 अंक टूटा; महंगा कच्चा तेल और FII बिकवाली से बढ़ी चिंता
भारतीय शेयर बाजार में 24 जुलाई 2026 को लगातार पांचवें कारोबारी सत्र गिरावट दर्ज की गई। सेंसेक्स 332 अंक टूटकर 76,059.77 पर और निफ्टी 102 अंक गिरकर 23,767.45 पर बंद हुआ। महंगे कच्चे तेल, विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितता ने बाजार पर दबाव बनाया। आने वाले दिनों में कच्चे तेल की कीमतें, FII निवेश, रुपये की चाल और कंपनियों के तिमाही नतीजे बाजार की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

मुंबई: भारतीय शेयर बाजार में 24 जुलाई 2026 को लगातार पांचवें कारोबारी सत्र गिरावट दर्ज की गई। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी में तेज बिकवाली देखने को मिली और सेंसेक्स एक समय 800 अंकों से ज्यादा फिसल गया, जबकि निफ्टी 23,650 के आसपास पहुंच गया। हालांकि, कारोबार के दूसरे हिस्से में बाजार ने शुरुआती नुकसान का बड़ा हिस्सा संभाल लिया, लेकिन दोनों प्रमुख सूचकांक फिर भी गिरावट के साथ बंद हुए।
कारोबार के अंत में सेंसेक्स 332.25 अंक यानी करीब 0.43 प्रतिशत की गिरावट के साथ 76,059.77 पर बंद हुआ। वहीं, निफ्टी 50 में 102.15 अंकों यानी करीब 0.43 प्रतिशत की गिरावट रही और यह 23,767.45 के स्तर पर बंद हुआ। इस तरह बाजार ने लगातार पांचवें सत्र में नुकसान दर्ज किया। पूरे सप्ताह की बात करें तो सेंसेक्स करीब 2,091 अंक और निफ्टी लगभग 567 अंक नीचे रहा, जिससे यह हाल के महीनों के सबसे कमजोर कारोबारी सप्ताहों में शामिल हो गया।
बाजार में गिरावट के पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण रहे। सबसे प्रमुख चिंता कच्चे तेल की कीमतों में तेजी रही। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर के ऊपर पहुंच गया, जिससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए महंगाई, आयात बिल और व्यापार घाटे को लेकर चिंताएं बढ़ गईं। लंबे समय तक ऊंची तेल कीमतें कंपनियों की लागत और मुनाफे पर भी दबाव डाल सकती हैं, खासकर उन क्षेत्रों में जो ऊर्जा और परिवहन लागत से अधिक प्रभावित होते हैं।
विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी FII की लगातार बिकवाली ने भी बाजार की धारणा को कमजोर किया। वैश्विक निवेशकों की ओर से भारतीय शेयरों में बिकवाली होने पर बाजार में उपलब्ध विदेशी पूंजी पर दबाव पड़ता है और इससे प्रमुख शेयरों में कमजोरी बढ़ सकती है। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अनिश्चितता ने भी निवेशकों को जोखिम लेने से सावधान किया। शुक्रवार के कारोबार में बाजार में व्यापक स्तर पर दबाव दिखाई दिया। रियल्टी सेक्टर सबसे कमजोर रहा, जबकि ऑटो, मेटल, ऑयल एंड गैस और वित्तीय सेवाओं से जुड़े शेयरों में भी गिरावट रही। बैंकिंग सूचकांकों पर भी दबाव देखने को मिला। इसके विपरीत FMCG और फार्मा क्षेत्र अपेक्षाकृत मजबूत रहे। यह प्रदर्शन बताता है कि निवेशकों का रुझान फिलहाल जोखिम वाले क्षेत्रों से हटकर अपेक्षाकृत रक्षात्मक सेक्टरों की ओर बना हुआ है।
बाजार की कमजोरी के बीच निवेशकों की नजर कंपनियों के तिमाही नतीजों पर भी बनी हुई है। कुछ प्रमुख कंपनियों के कमजोर प्रदर्शन या भविष्य के कारोबार को लेकर सतर्क संकेतों ने भी धारणा प्रभावित की। ऐसे समय में निवेशक आमतौर पर कंपनियों की आय, मार्जिन और आगे के कारोबारी अनुमान को ध्यान से देखते हैं। इसके अलावा, रुपये की चाल और वैश्विक बाजारों के संकेत भी अगले कारोबारी सत्रों में बाजार की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण कारक होंगे।
इस गिरावट का असर बाजार के कुल मूल्यांकन पर भी पड़ा। एक रिपोर्ट के अनुसार, शुक्रवार की बिकवाली के दौरान भारतीय शेयर बाजार के कुल बाजार पूंजीकरण में 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की कमी आई। हालांकि, बाजार की व्यापकता पूरी तरह नकारात्मक नहीं रही और कई शेयर बढ़त में भी बंद हुए। इसके बावजूद बड़े और प्रमुख शेयरों में बिकवाली ने सेंसेक्स और निफ्टी पर दबाव बनाए रखा।
निवेशकों के लिए यह स्थिति क्यों महत्वपूर्ण है
मौजूदा बाजार गिरावट को केवल एक दिन के उतार-चढ़ाव के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि सेंसेक्स और निफ्टी लगातार पांच सत्रों से कमजोर हैं। महंगा कच्चा तेल, विदेशी निवेशकों की बिकवाली, कमजोर रुपये और भू-राजनीतिक तनाव जैसे कारक यदि लंबे समय तक बने रहते हैं, तो बाजार में अस्थिरता जारी रह सकती है।
दूसरी ओर, बाजार में गिरावट लंबी अवधि के निवेशकों के लिए कुछ मजबूत कंपनियों के मूल्यांकन को आकर्षक बनाने का अवसर भी दे सकती है। हालांकि, किसी भी निवेश निर्णय से पहले कंपनी की वित्तीय स्थिति, वैल्यूएशन, जोखिम क्षमता और निवेश अवधि का ध्यान रखना जरूरी है। केवल बाजार में गिरावट को देखकर जल्दबाजी में निवेश करना उचित नहीं माना जाता।
आने वाले दिनों में निवेशकों की नजर मुख्य रूप से कच्चे तेल की कीमतों, FII और घरेलू संस्थागत निवेशकों के निवेश प्रवाह, रुपये की विनिमय दर, वैश्विक बाजारों और कंपनियों के तिमाही नतीजों पर रहेगी। यदि तेल की कीमतों में नरमी आती है और वैश्विक तनाव कम होता है, तो बाजार को राहत मिल सकती है। इसके विपरीत, तेल की कीमतों में लगातार तेजी और विदेशी बिकवाली जारी रहने पर बाजार में दबाव और बढ़ सकता है।
कुल मिलाकर, 24 जुलाई का कारोबारी सत्र भारतीय शेयर बाजार के लिए कमजोर रहा। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों लगातार पांचवें दिन गिरावट के साथ बंद हुए और पूरे सप्ताह बाजार में बिकवाली का दबाव बना रहा। महंगा कच्चा तेल, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितता फिलहाल बाजार के लिए प्रमुख जोखिम बने हुए हैं। अब आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन दबावों में कितनी जल्दी कमी आती है और क्या घरेलू आर्थिक संकेतक तथा कंपनियों के वित्तीय नतीजे बाजार में दोबारा भरोसा पैदा कर पाते हैं।
