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भगवान विष्णु के छठे अवतार का पवित्र धाम: जानिए परशुराम मंदिर का इतिहास, पौराणिक कथा और अद्भुत वास्तुकला
महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में चिपलून के पास सह्याद्री पर्वतमाला की गोद में स्थित श्री क्षेत्र परशुराम मंदिर कोकण के सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में से एक है। भगवान विष्णु के छठे अवतार माने जाने वाले भगवान परशुराम को समर्पित यह मंदिर आस्था, इतिहास, प्राचीन वास्तुकला और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। हर वर्ष हजारों श्रद्धालु और पर्यटक यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
Priyanka Gaikwad27 जुल. 2026, 01:22 PM IST

महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में चिपलून से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर परशुराम गांव में स्थित यह प्राचीन मंदिर सह्याद्री की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच बसा हुआ है। शांत वातावरण और प्राकृतिक सुंदरता से घिरा यह मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र और पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख स्थल है। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। पुराणों के अनुसार उन्होंने अधर्म और अत्याचार का अंत कर धर्म की पुनः स्थापना की। इसके बाद उन्होंने सह्याद्री पर्वतों में तपस्या की। धार्मिक मान्यता है कि भगवान परशुराम ने अपने परशु (फरसे) के प्रभाव से समुद्र को पीछे हटने का आदेश दिया और समुद्र से जो भूमि निकली, वही आज का कोकण क्षेत्र कहलाती है। इसी कारण भगवान परशुराम को कोकण भूमि का निर्माता भी माना जाता है।
मंदिर की स्थापना को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। स्थानीय परंपरा के अनुसार भगवान परशुराम ने कुछ समय तक इसी स्थान पर निवास किया था। बाद में उनकी स्मृति में यहां मंदिर का निर्माण कराया गया। इतिहासकारों के अनुसार मंदिर का मूल स्वरूप अत्यंत प्राचीन है, जबकि वर्तमान मंदिर का विस्तार और जीर्णोद्धार 17वीं और 18वीं शताब्दी में मराठा शासनकाल के दौरान किया गया। मराठा सरदारों, स्थानीय दानदाताओं और विभिन्न संस्थानों ने मंदिर के संरक्षण और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंदिर की वास्तुकला पारंपरिक कोकणी और मराठा स्थापत्य शैली का सुंदर उदाहरण है। पत्थरों से बना मजबूत आधार, लकड़ी के सुंदर नक्काशीदार स्तंभ, विशाल सभा मंडप और शांत गर्भगृह इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं। मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति और दिव्यता का अनुभव होता है।
गर्भगृह में भगवान परशुराम की आकर्षक प्रतिमा स्थापित है। मंदिर में भगवान परशुराम के साथ उनकी माता रेणुका और पिता महर्षि जमदग्नि की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं। इस त्रिमूर्ति के दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। मंदिर में प्रतिदिन काकड़ आरती, अभिषेक, महापूजा और संध्या आरती जैसे धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। परशुराम जयंती यहां का सबसे प्रमुख धार्मिक उत्सव माना जाता है। वैशाख शुक्ल तृतीया के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना, पालकी यात्रा, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इस दौरान हजारों श्रद्धालु भगवान परशुराम के दर्शन के लिए मंदिर पहुंचते हैं।
मंदिर परिसर से सह्याद्री पर्वतमाला का मनमोहक दृश्य दिखाई देता है। वर्षा ऋतु में यहां की हरियाली, बादलों से ढकी पहाड़ियां और स्वच्छ वातावरण इस स्थान की सुंदरता को कई गुना बढ़ा देते हैं। इसलिए यह स्थान धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों के लिए भी विशेष आकर्षण का केंद्र है। परशुराम मंदिर के आसपास वशिष्ठी नदी, गोवलकॉट किला, सावतसडा जलप्रपात, गुहागर समुद्र तट और वेळणेश्वर मंदिर जैसे कई प्रसिद्ध पर्यटन स्थल स्थित हैं। इसलिए चिपलून की यात्रा के दौरान इन स्थानों का भी आनंद लिया जा सकता है।
चिपलून मुंबई-गोवा राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है, जिससे सड़क मार्ग द्वारा यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। कोकण रेलवे का चिपलून रेलवे स्टेशन मंदिर के निकट स्थित है। यहां से टैक्सी और स्थानीय वाहनों की सुविधा उपलब्ध है। यदि आप धार्मिक आस्था, पौराणिक इतिहास, प्राचीन भारतीय वास्तुकला और कोकण की प्राकृतिक सुंदरता का एक साथ अनुभव करना चाहते हैं, तो रत्नागिरी जिले का श्री क्षेत्र परशुराम मंदिर महाराष्ट्र के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है। यह ऐसा पवित्र स्थान है, जहां प्रत्येक श्रद्धालु और पर्यटक को जीवन में कम से कम एक बार अवश्य जाना चाहिए।
